मन्नू भंडारी होने का मतलब

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प्रो. गीता दूबे

मन्नू भंडारी की पहली रचना कब पढ़ी थी, वह तो याद नहीं लेकिन इतना जरूर याद है कि जब बचपन से किशोरावस्था की यात्रा करते हुए मेरी रुचि हिंदी कथा -साहित्य की ओर जागृत हुई तो प्रेमचंद के अलावा जिन लेखिकाओं के साहित्य ने प्रभावित किया उनमें एक महत्वपूर्ण नाम मन्नू भंडारी जी का था। कॉलेज में पढ़ने लगी तो इनके नाम और रचनात्मक अवदान के चर्चें सुनाई देने लगे। कोलकाता के हिंदी अध्यापक और साहित्यकार इस गर्व बोध से भरे नजर आते थे कि मन्नू जी का कलकत्ते से प्रगाढ़ रिश्ता रहा। कहा जा सकता है कि उनके रचनात्मक व्यक्तित्व का गठन भी यहीं रहते हुए हुआ। पहली कहानी “मैं हार गई” (1956)  यहीं रहते हुए छपी और इसी नाम से प्रथम कहानी संग्रह (1957) भी उनके कलकत्ता में रहते हुए ही राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित हुआ। राजेन्द्र जी के साथ उनका प्रेम भी यहीं परवान चढ़ा। उस समय मन्नू जी बालीगंज शिक्षासदन ( वर्तमान में “द बी एस एस”) में हिंदी की अध्यापिका के रूप में कार्यरत थीं और राजेंद्र जी स्कूल की पुस्तकालय को संवारने तथा पुस्तकों का चयन करने के लिए नियुक्त किये गये थे। उनका विवाह इसी स्कूल के प्रांगण में संपन्न हुआ था और बिटिया टिंकू अर्थात रचना का जन्म भी इसी कलकत्ते में हुआ। स्कूल में अध्यापन के बाद उन्होंने कुछ अरसा रानी बिड़ला कॉलेज में भी अध्यापन -कार्य किया इसलिए कलकत्ते के‌ लोगों का उन पर हक जताना स्वाभाविक ही है। बाद में मन्नू जी राजेन्द्र जी के साथ दिल्ली चली गईं लेकिन कलकत्ता के लोगों के दिलों में हमेशा बनी रहीं। मेरी एक मित्र हैं, रेणु गौरीसरिया जो  बालीगंज शिक्षा सदन में मन्नू जी की शिष्या थीं और वर्षों उसी स्कूल में अध्यापन करने के बाद अवकाश ग्रहण कर चुकी हैं। रेणु दी के सामने मन्नू जी का नाम भर‌ ले लो कि उनका चेहरा मन्नू जी के प्रति स्नेह और आदर की आभा से चमक उठता है, दिल -दिमाग में बसे अनंत किस्सों का दरवाजा खुल जाता है और वह उमगते हुए अपनी स्मृतियों को साझा करने लगती हैं। उन्होंने अपनी आत्मकथा “ज़करिया स्ट्रीट से मेफे़यर रोड” में भी मन्नू जी से जुड़े कई प्रसंगों को भावभीने ढंग से चित्रित किया है। ऐसा सिर्फ उनके साथ ही नहीं है बल्कि बहुत से लोग, वे लेखक हों या साधारण पाठक अगर एक बार मन्नू भंडारी के संपर्क में आए, अब वह रचनात्मक हो या व्यक्तिगत, उनके सहज- सरल ओर स्नेहिल व्यक्तित्व के सम्मोहन से मुक्त नहीं हो सकते।

कह सकती हूँ कि मन्नू भंडारी के बारे में सुन- सुन कर ही उनके प्रति मन में श्रद्धा मिश्रित प्रेम ने स्थान बना लिया था। कॉलेज में पढ़ते समय स्कूल के बच्चों को ट्यूशन पढ़ाते हुए उनकी किताबों में मन्नू जी की दो कहानियाँ पढ़ीं- “खोटे सिक्के” और‌ “दो कलाकार”। संभवतः “रानी माँ का चबूतरा” भी उसी दौरान पढ़ी। स्वाभाविक रूप से इन कहानियों ने‌ न केवल अपनी विषयवस्तु के कारण बल्कि बेहद सहज शैली और सरल भाषा के कारण भी प्रभावित किया। उस दौरान उनके दोनों उपन्यासों “आपका