मंदिर के बहाने

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डॉ. वसुंधरा मिश्र

बहुत हैरानी होती है जब भी हम स्त्रियाँ पिकनिक पर जातीं हैं तो हमेशा की तरह सब कुछ एक ही होता है लेकिन फिर भी अलग होता है । एक से भाव, एक से विचार, एक सी संस्कृति, एक से भगवान, एक से धर्म, एक से राम, और एक सी जाति। हर स्त्री की अपनी कहानी होती है और मजे की बात ये है कि फिर भी अपने आप को कभी भी दूसरों से अलग नहीं पाती। जब भी मैं अपने-आप को तौलती हूँ तो कहीं कोई अंतर नहीं दिखाई पड़ता। घुमा-फिराकर एक ही बात समझ में आती है। हमारी कहानियों में कोई अंतर ही नहीं होता। भले ही हम आज डिजिटल रूप से आगे बढ़ गए हों लेकिन उसके बावजूद भी समाज और परिवार की कहानियाँ एक ही जैसी ही हैं। हाँ! स्वरूप बदलता रहा है।

स्त्री मित्रों के रिश्तों की अजब और गज़ब कहानियाँ होती हैं। मेरे काव्य संग्रह’हर दिन नया’की एक कविता’ रिश्ते ‘याद आ रही है जिसे मैं आप सभी मित्रों के साथ साझा कर रही हूँ-
‘बर्फ से हैं ये मानवीय रिश्ते उन्हें चाहिए गर्म हवा का झोंका
साफ़ करे जो जमी धूल को
परत दर परत खोले जकड़न को
जो तोड़े जड़ता को
तभी तो हिय – हिमालय पर
जमा ग्लेशियर
प्रेम के झरने- सा बहने लगता है
धरती के हरे-हरे आँचल पर।’
हर घर के अंदर और बाहर की कहानी अलग है। पहले संयुक्त परिवार थे और अब एकल परिवार हैं। अब अकेलेपन और अपनी पहचान की कहानी है। अपने लिए समय चुराना और एक साथ पूरा दिन बिताना, रोज के अपने सभी कार्यों को छोड़कर घूमना – फिरना, खाना-पीना आनंद और ऊर्जा से भर देता है। शरीर और मन फिर नए सिरे से अपने काम करने के लिए तैयार हो जाते हैं ।
जब भी हम वरिष्ठ स्त्रियाँ पिकनिक या गेटटुगेदर के लिए कहीं बाहर जाती हैं तो किसी मंदिर का सहारा लेना सबसे अधिक सुरक्षित होता है। घर वाले निश्चिंत हो जाते हैं कि चलो कोई गड़बड़ नहीं होगी। वहाँ स्त्री को जाने की खुली छूट होती है। मेरी मित्र ने कहा कि जब घर वालों को पता चला कि मंमी पिकनिक मनाने चिन्सुरा या चूँचूडा़ जा रही हैं तो सवाल उठा कि वहाँ ऐसा क्या है? उसने कहा, ‘अरे भाई मंदिर है। सभी जा रही हैं। मित्रों के साथ, वह भी महिला मित्रों के साथ। ‘ तब ठीक है। हमारे बाल चाहे धूप में कितने ही पके हों, पति और बेटे-बेटियों के सामने हम भी बच्चे ही होते हैं। पहले हम उनके अभिभावक थे, अब वे हमारे अभिभावक बन जाते हैं।
इतना ही नहीं, मंदिर का शुद्ध और पवित्र वातावरण हमारे चरित्र निर्माण में सहायक होता है। किसी बार, रेस्तरां, होटल या डिस्को पार्टी को कभी- भी अच्छा नहीं माना गया है । ख़ासकर साठ से ऊपर वाली उम्र की स्त्रियों के लिए तो बिल्कुल भी नहीं क्योंकि उम्र के इस पड़ाव में उन्हें शांतिपूर्ण वातावरण और अच्छा व्यवहार मिल जाए तो उन्हें दुनिया मिल जाती है। उनका मन स्वस्थ हो जाता है। चलो मंदिर के बहाने कम से कम घूमना तो हो जाता है। इसीलिए आप देखेंगे कि स्त्रियाँ धर्म को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। स्त्रियाँ संस्कृति को संरक्षित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
