चमत्कार अभिनेता नहीं, चमत्कार हमेशा कहानियाँ करती हैं – पंकज त्रिपाठी

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सुषमा त्रिपाठी कनुप्रिया

कड़े संघर्ष के बाद सफलता मिले तो उसका स्वाद अनोखा होता है और उसमें एक सन्तुष्टि मिलती है और इन्सान जमीन के करीब ही रहता है।   ‘शेरदिल : द पीलीभीत सागा’ के प्रचार के सिलसिले में कोलकाता पहुँचे दिग्गज एवं लोकप्रिय अभिनेता पंकज त्रिपाठी के चेहरे पर यही सुकून नजर आया। राजकाहिनी और उसका हिन्दी संस्करण बेगम जान, गुमनामी बाबा जैसी कई बेहतरीन फिल्में दे चुके निर्देशक श्रीजीत मुखर्जी के साथ उन्होंने मीडिया के सवालों के जवाब दिए। निर्देशक श्रीजीत मुखर्जी और अभिनेता पंकज त्रिपाठी की इस बातचीत के मुख्य अंश हम आपके सामने रख रहे हैं – 

गंगाराम और पंकज त्रिपाठी का सम्बन्ध
गंगाराम का किरदार निभा रहा हूँ, यही सबसे बड़ा सम्बन्ध है।

सूरज की रोशनी के हिसाब से होती थी शूटिंग
जंगल में रहना ही मजेदार था। वहाँ पर इतनी शांति थी। सुबह 5 बजे ही हम कैमरा लेकर जंगल में चले जाते थे और सूरज की रोशनी के अनुसार शूट करते थे। उत्तर बंगाल में एक टी इस्टेट था जिसे श्रीजीत जी ने ढूंढ निकाला था। वह जगह मुझे बहुत पसन्द आयी, वहाँ मैं दोबारा जाऊँगा मगर इस बार घूमने के लिए। सो बहुत याद हैं और हम दोनों जंगलों को पसन्द करने वाले लोग हैं।

यह मुद्दा, घटनाएं जानी – पहचानी थीं
निश्चित रूप से जुड़ा हूँ। मैं असली दुनिया से आता हूँ। आधा जीवन मेरा गाँव में गुजरा है तो इसमें जो परेशानियाँ हैं, संघर्ष हैं, वह मैंने करीब से देखा है। हमारे यहाँ जंगली पशु तो नहीं आते थे लेकिन नीलगायों का बहुत उत्पात रहता है, मेरे लिए यह मुद्दा, घटनाएं जानी – पहचानी थीं। मुझे अलग से तैयारी की जरूरत नहीं पड़ी, यह अखबार पढ़ने की बात नहीं है। मैं इस परेशानी से स्वयं गुजरा हूँ।

प्रकृति को लेकर अब अधिक संवेदनशील हो गया हूँ
हर किरदार हमें कुछ न कुछ तो देता है जो प्रकृति, जंगल और पर्यावरण को लेकर मैं जितना संवेदनशील पहले था, उससे ज्यादा संवेदनशील हो जाऊँगा या हो गया हूँ।

शूटिंग में जमकर खाया
बहुत खिलाया शूटिंग पर। बहुत अच्छा खाना मिलता था। बंगाली भोजन – – आलू पोस्तो..चरचरी सब खाया। हम रोज खाते थे।

फिल्म के अनुसार खुद को ढाल लेता हूँ
मैं जिस फिल्म में घुस जाता हूँ, उस फिल्म के कास्ट, क्रू औऱ सभी सदस्यों को अपना बना लेता हूँ। मैं तय नहीं करता है कि यह मेरे मनलायक है या नहीं। मेरे लिए हर व्यक्ति महत्वपूर्ण है, प्रेम और आदर ही तो महत्वपूर्ण है और मैं हर किसी को एक जैसा सम्मान देता हूँ। चमत्कार अभिनेता नहीं, चमत्कार हमेशा कहानियाँ करती हैं। चूँकि हम फिल्म में होते हैं तो लोगों को लगता है कि चमत्कार हमने किया, पर ऐसा होता नहीं है, चमत्कार कहानियाँ करती हैं। कहानियाँ बड़ी होती हैं, किरदार बड़े होते हैं, कलाकार बहुत छोटी भूमिका निभाते हैं। चरित्र बड़े होते हैं, गंगाराम मुझसे बहुत बड़ा है। गंगाराम अपने गाँव के लिए जिस तरह का त्याग कर रहा है, शायद वह त्याग मुझसे कभी जीवन में न हो पाए। कहानी बड़ी होती हैं, किरदार बड़े होते हैं। जो कहानी लगता है, कुछ कर सकती है, कर लेता हूँ।

भोजपुरी फिल्म बनाने का मन है
भिखारी ठाकुर मेरे ही इलाके के हैं। उनके नाटक मुझे बहुत पसन्द हैं, मैंने किया है। बटोही नाम से नाटक है उन पर उपन्यास है तो निश्चित रूप से अगर किसी ने फिल्म बनायी तो मैं जरूर वह फिल्म करना चाहूँगा क्योंकि माटी – पानी एक ही है हम दोनों का। मेरे मन में एक सपना है कि मौका लगे तो अपने लायक एक भोजपुरी फिल्म बनाऊँ।

तरीका मनोरंजक है, फिल्म गम्भीर है
गम्भीर कहानी को मनोरंजक और सटायर का प्रभाव भी होता है। कहानी गम्भीर है, एक व्यक्ति मरने जा रहा है, यह कोई हंसी की बात नहीं है। फिल्म देखकर दर्शक सोचने पर बाध्य होंगे।

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संवाददाता सम्मेलन में निर्देशक श्रीजीत मुखर्जी और अभिनेता पंकज त्रिपाठी