बंटी” (1971) और महाभोज (1979) की बड़ी चर्चा थी। “आपका बंटी” पढ़ने की सलाह तो अध्यापिकाएँ तपाक से देती थीं और स्वाभाविक ही था कि अपने महाविद्यालय के अति समृद्ध पुस्तकालय से लेकर यह उपन्यास मैंने पढ़ा । पढ़ते हुए बहुत बार मन तकलीफ से भर गया और आँसू छलक आए। ये आँसू उन आँसुओं से बिल्कुल अलग थे जो “गुनाहों का देवता” पढ़ते हुए उमड़े थे। कहा जाता है कि यह उपन्यास मोहन राकेश के जीवन से प्रेरित था और इस ने समाज को दिशा देने का काम किया। इसे पढ़ने के बाद न जाने कितने दंपतियों के बीच विवाह- विच्छेद इसलिए टल गये क्योंकि वे अपने बच्चों को बंटी की तरह अधर में झूलते नहीं देख सकते थे। बंटी का दुख तो सबने देखा, मन्नू जी की तारीफ भी की कि उन्होंने सैकड़ों परिवारों को टूटने से बचा लिया लेकिन मन्नू जी पीड़ा यह रही कि बंटी के दर्द के पीछे शकुन का दर्द छिप गया। उस पर पाठकों की निगाह उस तरह नहीं पड़ी जिस तरह लेखिका ने चित्रित किया था। विवाह टूटने से परिवार बिखरता है और बच्चे भटकाव का शिकार होते हैं लेकिन एक स्त्री, जिस पर तलाक थोप दिया जाता है किस तकलीफ से गुजरती है, इस सच की ओर भी मन्नू जी समाज के लोगों का ध्यान आकर्षित करना चाहती थीं। परिवार में जब दरकन इतनी ज्यादा हो जाती है कि उसका बना रहना मुमकिन नहीं होता तो टूटना ही बेहतर होता है। लेकिन टूटन की यह प्रक्रिया स्त्री को भी अंदर तक तोड़ देती है। शकुन की मानसिक उथल- पुथल और पीड़ा को मन्नू जी ने कुशलता से उकेरा है-  “एक अध्याय था, जिसे समाप्त होना था और वह हो गया। दस वर्ष का यह विवाहित जीवन- एक अँधेरी सुरंग में चलते चले जाने की अनुभूति से भिन्न न था। आज जैसे एकाएक वह उसके अंतिम छोर पर आ गई है। पर आ पहुँचने का संतोष भी तो नहीं है, ढकेल दिए जाने की विवश कचोट-भर है। पर कैसा है यह छोर ? न प्रकाश, न वह खुलापन। न मुक्ति का एहसास। लगता है जैसे इस सुरंग ने उसे एक दूसरी सुरंग के मुहाने पर छोड़ दिया है- फिर एक और यात्रा- वैसा ही अंधकार, वैसा ही अकेलापन।” तकलीफ इस बात की भी है कि टूटने का सारा दोष स्त्री के सिर पर ही पड़ता है। उसे ही सुनना पड़ता है कि वह अपने पति को बाँध कर नहीं रख पाई। शकुन का चरित्र गढ़ते हुए मन्नू जी ने उसे आम पारंपरिक औरतों से अलग गढ़ा। वह उसे आधुनिक दृष्टि से संपन्न नारी के रूप में गढ़ती हैं जो पुत्र की देखभाल को ही जीवन का एकमात्र लक्ष्य ना मानकर अपनी खुशी और इच्छाओं के बारे में भी सोचती है और इसीलिए पुनर्विवाह का निर्णय लेती है। इसका एक कारण संभवतः पूर्व पति अजय को यह दिखाना भी था कि अगर वह उसे मीरा के लिए छोड़ सकता है तो शकुन भी डॉक्टर जोशी के साथ नयी जिंदगी की शुरुआत कर सकती है।  