भारत के महानायक : गाथावली स्वतंत्रता से समुन्नति की- सर्वपल्ली राधाकृष्णन

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विद्या भंडारी

5 सितम्बर को जन्मे भारत के प्रथम उपराष्ट्रपति और द्वितीय राष्ट्रपति डा.राधाकृष्णन भारतीय संस्कृति के संवाहक,प्रख्यातशिक्षाविद् लेख़क,महान् दार्शनिक और एक आस्थावान हिन्दू विचारक थै।उनके इन्हीं गुणों के कारण 1954 में भारत सरकार ने उन्हें सर्वोच्च सम्मान भारत रत्न से अलंकृत किया था और उन्ही के सम्मान में उनके जन्म दिन 5 सितम्बर को भारत में शिक्षा-दिवस के रूप में मनाया जाता है ।
उन्होंने 16 वर्ष की उम्र में मद्रास के क्रिश्चियन कालेज मे प्रवेश लिया। 1907 में स्नातक की उपाधि प्राप्त की और वहीं से मास्टर डिग्री प्राप्त की ।बाद मे मैसूर युनिवर्सिटी दर्शन शास्त्र के प्रोफेसर रहे ।अच्छी सेवा के लिए उन्हें ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में अध्यापक के रूप में काम करने का अवसर मिला ।इंग्लैड में पढ़ाते हुए पश्चिमी दार्शनिकों की इस बात के लिए आलोचना करते थे कि बच्चों को अपने विचार व्यक्त करने की पूर्ण स्वतंत्रता होनी चाहिए,इसमें धर्म का नाम नहीं आना चाहिए ।एक दर्शन शास्त्र ही है जो किसी भी फिलासफी का तुलनात्मक अध्ययन कर सकता है ।और उन्होंने शिष्यों को अन्य सभ्यताओं के साथ तुलनात्मक अध्ययन करवाया ।यही कारण था कि उनमें सच्चे अध्यापक की छवि साफ देखने को मिलती थी।1928 में आन्ध्र महासभा में उन्होंने भाग लिया जहाँ पर एक प्रेरक भाषण की प्रस्तुति दी और उन्हें राष्ट्रसंघ समिति में बौद्धिक विचारक के रूप में नियुक्त किया गया ।

राष्ट्रपति के रूप में वे सक्षम अध्यापक नहीं रहे इसलिए कार्यकाल चुनौती पूर्ण रहा क्योकि उनके कार्यकाल में दो पडोसी देशों के साथ युद्ध हुए थे।1962 में चीन के साथ भारत को हार का सामना करना पङा था।उसी कार्यकाल में दो प्रधानमंत्रियों की मृत्यु हो गयी थी।लाल बहादुर शास्त्री जी की ताशकंद में और दूसरे 1964 में नेहरू जी की मृत्यु हुई ।1967 में उन्होंने पद पर कार्यरत रहने से इन्कार कर दिया था। उनके कार्यों के लिए राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर कई सम्मान एवं पुरस्कार प्रदान किए गए ।
उनके शैक्षिक विचार बहुत ही प्रेरक एवं परिपक्व थे। उनका मानना था कि शिक्षा को सामाजिक;आर्थिक और सांस्कृतिक परिवर्तन के साधन के रूप में परिभाषित होना चाहिए,सामाजिक और राष्ट्रीय एकता के लिए,उत्पादकता बढ़ाने के लिए शिक्षा का उचित उपयोग होना चाहिए । शिक्षा का महत्व न केवल ग्यान या कौशल में है बल्कि दूसरों का सहयोग करना है ।उनके अनुसार शिक्षा में केवल तकनीकी नहीं बल्कि हमे स्थायी मूल्यों की खोज में सहयोग करना चाहिए ।
उनका मत था कि सही प्रकार की शिक्षा ही समाज और देश की कई समस्याओं का समाधान कर सकती है ।वे ऐसी शिक्षा चाहते थे जो हमें अंतरिक्ष और समय से परे दूसरी अदृश्य और अमूर्त दुनिया को देखने में सहायता करे ,शिक्षा को हमें दूसरा जन्म देना होगा ताकि हम महसूस कर सकें कि हमारे भीतर पहले से क्या है ।शिक्षा का अर्थ व्यक्ति की मुक्ति हैऔर हमें समग्रता की

शिक्षा की आवश्यकता है–मानसिक,शारीरिक,बौद्धिक और आध्यात्मिक। शिक्षा द्वारा छात्रोंके मन में निरंतर सोच,सत्य का पालन, लोकप्रिय भावनाओं और भीङ के जुनून के प्रतिरोध की शक्ति का विकास होना चाहिएl जानडेवी, पेस्टलौजी, अरविंद,टैगोर, जैसे कई अन्य दार्शनिकों की तरह डा राधाकृष्णन ने सभी के लिए शिक्षा और बच्चो की जरूरतें और रुचि के अनुसार शिक्षा पर ज़ोर दिया । उनका मानना था कि प्रत्येक व्यक्ति कुछ जन्मजात प्रवृत्तियों के साथ पैदा होता है ।
उन्होंने शास्त्रो का गहन अध्ययन किया था और शंकर अद्वैतवाद से अत्यधिक प्रभावित थे।उनके लिए शिक्षा आत्मा का ग्यान है,शिक्षा अज्ञान दूर करती हैऔर व्यक्ति को प्रबुद्ध बनाती है ।जोर देकर उन्होंने कहा कि शिक्षा न तो किताबी ग्यान है,न ही तथ्यों और आकङो को याद रखना ।यह जीवन और दुनिया से असंबंधित अनगिनत जानकारी के साथ शब्दों का संग्रह या दिमागी कसरत नहीं है बल्कि शिक्षा मानव निर्माण ,चरित्र निर्माण और जीवन निर्माण के लिए मूल्यों और विचारों को आत्मसात करना है ।शिक्षा के क्षेत्र में डा राधाकृष्णन का योगदान अद्वितीय है ।उनके बिना हम आधुनिक भारत की कल्पना ही नहीं कर सकते ।
मै भी विशेष तौर से उनसे प्रभावित हूँ क्योकि मुझे उन्होंने स्वयं राष्ट्रपति भवन में राष्ट्रीय पदक प्रदान किया ।भारत स्काउट्स गाइड्स में मुझे राजस्थान से चुना गया था और उसके बाद जोधपुर युनिवर्सिटी के उपकुलपति भी रहे,जहाँ से मेरी शिक्षा एम ए तक पूर्ण हुई ।उनके व्यक्तित्व ने अत्यंत प्रभावित किया ।मै उन्हे मेरी प्रेरणा मानती हूँ ।
व्यक्तिगत तौर पर उनका विवाह शिवाकमु से हुआ ।पाँच पुत्रियांऔर एक पुत्र हुए।पुत्र इतिहासकार के रूप में जाने जाते हैं ।विवाह 14 वर्ष की उम्र में ही हो गया था,पत्नी 10वर्ष की थीं ।
वे मानते थे कि विज्ञान की प्रगति भौतिक विकास के लिए नितान्त आवश्यक है तो प्रगति भी आन्तरिक समृद्धि के लिए उतनी ही आवश्यक और वांछनीय है । 17अप्रेल 1975 को उनका निधन हुआ ।राष्ट्रपति और कर्मठ राजनायक एवं शिक्षाविद् के रूप में वे आज भी उनके जन्म दिवस पर याद किये जाते हैं और किए जाते रहेंगे ।

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