मैं इंडिया को जानता था, पंकज ने मुझे भारत से मिलवाया – श्रीजीत मुखर्जी 

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पंकज त्रिपाठी को छोड़कर गंगाराम के लिए किसी और को ले ही नहीं सकते थे
ऐसा अभिनेता चाहिए था जो मिट्टी के करीब हो और किरदार में घुल – मिल जाए। गंगाराम के किरदार में पंकज त्रिपाठी को छोड़कर किसी और अभिनेता के बारे में हम सोच ही नहीं सकते थे। आप फिल्म को देखेंगे तो आपको पता चल जाएगा कि दोनों कितने नैसर्गिक हैं, नेचुरल हैं। इस फिल्म में भी पंकज सर का बहुत योगदान है। हमने जो पटकथा लिखी थी, उसे कुछ सुधारा है और इस फिल्म में, इस किरदार को बेहतर बनाने में पंकज का बहुत योगदान है। कोई किरदार के साथ घुल – मिल जाए तो ही इस तरह का योगदान कर सकता है।

फिल्म को सोशल सटायर की तरह बनाया है
बड़े – बुजुर्गों को जंगल में छोड़ आना और उनकी मृत्यु के बाद मुआवजा माँगना, इसका कारण तो आर्थिक अभाव है। मैंने इसे सोशल सटायर की तरह बनाया है यानी सामाजिक विद्रूप की तरह बनाया है। बहुत से लोग खुद भी जाते हैं, इस बिन्दु को उठाकर काल्पनिक जंगल, गाँव, गरीबी से बचने के लिए खुद अपनी जान दाँव पर लगाना..इसी को लेकर फिल्म गढ़ी गयी है।

फिल्म बनाते समय पुरस्कार दिमाग में नहीं रहते
फिल्म फेयर या राष्ट्रीय पुरस्कार या सफलता कुछ भी..सब बाद की चीजें हैं। मैं जिस कहानी को लेकर रोमांचित होता हूँ, उसी पर फिल्म बनाता हूँ। कई बार वे सफल होती हैं तो कई बार यह विचार काम नहीं करता तो पुरस्कार या कुछ और फिल्म बनाते समय मेरे दिमाग में नहीं रहता। मैं उन विषयों, उन कहानियों को लेकर ही फिल्म बनाता हूँ जो मेरे दिल के करीब होती हैं।

पंकज के साथ काम करके बहुत कुछ सीखा
पंकज खाने के शौकीन हैं। हैं। एक होती है, अभिनेता से ट्यूनिंग और दूसरी होती है दोस्ती तो पंकज से दोस्ती हो गयी है। हम खूब बातें करते और चर्चा करते हैं। थी काम के 8 -10 घंटे के बाद भी हम दोनों का जीवन है। यह चर्चा प्रकृति प्रकृति, राजनीति, संगीत भोजन,,,सब पर चर्चा होती है और ऐसे ही तो दोस्ती होती है, सो हुई है। पंकज के साथ काम करते हुए कभी लगा नहीं कि मैं एक स्टार के साथ काम कर रहा हूँ। मिट्टी से जुड़ा व्यक्ति हम कहते हैं मगर पंकज वास्तविकता में मिट्टी से जुड़े हुए व्यक्ति हैं। मैं एक शहर का व्यक्ति हूँ तो पंकज जी ने मुझे ऐसे भारत के बारे में बताया जिसे उनसे मिले और बात किये बगैर नहीं जान सकता था। वह भारत को अच्छी तरह जानते हैं। कुछ दृश्यों में उन्होंने इसे जोड़ा है, कुछ संवादों को बेहतर बनाया क्योंकि गाँवों में और जंगलों में ऐसा होता है। उनके अनुभवों ने मुझे एक अलग भारत दिखाया। मैं इंडिया को जानता था, पंकज ने मुझे भारत से मिलवाया। सीखने की यह प्रक्रिया रोचक रही।

फिल्म सच्ची घटनाओं से प्रेरित है, उस पर आधारित नहीं है
पीपली लाइव मैंने देखी है पर उस फिल्म से इस फिल्म का सम्बन्ध नहीं बल्कि पीलीभीत की उस घटना से सम्पर्क है। प्रभावित शब्द भी गलत है, प्रेरित कह सकते हैं। हमने जो जंगल और गाँव दिखाए हैं, वह काल्पनिक है। पीलीभीत की जो घटना है, वह बहुत ही निराशाजनक है, वह बहुत मायूस करती है। हमने इसमें सकारात्मक दृष्टिकोण है, लार्जर देन लाइफ सटायर की तरह पेश किया है। बांसुरी का फिल्म में बहुत महत्वपूर्ण तरीके से उपयोग किया गय़ा है और गंगाराम से इसका बहुत सम्बन्ध है। हमने शांतनु से इस बारे में बात की।

लोग फिल्म देखकर सोचने को बाध्य होंगे
फिल्म में मनोरंजन होगा, सटायर होगा मगर लोग फिल्म देखकर सोचने को बाध्य होंगे।

 गुलजार साहब की सराहना पुरस्कार की तरह थी
गुलजार साब लीजेंड हैं और चुनिंदा काम कर रहे हैं। उन्होंने कहा था कि फिल्म देखकर तय करेंगे कि वे लिखेंगे या नहीं। हमने फिल्म भेजी और वह उनको अच्छी लगी कि उन्होंने हमें बुलाया और हमें धन्यवाद किया कि हमने उनके बारे में सोचा कि वे लिखें। यह हमारे लिए पुरस्कार की तरह था, कल्पनातीत था। केके हमारे प्रिय गायक है। मजेदार थे, काम करने की उनके साथ योजना बनी पर अफसोस है कि वह पूरी नहीं हो पायी।

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