वह नये वैवाहिक रिश्ते में अपने और बंटी के लिए खुशियाँ तलाशने की कोशिश करती है। लेकिन अपने इस निर्णय के लिए भी उसे लोगों की व्यंगपूर्ण दृष्टि का सामना करना पड़ता है। फूफी तो उसके मुँह पर ही कहती है- “जवानी यों ही अंधी होती है बहूजी, फिर बुढ़ापे में उठी हुई जवानी। महासत्यानाशी ! साहब ने जो किया तो आपकी मिट्टी- पलीद हुई और अब आप जो कर रही हैं, इस बच्चे की मिट्टी पलीद होगी। चेहरा देखा है बच्चे का ? कैसा निकल आया है, जैसे रात दिन घुलता रहता हो भीतर ही भीतर।” हालांकि इस विवाह के बावजूद न शकुन को खुशी मिलती है न बंटी को। शकुन तो परिस्थितियों से सामंजस्य बिठाने की कोशिश करती भी है लेकिन बंटी असुरक्षा बोध से घिरकर, मानसिक उथल-पुथल से भरकर पिता के पास भेजा जाता  और फिर वहाँ भी सामंजस्य न बिठा पाने के कारण अंततः छात्रावास भेजा जाता है।  उपन्यास के इस कारुणिक अंत ने तो बहुत से परिवारों को बिखरने से बचा लिया लेकिन स्वयं मन्नू जी ने अपने परिवार को बचाए रखने के वर्षों के प्रयास के बाद खुद ही उसे तोड़ने का निर्णय लिया था। यह बात और है कि तब तक काफी देर हो चुकी थी। पारिवारिक दायित्वों के प्रति राजेंद्र जी का असहयोगात्मक आचरण और वर्षों तक किया गया मानसिक उत्पीडन, जो शारीरिक हिंसा से कई गुना ज्यादा घातक होता है, ने मन्नू जी के मन पर गहरा आघात किया था। उनकी रचनात्मकता को क्षति पहुँचाई थी और एक लेखक के लिए सृजन न कर पाने की पीड़ा असहनीय होती है। संभवतः इसी पीड़ा ने उन्हें उस स्नायु रोग की ओर ढकेला जिसने अंततः उनकी जान ले ली। ओमा शर्मा ने उनसे की गई बातचीत में जो “मेरे साक्षात्कार” ( 2015) में संकलित है, जब उनसे उनके दुखों के बारे में पूछा तो मन्नू जी का जवाब उनकी व्यथा को बयान करने के लिए काफी है- “न लिख पाने का दुख है। और वैसे कहूँ तो राजेंद्र ने मुझे बहुत दुख दिए हैं। बहुत रातें मैंने रोकर काटी हैं। इतने तनाव में रही हूँ।….इस बीमारी का मुख्य कारण तनाव ही बताया जाता है। मैं राजेंद्र से कहती भी हूँ कि आपने मुझे और कुछ दिया हो या न दिया हो, यह बीमारी जरूर दे दी है।”

बाद में मैंने उनका उपन्यास “महाभोज” भी पढ़ा और ढेरों कहानियाँ भी। “महाभोज” के यथार्थ चित्रण ने दिमाग को सुन्न कर दिया। भ्रष्टाचार से घिरी राजनीतिक व्यवस्था में कहीं कोई आशा की किरण दिखाई नहीं देती। भारतीय राजनीति पर छाए कृष्ण पक्ष की कथा बड़ी कुशलता और सघनता के साथ ही विश्वसनीयता के साथ मन्नू जी ने लिखी। मूल्यहीनता भारतीय राजनीति में नये मूल्यबोध के रूप में स्थापित हो रही है और मूल्यों की बात करने वालों को या तो बिसेसर की तरह जहर दे दिया जाता है, बिंदा की तरह जेल में ठूंस दिया जाता है,  सक्सेना की तरह सस्पेंड कर दिया जाता है या फिर लोचन की तरह बिल्कुल अलग -थलग कर दिया जाता है और आम जनता रुक्मा की तरह रुदन करती रहती है। भारतीय राजनीति के विकास की गौरवगाथा (?) में सांसदों और मंत्रियों के खरीद- फरोख्त के ढेरों किस्से हमने पिछले कुछ वर्षों में खूब पढ़े और सुने। अपने इस उपन्यास में इस तरह की घटनाओं का यथार्थ चित्रण करते हुए मन्नू जी ने इस ओर संकेत किया है कि आगामी वर्षों में राजनीति कितनी अधिक भ्रष्ट और दूषित होने वाली है और वर्तमान समय में यह साफ नजर आ रहा है। गीतापाठी तथाकथित धार्मिक नेता दा साहब किसी गिद्ध की तरह जनता की आशाओं, आकांक्षाओं यहाँ तक कि उनके जीवन तक की बलि चढ़ाकर किस तरह अपनी महत्वाकांक्षाओं का महाभोज संपन्न करते हैं, इसका मर्मस्पर्शी चित्रण इस उपन्यास में हुआ है।  