पश्चिम बंगाल के हुगली नदी के साथ-साथ चलते हुए बाली में स्थित प्राचीन जटिया दिगंबर जैन मंदिर के दर्शन किए फिर आलम बाजार में स्थित श्री श्याम मंदिर जो सफेद संगमरमर का नक्काशीदार उत्कृष्ट और भव्य कला का नमूना है, वहाँ के भी दर्शन किए। श्री श्याम मंदिर हिंदू मंदिरों में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। श्री श्याम बाबा की अपूर्व कहानी मध्यकालीन महाभारत से आरम्भ होती है। वे पहले बर्बरीक के नाम से जाने जाते थे। वे अति बलशाली गदाधारी भीम के पुत्र घटोत्कच और दैत्य मूर की पुत्री मोरवी के पुत्र हैं। बाल्यकाल से ही वे बहुत वीर और महान योद्धा थे। उन्होंने युद्ध कला अपनी माँ तथा श्री कृष्ण से सीखी। नव दुर्गा की घोर तपस्या करके उन्हें प्रसन्न किया और तीन अमोघ बाण प्राप्त किये; इस प्रकार तीन बाणधारी के नाम से प्रसिद्ध नाम प्राप्त किया। अग्निदेव ने प्रसन्न होकर उन्हें धनुष प्रदान किया, जिससे वे तीनों लोकों में विजयी बनने में समर्थ हुए थे।श्री कृष्ण वीर बर्बरीक के महान बलिदान से काफी प्रसन्न हुए और उन्हें वरदान दिया कि कलियुग में तुम श्याम नाम से जाने जाओगे, क्योंकि उस युग में हारे हुए का साथ देने वाला ही श्याम नाम धारण करने में समर्थ है।
उनका शीश खाटू नगर (वर्तमान राजस्थान राज्य के सीकर जिला) में दफ़नाया गया इसलिए उन्हें खाटू श्याम बाबा कहा जाता है।
आलम बाजार में स्थित संगमरमर पत्थर से बना ये श्री श्याम बाबा का मंदिर कोलकाता के मारवाड़ी समाज के लिए विरासत है।हमलोगों ने वहाँ पहले जोत के दर्शन किए और घी से आहूति दी। लगा कि हम राजस्थान में ही हैं।यह संयोग ही था कि हमने बच्छ बारस के दिन ही उनके दर्शन किए जो महत्वपूर्ण रहा। हर कहानी में एक और कहानी जुड़ी रहती है। खैर अधिक विस्तार में जानना है तो दूसरे स्त्रोतों से जानकारी प्राप्त की जा सकती है।
फिर वहाँ से चिन्सुरा स्थित प्रसिद्ध और प्राचीन मंदिर क्षेत्रपाल भौमिया जी के मंदिर गए और वहीं पास में एक श्वेतांबर जैन मंदिर भी देखा।
चार मंदिरों की इस परिक्रमा में हम बीस महिला मित्रों की टोली ने बहुत मजे किए। ये तो मंदिर का बहाना था जिसके कारण हमने ट्रैवेल मीनी बस जो बीस सीटर एसी गाड़ी थी, एक लंबा रास्ता तय किया और साथ का आनंद उठाया।
अब अपनी कहानी शुरू होती है।
सबसे पहले हम लोग श्री पार्श्वनाथ भगवान के प्राचीन जटिया मंदिर गए जो बाली ब्रिज से होते हुए बांयी ओर से जाने वाले रास्ते पर था। वहाँ साधु महाराज जी भी आए हुए थे। दिगंबर साधू थे जो नग्न रहते हुए अपनी साधना करते हैं।
