दही हांडी…परम्परा में छुपे हैं जीवन प्रबन्धन के गुण

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भगवान श्री कृष्ण का जन्मोत्सव यानी जन्माष्टमी का महापर्व इस वर्ष 18-19 अगस्त को पूरे देशभर में मनाया जा रहा है। कृष्ण जन्माष्टमी त्योहार भगवान श्री कृष्ण के जन्म के उपलक्ष्य में मनाया जाता है, जो हिंदुओं द्वारा पूजे जाने वाले सबसे लोकप्रिय देवताओं में से एक हैं। जन्माष्टमी के अवसर पर दही-हांडी उत्सव मनाने की एक विशेष परंपरा भी सदियो से चलती आ रही है। इस उत्सव में युवा टोलियां बनाकर ऊंचाई पर बंधी दही-हांडी फोड़ते हैं।

ये परंपरा किसने शुरू की, इस बात का जानकारी तो नहीं मिलती, लेकिन किसी समय छोटे से स्तर से शुरू हुई ये परंपरा आज पूरे देश में बड़े स्तर पर निभाई जाती है। महाराष्ट्र में इसका उत्साह देखते ही बनता है। इस परंपरा के पीछे भगवान श्रीकृष्ण के बाल्यकाल की घटनाएं हैं। इस परंपरा के पीछे लाइफ मैनेजमेंट के कई सूत्र भी छिपे हैं। आइए जानें क्या है दही हांडी उत्सव और क्यों मनाया जाता है ये पर्व-

श्रीमद्भागवत के अनुसार, बाल्यकाल में भगवान श्रीकृष्ण अपने दोस्तों के साथ मिलकर लोगों के घरों से माखन चुराकर अपने मित्रों को खिला देते हैं और स्वयं भी खाते थे। जब यह बात गांव की महिलाओं को पता चली तो उन्होंने माखन की मटकी को ऊंचाई पर लटकाना शुरू कर दिया, जिससे श्रीकृष्ण का हाथ वहां तक न पहुंच सके। लेकिन नटखट कृष्ण की समझदारी के आगे उनकी यह योजना भी व्यर्थ साबित हुई। माखन चुराने के लिए श्रीकृष्ण अपने दोस्तों के साथ मिलकर एक पिरामिड बनाते और ऊंचाई पर लटकाई मटकी से दही और माखन चुरा लेते थे। इसी से प्रेरित होकर दही-हांडी का चलन शुरू हुआ।
दही-हांडी पूरे भारत में सबसे मशहूर है। खासकर गुजरात, द्वारका, महाराष्ट्र के हर गली-मुहल्ले में दहीं हांडी की प्रतियोगिता रखी जाती है। यहां मटकी में दही के साथ घी, बादाम और सूखे मेवे भी डाले जाते हैं, जिसे युवाओं की टोली मिलकर तोड़ती है। वहीं लड़कियों की एक टोली गीत गाती हैं और उन्हें रोकने की कोशिश करती हैं।
ज्योतिष-शास्त्र के अनुसार, मक्खन एक तरह से धन का प्रतीक है। जब हमारे पास आवश्यकता से अधिक धन हो जाता है तो उसे हम संचित यानी इक्ट्ठा कर लेते हैं जबकि होने ये चाहिए धन अधिक होने पर पहले उसका कुछ भाग जरूरतमंदों को दान करें।
श्रीकृष्ण माखन चुराकर पहले अपने उन मित्रों को खिलाते थे जो निर्धन थे। श्रीकृष्ण कहते हैं कि यदि आपके पास कोई वस्तु आवश्यकता से अधिक है तो पहले उसका दान करो, बाद में उसका संचय करो। इस बात का ध्यान सभी को रखना चाहिए।
माखन और दही खाने से जुड़ा एक अन्य लाइफ मैनेजमेंट ये भी है कि बाल्यकाल में बच्चों को सही पोषण मिलना अति आवश्यक है। दूध, दही, माखन आदि चीजें खाने से बचपन से ही बच्चों का शरीर सुदृढ़ रहता है और वे आजीवन तंदुरुस्त बने रहते हैं।
(साभार – नवभारत टाइम्स)

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