विषयवस्तु के नयेपन और वर्णन शैली की जीवंतता ने‌ न केवल पाठकों को प्रभावित किया बल्कि साहित्यिक हलके में भी उनके व्यक्तित्व को नई ऊंचाइयाँ प्रदान की। घर- परिवार और समाज की सीधी- सरल कहानियाँ कहने वाली लेखिका के रूप में जानी जाने वाली मन्नू जी की स्वीकृति नये रूप में हुई। राजेन्द्र यादव प्रेमी आलोचकों ने उनके व्यक्तित्व को हमेशा राजेन्द्र जी से कम करके आंका लेकिन आम पाठकों की बात करें तो मन्नू भंडारी हमेशा उनके हृदय के अधिक निकट रही हैं। उनकी रचनाएँ अपनी जीवंतता और रवानी में पाठकों को सहजता से बाँध लेती हैं। इस उपन्यास का नाट्य रूपांतरण उन्होंने स्वयं किया जो 1983 में प्रकाशित हुआ। इसका मंचन पहली बार राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय दिल्ली के रंग-मंडल ने मार्च 1982 में किया और देश भर में अब तक इसके कई सफल मंचन हो चुके है। प्रसिद्ध रंगकर्मी ऊषा गांगुली जी ने भी कलकत्ते में इस नाटक का सफल मंचन किया।

“एक इंच मुस्कान” जिसे लेखक दंपति ने प्रयोग के तौर पर मिलकर लिखा था में भी मन्नू जी के अध्याय अधिक स्वाभाविक और पठनीय बन पड़े हैं और इस तथ्य को स्वयं राजेंद्र जी ने अपने लेखकीय वक्तव्य में स्वीकार किया है। हालांकि यह प्लॉट भी मन्नू जी का ही था जिसे इस प्रयोग के लिए राजेंद्र जी ने चुन लिया था और मन्नू जी को समझा- बुझा कर राजी भी कर लिया था। यह बात और है कि मन्नू जी को इसका कोई मलाल नहीं रहा। एक प्रेम त्रिकोण जो जितना काल्पनिक था उतना ही सच, की दुखांत कथा इस प्रयोगधर्मी उपन्यास में अत्यंत सशक्त ढंग से अभिव्यक्त हुई है।

मन्नू जी की कहानियों की बात करें तो “एखाने आकाश नाई”, “स्त्री सुबोधिनी”, “ईसा के घर इंसान”, “एक प्लेट सैलाब”, “सजा”, “नायक खलनायक विदूषक”  समेत उनकी तकरीबन सभी कहानियाँ मैंने पढ़ी हैं और सबने अपना अलग -अलग प्रभाव डाला है। कामकाजी औरतों की दुनिया से हमारा प्रथम परिचय मन्नू जी ही करवाती हैं। हालांकि उनकी रचनाएँ नारीवाद का झंडा बुलंद ‌नहीं करती लेकिन नारी के अंतर्मन की पड़ताल गंभीरतापूर्वक करती हुई, उनके संघर्षों से हमें परिचित करवाती हैं और सहजता लेकिन गंभीरता के साथ उसकी निसंगता, अकेलेपन के साथ ही उसके जीवन की चुनौतियों को भी सामने रखती हैं। “यही सच है” की दीपा दो शहरों और दो प्रेमियों के बीच झूलती हुई अंततः अपने सच को स्वीकार कर लेती है तो “स्त्री सुबोधिनी” की नैरेटर कामकाजी स्त्रियों की महत्वाकांक्षाओं, आशाओं और‌ टूटन को सामने रखती हुए अपनी बहनों को जीवन के कुछ महत्वपूर्ण सूत्र सौंपती है जिससे वे गुमराह और प्रताड़ित होने से बच जाएँ। उनकी कहानियों में हास्य और व्यंग का पुट भी सहजता से‌ लक्षित किया जा सकता है। “अकेली” कहानी के माध्यम से सोमा बुआ के अकेलेपन और समाज से जुड़ने की‌ ललक की कथा कहनेवाली मन्नू जी ने “सयानी बुआ” की कथा में सयानी बुआ के सयाने स्वभाव का वर्णन बहुत रोचक और विनोदपूर्ण ढ़ंग से किया है। “त्रिशंकु” में तो वह तथाकथित आधुनिकता पर बड़ी सरसता से व्यंग्य करती हैं और प्रकारांतर से अपनी ही पीढ़ी को सवालों के घेरे में खड़ा करती हैं। “तीसरा