जैन धर्म के मुख्य रूप से दो संप्रदाय श्वेतांबर और दिगंबर संप्रदाय हैं। छठीं शताब्दी में भारत के प्रमुख धर्मों में जैन और बौद्ध धर्म रहे हैं ।इन धर्मों ने सम्यक् ज्ञान, सम्यक् चारित्र्य और सम्यक् दर्शन आदि की शिक्षा दी जिसमें ध्यान- समाधि- प्रज्ञा का विशेष महत्व दिया गया है। मनुष्य की शक्ति को उन्नत करने का प्रावधान इन धर्मों की विशेषता है। बुद्ध और महावीर की शिक्षाएंँ परिवार, समाज और देश के बौद्धिक निर्माण के साथ-साथ चरित्र, जीवन मूल्यों और आदर्श की धरातल को मजबूत करती हैं। व्यर्थ के आडंबरों और दिखावे से दूर कर स्वयं को श्रेष्ठ बनाने के लिए प्रेरित करते हैं। समय के परिवर्तन के साथ इन धर्मों में भी मूर्ति पूजा और संप्रदायों ने स्थान ले लिया है ।
मेरी कुछ महिला मित्र जैन नहीं थी, वे हिन्दू धर्म को मानने वाली थीं, वे जैन धर्म में विश्वास नहीं करतीं और जो जैन धर्म को मानने वाली थीं, वे हिन्दू धर्म से परहेज करती हैं। ये भी देखने को मिला। जैन धर्म श्रमण संस्कृति को मान्यता देता है। दोनों तरह की ही महिला मित्रों ने अपने – अपने विचारों को व्यक्त करते हुए कहा कि संभवतः आगे चलकर दिगंबर जैन साधुओं की परंपरा अधिक नहीं चलेगी क्योंकि ऐसे वीतरागी साधुओं की कमी आती जा रही है। यह बहुत ही कठिन साधना है। खैर, हम तो भाग्यशाली थे, जैन साधू के दर्शन भी किए। हिन्दू और जैन सभी मित्रों ने मिलकर भगवान पार्श्वनाथ जी के मंदिर में एकसाथ आरती और नमोंकार मंत्र का जप किया।ऐसा लग रहा था सच में, भारत सर्व – धर्म – समभाव की धरती है। इसमें तो कोई संदेह नहीं है
कहा गया है कि अगुणहिं सगुणहिं नहिं कछु भेदा।
उस समय सुबह के साढ़े नौ बजे थे। सभी नाश्ते की मांग कर रही थीं।
मैं बता दूँ कि साढ़े आठ बजे के लगभग हम सभी हावड़ा आईडियल ग्रेंड से ट्रैवल बस में निकल पड़े थे। सभी मित्रों को रेणु ने रोली- टीका लगाया और मीठी सौंफ की एक डिब्बी देकर स्वागत किया जो भारतीय संस्कृति की पहचान है और फिर गाड़ी में अपनी-अपनी सीट पर सभी बैठ गईं।
लक्ष्मी कानोडिया के पति ने हम सभी के लिए गर्म – गर्म समोसे, गांठिया और पापड़ी के साथ आम, अमरूद के थैलै संभला दिए थे। लक्ष्मी ने नाश्ते के लिए ब्रेड – बटर के पैकेट, चटनी, नमक, काली मिर्च के डिब्बे और केले आदि सारे खाने-पीने के सामान संजोकर एक बास्केट में रखे थे। गर्म समोसे के मसाले की खुशबू ने सबके मुंँह में पानी ला दिया था। गाड़ी ज्यों ही रवाना हुई , सबने कहा समोसे ठंडे हो जाएंगे, खा लेते हैं। सबने एक – एक समोसे चटनी के साथ खाए। खूब बढ़ाई मिली लक्ष्मी के पति कानोडिया भाईसाहब को ।
