वाणी प्रवाह 2022 – प्रतियोगिता – स्वरचित कविता- तिरंगे में लिपटे हुए फिर एक दिन

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निहारिका मिश्रा

आज देश का हर नागरिक चाहता है,
बच्चा बच्चा हो सुभाष सा,
हर बच्चे में हो साहस
कर सके विरोध अन्याय का,
हर बच्चे में हो कुब्बत,
रखे मान अपनी आजादी,
संविधान और न्याय का l
इन्हीं लोगों की सोच बदल जाती है,
जब बात अपने बच्चों पर आती है l
क्यों? आखिर क्यों हैं ऐसा?
उन्हें किस बात का भय है?
कहीं यह भय
अपनों से बिछड़ने का तो नहीं?
या फिर मौत को गले लगाने का?
यदि ऐसा है तो विचार लें,
मौत सब को आती है l
इसका मतलब यह तो नहीं,
कि हम बेड़ियां को गले लगाएँ l
क्यों नहीं समझते फर्क आप?
आम आदमी होने
और एक फौजी होने का?
एक दायरे से मोहब्बत करने का?
और पूरे देश से मोहब्बत करने का?
एक परिवार को छोड़,
पूरे देश को एक परिवार बनाने का?
सबके दिलोदिमाग में बस जाने का?
सीना ताने तिरंगा लहराने का?
तिरंगे को फहराते हुए
राष्ट्रगान गाने का?
देश के लिए शान से जीने,
और शान से मर जाने का l
और फिर सबको मिले यह सौभाग्य…..
तिरंगे में लिपटे हुए फिर एक दिन,
अपनी गलियों में लौट आने का |

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