हिस्सा” के तथाकथित प्रगतिशील शेरा बाबू के माध्यम से वह कुंठित मर्दवादी मानसिकता को चित्रित करती हैं। यह कहानी इस मायने में थोड़ी भिन्न है कि पुरूष की स्त्रियों के प्रति सोच को बेबाकी से सामने लाती है। पत्रिका निकाल कर क्रांति का दंभ पालने वाले शेरा बाबू भी सफल स्त्री के बारे में यही सोच रखते हैं- ” ऊँचे ओहदों पर पहुँचने के लिए दो ही लियाकत होनी चाहिए औरत में। – बड़े बाप की बेटी या अफसर संग लेटी।” और ऐसी मानसिकता महज शेरा बाबू की नहीं बहुत से पुरुषों की है जो आधुनिकता की ऊपरी खोल के बावजूद बेहद संकीर्ण और रुढिवादी होते हैं। ऐसे पाखंडी लोगों को मन्नू भंडारी साहस के साथ अपनी रचनाओं में बेनकाब करती हैं। उनकी अंतिम दो कहानियाँ ‘हंस’ के जनवरी (2022) अंक में प्रकाशित हुई हैं जिनमें “सीढियों पर बैठी लड़की” नामक कहानी में उन्होंने अपने माँ के जीवन में घटी घटनाओं के हवाले से पूरी स्त्री जाति के प्रति हुए अन्याय और शोषण को क्षोभ के साथ व्यक्त किया है। क्षोभ के साथ दुख भी है कि बेटी जिसे शोषण समझकर आक्रोश से भर उठती है, माँ के लिए वे बातें बिल्कुल सहज हैं। पितृसत्ता स्त्री की मानसिक संरचना की बचनावट इस ढंग से करती है कि वह अपने साथ हुए शोषण की निशानदेही तक नहीं कर पाती। “गोपाल को किसने मारा” मानवीयता के मर जाने और संवेदनशीलता के पथरा जाने की कथा है। दो बेटों का पिता रामनिझावन बुढापे में अकेला पड़ जाता है क्योंकि बड़ा बेका गोविंदा बिजली का करंट लगने से मर जाता है और छोटा गोपाल पसरते बाजार की बाजारू आधुनिकता के फेर में पड़कर अपनी आत्मा और विवेक को कुचल देता है। कहानी में उठाया गया सवाल पाठकों की चेतना को झकझोर कर रख देता है। मन्नू भंडारी की सशक्त सृजन शक्ति का ठोस उदाहरण प्रस्तुत करती हैं, दोनों कहानियाँ। साथ ही यह सिद्ध भी करती हैं कि उनकी रचनात्मक क्षमता चुकी नहीं थी, बीमारियों ने उसे कुछ समय के लिए मंद जरूर कर दिया था।

“एक कहानी यह भी” के माध्यम से जब मन्नू जी अपनी कथा सबको सुनाने का निर्णय लेती हैं तब भी वह बहुत उघाड़ने या औरों को सुनाने- समझाने की कोशिश करने की जगह अपने निजी जीवन और संघर्ष की कुछ झलकियाँ पाठकों के समक्ष रखती हैं। किसी को छोटा करके खुद को बड़ा करने की चाह उनके अंदर कहीं नजर नहीं आती। बेकार के आरोप- प्रत्यारोपों में उलझने के बजाय वह बड़ी सहजता और साफगोई से अपने जीवन के खट्टे- मीठे पलों को सबके साथ साझा करती हैं। साहित्य और जीवन के बीच की कड़ी को जोड़ने या छोड़ने को लेकर उनके मन में दुविधा भी उठती है- “लेखन और साहित्य से हटकर अपने निजी जीवन की त्रासदियों भरे ‘पूरक प्रसंग’ को लेखकीय जीवन पर केंद्रित अपनी इस कहानी में सम्मिलित किया जाए या नहीं, इस दुविधा ने कई दिनों तक मुझे परेशान रखा। अपने कुछ घनिष्ठ मित्रों से सलाह ली और उनके आग्रह पर अंततः इसे सम्मिलित करने का निर्णय ही लिया।” और उन्हीं के शब्दों में कहें तो “पूरी आवेगहीन तटस्थता” के साथ उन्होंने अपना निजी जीवन भी एक कहानी की तरह पाठकों के समक्ष रख दिया और निर्णय का अधिकार पाठकों पर ही छोड़ दिया। लेकिन मर्दवादी आलोचक