लक्ष्मी ने बताया कि दुकान वाले से उन्होंने कह दिया था कि सभी नाश्ता ताजा बना कर देना। वे स्वयं जाकर नाश्ता का सामान ले आए। महिलाओं को तो बातें बनाना आता ही है। सभी कहने लगीं कितने अच्छे पति हैं लक्ष्मी के। लक्ष्मी का हर आदेश सिर आँखों पर जो रखते हैं। वे दोनों मानो एक दूजे के लिए ही बने हैं। प्रशंसा करते- करते सारे समोसे चट कर दिए गए।
प्रमुख रूप से हमारा प्रोग्राम भोमिया जी के दर्शन का ही था। आईडियल ग्रेंड की रेणु ने सारा इंतजाम अपने ऊपर लिया था । वह स्वयं जैनी है और यह जैन मंदिर उसके लिए महत्वपूर्ण तीर्थस्थल भी है। सो ढाई से तीन घंटे के भीतर चिन्सुरा या चूँचूडा़ जो हुगली जिले में स्थित है, भोमिया जी के मंदिर में पहुंँचे। वे नगर रक्षक यानी क्षेत्रपाल हैं।इस मंदिर का नाम ही क्षेत्रपाल मंदिर है। हम जब वहाँ पहुँचे, उनका श्रृंगार हो रहा था। उनके प्रमुख चेहरे पर सिंदूरी रंग का लेप लगाया जा रहा था। सोने की मूँछ और आँखों में तेज झलक रहा था। प्रमुख चेहरे से बायीं ओर सटा एक और चेहरा है। इसकी भी कहानी है। भूमिया देवता को भूमि का रक्षक देवता माना जाता है, इसी वजह से इन्हें क्षेत्रपाल भी कहा जाता है। खेतों में बुवाई किए जाने से पहले पहाड़ी किसान बीज के कुछ दाने भूमिया देवता के मंदिर में बिखेर देते हैं। विभिन्न पर्व-उत्सवों के अलावा रबी व खरीफ की फसल पक जाने के बाद भी भूमिया देवता की पूजा अवश्य की जाती है। एक और प्रसंग आता है। गौरक्षा करते हुए, बिना सर के धड़ के सहारे रणभूमि में दुश्मनों के छक्के छुड़ाने तथा एक रक्षक के रूप में अपनी राजपूती आन बान और शान प्रदर्शित करने के कारण सवाई सिंह भोमिया के रूप में पूजे जाने लगे।
श्री दिगंबर जैन मंदिर क्षेत्रपाल भैरों जी के मंदिर का पुनर्निर्माण विक्रम संवत 1996 में किया गया इसकी गणना प्राचीन मंदिरों में होती है। यह मंदिर चिन्सुरा में श्री दिगंबर जैन बड़ा मंदिर एक बैशाख लेन कलकत्ता – 700007 में स्थित है। मंदिर की दीवारों पर बाबा की आरती और बाबा की पूजा का विधान लिखा है। यहाँ तीन भवन बने हैं जिनके नाम सम्यक चारित्र्य, सम्यक ज्ञान और सम्यक दर्शन हैं । हम लोग सम्यक चारित्र भवन में ठहरे । उसके बड़े अहाते में कुर्सियाँ लगा कर बैठे थे , उसी में हमलोगों के विश्राम करने के लिए दो कमरे खोल दिए गए थे । सभी मित्रों ने विश्राम कर तरोताजा होकर भोमिया जी का दर्शन किया। यहीं हमारे भोजन की व्यवस्था की गई थी जो बहुत ही अच्छी व्यवस्था थी। भोजन में गेहूंँ की रोटी, चावल, दाल, गट्टे की सब्जी, भरवाँ परवल, मिस्सी रोटी, सलाद खीरा टमाटर का, बूंदी रायता,कच्चे आम और हरी मिर्च की लूंजी, पापड़ आदि थे जो स्वच्छता से बनाए गए। स्वादिष्ट और पौष्टिक भोजन सभी ने मिलकर कुछ ज्यादा ही खाया। फिर नाश्ते में भी हमें चाय के साथ पकौड़े खाने को मिले। लक्ष्मी भी अपने साथ बहुत सारी खाने की चीजें लाई थी। मित्रों के साथ खाने में बहुत आनंद आया। भोजन तो घर में भी करते हैं परंतु घर में तो दो रोटियाँ भी रुचि से नहीं खाई जाती। सच है कि यहाँ सब मित्रों के साथ सभी ने बहुत ज्यादा खाया। भोजन के बाद बहुत सारे गेम खेलें, अंत्याक्षरी खेली, अपनी-अपनी राम कहानी सुनी और सुनाई।
