केले के बेकार तनों से बनाया हस्तशिल्प, आज 9 लाख का टर्नओवर

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मजदूर पिता का बेटे दे रहा है 450 लोगों को रोजगार
नयी दिल्ली : उत्तर प्रदेश के कुशीनगर के रहने वाले रवि प्रसाद का बचपन तंगहाली में गुजरा। सड़क हादसे में पिता की मौत हो गयी। रवि की पढ़ाई बीच में छूट गई और उनके कंधे पर परिवार की जिम्मेदारी आ गई। उन्होंने मजदूरी की, प्राइवेट कंपनी में काम किया। आज वे केले के कचरे से हस्तशिल्प उत्पाद तैयार करते हैं, ऑनलाइन और ऑफलाइन माध्यमों से देश भर में बेच रहे हैं। 450 से ज्यादा महिलाओं को उन्होंने रोजगार से जोड़ा है। अभी हर साल वे 8 से 9 लाख रुपये का कारोबार कर रहे हैं।
36 साल के रवि बताते हैं कि पिता जी मजदूरी करते थे। मैं उनके काम में मदद के साथ पढ़ाई भी करता था। मास्टर्स में दाखिला लिया था, लेकिन एक हादसे में पिता की मौत हो गई। उसके बाद मैंने पढ़ाई छोड़ दी और धंधे की तलाश में लग गया। कई साल तक इधर-उधर काम करता रहा और घर परिवार का खर्च चलाता रहा।
रवि बताते हैं कि साल 2016 में अपने दोस्तों के साथ काम के लिए दिल्ली गया। उसी दौरान एक दिन प्रगति मैदान में जाने का मौका मिला। वहां दक्षिण के कुछ कारीगर आए थे। उन लोगों ने केले के वर्ज्य पदार्थों से बने हस्तशिल्प उत्पादों का स्टॉल लगाया था। उनसे बातचीत के बाद मुझे लगा कि ये काम किया जा सकता है। हमारे यहां तो केले की खूब खेती होती है और लोग केले से निकला वर्ज्य यूं ही फेंक देते हैं।
उन्होंने मेले में ही एक कारीगर से दोस्ती की और काम सिखाने का आग्रह किया। इसके बाद वे दिल्ली से ही कोयंबटूर चले गए। वहां करीब एक महीने वे उस कारीगर के गांव में ठहरे। वहां के किसानों से मिले, उनके काम को समझा। बनाना फाइबर वेस्ट से हस्तशिल्प उत्पाद बनाना सीखा। जब वे काम सीख गए तो वापस अपने गांव लौट आए।
रवि बताते हैं कि मुझे काम की जानकारी तो मिल गई थी, लेकिन प्रोसेसिंग मशीन खरीदने के लिए पैसे नहीं थे। मैंने कोशिश जारी रखी। लोन के लिए भी कुछ जगह कोशिश की। इसी बीच मुझे एक परिचित के जरिए जिला उद्योग केंद्र के बारे में पता चला। वहां जाकर मैंने जनरल मैनेजर से मुलाकात की। उन्हें अपने काम और प्रशिक्षण के बारे में जानकारी दी। वे मेरे आइडिया से काफी प्रभावित हुए और लोन के लिए प्रपोजल बनाने में मदद की।

5 लाख रुपये बैंक से कर्ज लिये
साल 2018 में रवि को बैंक से 5 लाख रुपये का कर्ज मिल गया। इससे उन्होंने प्रोसेसिंग मशीन खरीदी, कुछ महिलाओं को काम पर रखा और अपने काम की शुरुआत की। वे धीरे-धीरे एक के बाद एक नए-नए सामान तैयार करने लगे और स्थानीय बाजार में उसे सप्लाई करने लगे। इसके बाद यूपी सरकार से भी प्रोत्साहन मिला। राज्य सरकार की वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट स्कीम के लिए मेरा चयन हुआ। उसके जरिए कई महिलाएं मुझसे जुड़ीं। मार्केटिंग के लिए मुझे प्लेटफॉर्म मिला। रवि फिलहाल केले के कचरे , रेशा, सैनिटरी नैपकिन, ग्रो बैग सहित दर्जनभर उत्पाद तैयार कर रहे हैं। वे अपने प्रोडक्ट सीधे बड़ी-बड़ी टेक्स्टाइल कंपनियों को भेजते हैं।
इसके बाद रवि दिल्ली, लखनऊ सहित कई शहरों में लगने वाले मेलों में जाने लगे। स्टॉल लगाकर अपने प्रोडक्ट की मार्केटिंग करने लगे। कुछ मीडिया कवरेज में उनको जगह मिली तो लोग ऑनलाइन भी उनसे उत्पाद खरीदने लगे। वे अभी सोशल मीडिया के साथ ही अमेजन और फ्लिपकार्ट के जरिए अपने प्रोडक्ट की मार्केटिंग कर रहे हैं। देशभर से उन्हें ऑर्डर आ रहे हैं।

(साभार – दैनिक भास्कर)

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