मन्नू जी पर यह आरोप लगाने से नहीं चूके कि उन्होंने एक स्त्री होने के नाते दूसरी स्त्री अर्थात मीता की व्यथा को नहीं समझा और उसके दुख दर्द को अपनी कथा में पिरोकर उसे असाधारण बनाने से चूक गईं। इसका सम्यक उत्तर तो मन्नू जी ने अपने साक्षात्कार में दिया ही है, राजेंद्र जी के साथ हुए इस वार्तालाप का ब्योरा भी दिया है- “एक बार मैंने राजेंद्र जी से पूछा था कि जैसा आपने किया, वैसा ही अगर मैं करती…तो क्या आप बर्दाश्त करते। वे कुछ देर चुप रहे, फिर कहा, ‘नहीं, मैं बर्दाश्त नहीं कर पाता।” मन्नू जी का साहित्य ही नहीं जीवन भी स्त्रियों के प्रति हुए अन्याय का गवाह है। समाज और साहित्य दोनों में स्त्रियों के प्रति दोयम दरजे का व्यवहार होता है लेकिन आशा यही कि जाती है कि वे दया, सद्भावना और त्याग की प्रतिमूर्ति बनी रहेंगी। मन्नू जी ने भी यह सब कम नहीं झेला।

दूरदर्शन के बहुचर्चित  धारावाहिक “रजनी” समेत कई लोकप्रिय धारावाहिकों और फिल्मों की पटकथा मन्नू जी ने लिखी और दो नाटकों- “बिना दीवारों के घर” तथा “उजली नगरी चतुर राजा” (2013)  की रचना भी की है। नाटककार के रूप में तो‌ इनकी  बहुत अधिक चर्चा नहीं होती लेकिन पटकथा लेखक के तौर पर‌ ये काफी सफल रहीं। “कथा-पटकथा” (2003) जिसमें विभिन्न भाषाओं की कुल आठ कहानियाँ और उनपर केंद्रित मन्नू जी द्वारा लिखित पटकथाएँ संकलित हैं, में सशक्त फिल्म निर्देशक और पटकथा लेखक बासु चटर्जी जिन्होंने उनकी कहानी “यही सच है” पर “रजनीगंधा” नाम से एक सफल ओर चर्चित फिल्म बनाई थी, ने इनकी लेखन प्रतिभा का आकलन करते हुए लिखा है – “मन्नू भंडारी एक प्रसिद्ध लेखिका हैं और उन्हें साहित्यिक कृतियों के फिल्मांतरण और बारीकियों की जबर्दस्त समझ है। अपने उपन्यास महाभोज का नाट्य रूपांतरण करके भी उन्होंने इसे सिद्ध कर दिया है।”

दरअसल मन्नू भंडारी होने का मतलब नई कहानी आंदोलन का एक सशक्त और सहज स्तंभ होना तो है ही जिनकी स्वीकृति और छाप जितनी साहित्य की किताबों में है, उतनी ही आम पाठकों  के दिलों दिमाग पर है। आधुनिक नारी की समस्याओं को सफलतापूर्वक अपनी रचनाओं के माध्यम से साहित्य के केंद्र में लाने का श्रेय भी उन्हें ही जाता है। नई कहानी आंदोलन की एकमात्र स्त्री हस्ताक्षर होने के साथ ही वह स्त्री मन की प्रतिनिधि रचनाकार भी थीं और बच्चों तथा किशोरों के लिए भी उन्होंने खूब लिखा।  उनकी रचनाओं को पढ़ने के लिए किसी शब्दकोश का सहारा नहीं लेना पड़ता और न ही किसी शिल्पगत चमत्कार से गुजरना होता है। जीवन की तरह सहज लेकिन सच्ची रचनाओं की रचयिता मन्नू भंडारी का स्थान और प्रभाव शब्दों की दुनिया में हमेशा कायम रहेगा। उनकी रचनाएँ हमें किसी जादुई लोक की सैर नहीं करातीं बल्कि इसी लोक के हाड़ मांस से गढ़े सच्चे पात्रों की कथा साफगोई से कहती हैं हैं। मन्नू जी अपने एक साक्षात्कार में स्वीकार करती हैं -“मैंने उन चीजों पर लिखा है जो या तो मेरे साथ हुई हैं या मेरे अनुभव का हिस्सा रही हैं।”  संभवतः यही कारण है कि इनकी रचनाओं में इतनी सहजता और विश्वसनीयता है।

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