किसी ने पति की जम कर बुराई की क्योंकि वह पत्नी के साथ फोटो नहीं खिंचवाते, किसी के पति घर की बातें पूरी दुनिया को बता देतें है पत्नी को बाद में मालूम पड़ता है, किसी ने अपनी सुहागरात की बात बताई और अफसोस जताया कि हमारे समय में तो आज की तरह हनीमून पैकेज की व्यवस्था नहीं थी, ऐसे ही धर्मशाला में पहली रात मना ली , किसी को तो पता ही नहीं चला कि पहली रात उसके साथ क्या हुआ, सुबह सबकुछ अस्त व्यस्त देखा तो जाना, पत्नी को बताया गया कि तेरा पति बहुत अच्छा आदमी है, किसी ने कहा कि उसे तो सुहागरात के दूसरे दिन मेंस हो गया था, उस समय तो कपड़ा ही लगाया जाता था सो बहुत ही मुश्किल हुई।
सभी मित्रों की उम्र 60से 70 के बीच में थी। 70 वाली सबसे अधिक चुस्त-दुरुस्त थीं। उनका दैनंदिन जीवन अनुशासन से पूर्ण है। समय पर उठना, खाना-पीना और सूरज ढलने से पहले भोजन कर लेना। शाकाहारी जैन भोजन खाने से व्यक्ति स्वस्थ और ऊर्जा से भरा रहता है, यह उनके चेहरे के तेज से ही पता चल रहा था।
कई अनुभवों को साझा किया गया। उस समय की सास भी बहुत कठोर हुआ करती थी। उस जमाने में पति रात में सोते समय ही पत्नी के कमरे में आते थे । दिन में पति से बात भी कर लो तो बुरा माना जाता था। हमारी वरिष्ठ मित्र ने बताया कि कैसे दरवाजा को पीट – पीट कर रात में भी पति को अंदर कमरे में बुलाना पड़ता था क्योंकि वे तो अपने भाईयों और पिता के साथ बातें करने में लगे रहते थे। हम लोग तो घूंघट में रहते थे। परंतु आज सास की गिनती अच्छे रूप में की जाती है। वह भी समय के साथ स्वभाव को बदलने में कुछ हद तक कामयाब हुई है। अब उसे बहू के हिसाब से चलना पड़ता है और सास उसे बहू नहीं, बेटी की दृष्टि से देखती है। यह अभी भी अपवाद है लेकिन कोशिश चल रही है।
भोमिया मंदिर के पास की गली में एक श्वेतांबर मंदिर भी है। खाना खाने के बाद हमलोग वहाँ भी गए। वहाँ पर बहुत सुंदर बगीचा था जिसे बहुत तरह-तरह के फूलों और पेड़ों से सजाया गया था। सभी मित्रों ने फोटो खिंचवाई और सेल्फी ली। अलग-अलग पोज देकर कभी पेड़ों के झुरमुट के पीछे तो कभी, फूलों को छूते हुए। यही तो जीवन के छोटे- छोटे क्षण हैं जिन्हें हम याद रखते हैं। रंगों से भरी मुस्कान लिए सभी की फोटो को व्हाट्सएप ग्रुप मस्ताना और फेसबुक में सब जगह लगाया गया। यह सब काम गाड़ी में जाते समय ही कर लिया गया। लौटते समय गाड़ी में राजस्थानी, अंग्रेजी और हिंदी फिल्मों के गीतों पर ठुमके लगाए। मस्ती भरे गाने गाए, अंत्याक्षरी गीत और डांस किए और अपने मन की भड़ास जो हम घर में नहीं निकाल पाते हैं, वह सभी ने जम कर निकाला। हम लोगों ने एक से एक बढ़कर गाने भी गाए, कुछ तो नॉनवेज गाने भी गाए गए। महिलाएँ अपने मन की बातों को एक दूसरे से बांँटकर खुश दिख रही थीं। घर के बंद तालों को मानो चाबी मिल जाती हैं। फिर तो बंद दरवाजे परत – दर परत एक के बाद एक खुलने लगते हैं। अपना पूरा निकाल कर सारी चीजें बोल देते हैं।
