ब्रिटिशों को टक्कर देने वाली लोकमाता रानी रासमणि

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जब भी रानी शब्द हम कहते हैं…एक ऐसी छवि बनती है जिसमें एक महिला शासक अस्त्र – शस्त्र के साथ दिखती है या उसमें एक राजसी तेज होता है…नहीं…वह रानी ऐसी नहीं थी…उसके पास शस्त्र नहीं थे और वह किसी राजसी परिवार से भी नहीं थी…बल्कि वह तो माता थी और जनता ने उनको सम्मान देकर रानी बनाया…बंगाल में ऐसी बहुत सी महिलाएं हैं जो प्रेरणा देती हैं किसी न किसी रूप में…और ऐसी ही महिला हैं रानी रासमणि…जिनकी गाथा आज 300 साल बाद भी बंगाल ने याद रखी है मगर बात जब इस देश के इतिहास की होती है…तो लगता है कि उनकी गाथा को बार – बार दोहराने की जरूरत है। यहीं…ठाकुर रामकृष्ण परमहंस और स्वामी विवेकानंद…और यह मंदिर जिन्होंने बनवाया …वह थीं रानी रासमणि….जिन्होंने ठाकुर को इस मंदिर का पुरोहित बनाया…मगर रानी का योगदान यहीं तक तो सीमित नहीं है…आप सुवर्णरेखा नदी से पुरी की ओर जो सड़क जाती है…श्रद्धालुओं की दिक्कतों को दूर करने के लिए उसे रानी रासमणि ने ही बनवाया था। कोलकाता के सुन्दर घाटों की स्थापना के पीछे भी रानी माँ की प्रेरणा रही। बाबूघाट के नाम से प्रसिद्ध बाबू राजचन्द्र दास घाट की स्थापना रानी रासमणि ने की थी और इसके लिए खुद लॉर्ड बेंटिक ने उनकी सराहना की थी। वहीं यह भी कहा जाता है कि रानी माँ के कहने पर राजचन्द्र दास ने यह घाट बनवाया था…जो भी हो, दोनों ही रूपों में रानी रासमणि का योगदान स्पष्ट है। अहिरीटोला घाट और नीमतला घाट भी रानी रासमणि के स्मृति चिह्न हैं। रानी रासमणि ने इम्पीरियल लाइब्रेरी (आज की नेशनल लाइब्रेरी या राष्ट्रीय पुस्तकालय) और हिन्दू कॉलेज (प्रेसिडेंसी विश्वविद्यालय) की स्थापना के लिए भी आर्थिक सहयोग दिया।


रानी रासमणि का जन्म 28 सितम्बर 1793 को उत्तर 24 परगना के कोना (हालीशहर) में हरेकृष्ण दास के घर में हुआ था। जब रासमणि 7 साल की थीं तभी उनकी माता रामप्रिया देवी चल बसीं। रासमणि का विवाह महज 11 साल की उम्र में जानबाजार के समृद्ध जमींदार परिवार के बाबू राजचन्द्र दास से हुआ। 1836 में पति की मृत्यु के बाद रासमणि ने जमींदारी और आर्थिक जिम्मेदारियाँ सम्भालीं।
रानी सिर्फ दयालु ही नहीं बल्कि साहसी भी थीं। यहाँ तक कि ब्रिटिशों को चुनौती देने से भी वह पीछे नहीं हटती थीं। ब्रिटिश अधिकारियों ने जब गंगा में मछली पकड़ने के लिए मछुआरों पर कर लगाया और मछुआरों ने रानी की शरण ली। रानी ने लीज पर बड़ी रकम खर्च कर घुसुड़ी से लेकर मटियाब्रुज तक लिया और पूरी नदी में सींकल लगवा दी। इसका असर अंग्रेजों के व्यवसाय पर पड़ा क्योंकि बड़े जहाज उस हिस्से में जा ही नहीं पाते थे। आखिर अंग्रेजों ने मजबूर होकर कर वापस लिया और तब जाकर रानी ने वह जंजीरें नदी से हटवायीं।
इसके बाद ईस्ट इंडिया कम्पनी के अधिकारियों शोर का बहाना देकर रानी की शोभायात्रा पर रोक लगानी चाही और कहा कि इससे शांति भग्न होती है। रानी को भय हुआ कि इससे धार्मिक आयोजनों पर अंग्रेजों का हस्तक्षेप बढ़ जायेगा और रानी ने शोभायात्रा जारी रखने का आदेश दिया। अंग्रेजों ने उन पर 40 रुपये का जुर्माना लगाया जो उस जमाने में बड़ी रकम थी। जनता को जब पता चला तो खूब विरोध हुआ और अंग्रेजों को जनता के आगे झुकना पड़ा। एक बार रानी को खबर मिली कि नील की खेती करने वाले श्रमिकों के घर की महिलाओं को कुछ अंग्रेज सैनिक परेशान कर रहे हैं। रानी ने तुरन्त अपने सुरक्षाकर्मियों को भेजा और उन सैनिकों को गिरफ्तार कर लिया। इसके बाद ईस्ट इंडिया कम्पनी ने रानी के घर पर हमला कर उसे कब्जे में ले लिया। जब अंग्रेजों ने रानी के पूजा गृह में रघुनाथ जी के मंदिर में घुसने की तैयारी की तो रानी ने माँ काली का रूप धारण कर तलवार उठा ली और कमरे की सुरक्षा की। रानी का साहस देखकर अंग्रेजों को पीछे हटना पड़ा और फिर रानी से उन्होंने टक्कर नहीं ली।

रानी ने दक्षिणेश्वर काली मंदिर के अतिरिक्त बेलियाघाटा नहर, मधुमती नहर के लिए जमीन दी। बंगाल के अकाल राहत कोष में दान दिया और ईश्वर चन्द्र विद्यासागर के विधवा विवाह आन्दोलन में भी आर्थिक सहयोग दिया।आज भी रानी के वंशज जानबाजार के उस जमींदार घर में रहते हैं
कोलकाता के धर्मतल्ला में रानी रासमणि के नाम पर सड़क है और लोकमाता रानी रासमणि की प्रतिमा भी है। दक्षिणेश्वर में भी रानी रासमणि रोड है। बैरकपुर में एक फेरी घाट का नाम रानी के नाम पर है। भारतीय तटरक्षक के 5 फास्ट पेट्रोल वेजल रानी के नाम पर 2018 में रखे गये और इस समय ये विशाखापट्टनम में हैं।
इतने पर भी जब बात सशक्त महिलाओं की होती है तो रानी रासमणि का नाम बहुत कम लोगों को याद आता है…रानी का नाम अग्रिम पंक्ति में होना चाहिए। अपनी सूझ – बूझ, साहस, दानशीलता और परोपकार से उन्होंने जनता के दिल में जो जगह बनायी हैं…वह आज भी उनको लोकमाता के रूप में प्रतिष्ठित करता है। रानी हमेशा दिल में रही हैं, रहेंगी।

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