आज से नहीं, प्राचीन काल से स्त्रियाँ अपने आप को अपनी ही संगत से अपने मित्रों के साथ बहुत प्रेम से हर बात को साझा करती आई हैं और संस्कृति को आगे बढ़ाने की सशक्त माध्यम हैं। बच्चों की देखरेख करना आदि विभिन्न कार्यों में अपना पूर्णरूपेण योगदान देती आईं हैं। भारतीय समाज की मजबूत स्तंभ ही स्त्री है। आधुनिक युग के बदलते परिवेश में व्यक्ति विशेष को अधिक महत्व दिया जाने लगा है जिसके कारण संवेदनाएँ भी संकुचित हुई हैं। रिश्तों को लेकर पारिवारिक सास- बहू के रिश्तों में बहुत ही उथल-पुथल की स्थिति आई है जिसको निभाने में दोनों ही पक्षों में खींचातानी चलती रहती है। इस यात्रा में बहुत कुछ सीखने और जानने का अवसर मिला। रिश्तों में मिठास रहे उसके लिए चुप रहना सबसे बड़ी दवाई है जो धीरे धीरे संबंधों को निभाने में मदद करती है। एक समय के बाद सास – बहू घर के वातावरण से सामंजस्य करती दिखाई पड़ती है क्योंकि दोनों का ही एक नए घर से सामना होता है। आज की युवा पीढ़ी का स्वभाव है तुरंत प्राप्ति। जिसके कारण आज की युवा पीढ़ी का जो तालमेल है वह नहीं बैठ पाता है और सास कहीं न कहीं अपने – आप को अकेला महसूस करती है, उसका आक्रोश तब बढ़ जाता है। वे कहती हैं कि मैंने इतना कुछ किया है और तब भी वही ढाक के तीन पात। अलग – अलग रहने के बाद भी आपस में नहीं बनती है जो कष्टकारी है। सास बनने के बाद माँ से बेटा बहू बात तक नहीं करते तो दुख दुगना हो जाता है। इसी ऊहापोह में जिंदगी के कुछ क्षण यदि सुकून के मिल जाएं तो फिर से ऊर्जा मिल जाती है। फिर से जिंदगी हसीन हो जाती है। हर व्यक्ति की अपनी खुशी होती है और रिश्ते मजबूत हों तो जिन्दगी बहुत आसानी से कटती है बिल्कुल रेशमी कपड़े की तरह फिसलती चली जाती है।
शारदा जी ने पति-पत्नी और वो जैसे गेम में खिलाए। हमेशा की तरह लक्ष्मी ने कॉंच की गोलियों से शोले के गब्बर सिंह की स्टाइल में गेम खिलाया वहीं रेणु ने व्यवस्था में योगदान दिया। गेम में जीतने के बाद गीफ्ट भी सबके मनपसंद के थे। पुष्पा जी को लिपस्टिक मिली, प्रेम को नेलपालिश और फिर फोटो तो खिंचनी तो बनती ही थी। सच में, प्रेम से इस यात्रा की शुरुआत हुई और प्रेम से समाप्त हुई–मेरी कविता’ गंगाजल’ की ये पंक्तियाँ -‘ प्रेम छल छल कल कल करता उद्दाम वेग से /हिम शिखरों से पिघलता गंगा जल है ‘। हम मित्रों की टोली फिर किसी यात्रा पर है और आपसे अपनी कहानी साझा करने के लिए फिर मिलते हैं। धन्यवाद। डॉ वसुंधरा मिश्र का नमस्कार।

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