शुभजिता स्वदेशी : ‘फेविकोल का मजबूत जोड़ है, टूटेगा नहीं….

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‘फेविकोल का मजबूत जोड़ है, टूटेगा नहीं….यह पँक्तियाँ आज एक मुहावरा बन चुकी हैं। इसने अपने आप को कुछ ऐसे जोड़ा कि देश के हर घर में उसका इस्तेमाल होने लगा। फिर चाहे वह किताबों के कवर चिपकाना हो, जूते का सोल चिपकाना हो, टूटी हुई चीजों को जोड़ना हो, फर्नीचर हो या फिर घर की दीवारों पर रंग रोगन…
फेविकोल ब्रांड की मुख्य कंपनी पिडिलाइट को नामचीन बनाने में फेविकोल का बड़ा हाथ है। और फेविकोल को लोकप्रिय बनाने में इसके दिलचस्प और सृजनात्मक विज्ञापनों का। फेविकोल ब्रांड ने मार्केटिंग और ‘स्टेड एडहेसिव’ के प्रारूप को एक नई परिभाषा दी। एक वक्त ऐसा आया, जब ग्लू का दूसरा नाम ही फेविकोल हो गया। एडहेसिव यानी गोंद।

ये थे भारत के फेविकोल मैन

दुनियाभर में जिस शख्स को ‘भारत के फेविकोल मैन’ के नाम से जाना गया, वह थे बलवंत राय कल्याणजी पारेख। 1925 में जन्मे बलवंत राय फेविकोल बनाने वाली कंपनी पिडिलाइट इंडस्ट्रीज के संस्थापक थे। गुजरात के भावनगर जिले में महुआ कस्बे में पैदा हुए बलवंतराय ने वकालत में डिग्री हासिल की थी, लेकिन कभी प्रैक्टिस नहीं की बल्कि वे मुंबई में एक डाइंग व प्रिंटिंग प्रेस में काम करने लगे। इसके बाद वह लकड़ी के एक व्यापारी के कार्यालय में चपरासी भी बने, जहां वह वेयरहाउस में अपनी पत्नी के साथ रहते थे लेकिन बलवंतराय को अपना व्यवसाय करना था। उन्होंने मोहन नाम के एक निवेशक की मदद से साइकिल, एरेका नट, पेपर डाइज को पश्चिमी देशों से भारत में आयात करने का व्यवसाय
शुरू किया। बलवंत ने जर्मनी की कम्पनी फेडको के साथ 50 फीसदी की एक साझेदारी की थी। 1954 में होचस्ट के एमडी के निमंत्रण पर बलवंत एक महीने के लिए जर्मनी गए। होचस्ट के एमडी की मृत्यु के बाद बलवंत ने अपने भाई सुशील के साथ मिलकर मुंबई के जैकब सर्किल में डाई, इंडस्ट्रियल केमिकल्स, पिगमेंट एमल्शंस यूनिट का निमार्ण और व्यवसाय आरम्भ किया। कंपनी का नाम पारेख डायकेम इन्डस्ट्रीज रखा गया। इसके बाद पारेख ने फेडको में और ज्यादा हिस्सेदारी की खरीद शुरू की और एक ग्लू बनाया, जिसका नाम था ‘फेविकोल’। यह नाम जर्मन शब्द कोल से प्रेरित था, जिसका अर्थ है ऐसी चीज जो दो चीजों को जोड़ती है। जर्मनी कंपनी भी ऐसा ही एक उत्पाद मोविकोल बनाती थी। फेविकोल को 1959 में लॉन्च किया गया। बलवंत की कंपनी में बात में उनके एक और भाई नरेन्द्र पारेख भी जुड़े। 1959 में ही कंपनी का नाम बदलकर पिडिलाइट इंडस्ट्रीज हो गया।

​शुरू में इंडस्ट्रियल केमिकल कंपनी थी पिडिलाइट
शुरुआत में पिडिलाइट एक इंडस्ट्रियल केमिकल कंपनी थी क्योंकि उस वक्त गोंद बिना किसी ब्रांड के बेचे जाते थे। कम्पनी का उपभोक्ताओं तक पहुँच बनाना 1970 के दशक में विकसित होना शुरू हुआ। यह वह वक्त था, जब पिडिलाइट ने फेविकोल ब्रांड के तहत अपने एडहेसिव्स के विज्ञापन की दिशा में एक बड़ा कदम उठाया। ओगिल्वी एंड मदर एडवर्टाइजिंग एजेंसी के मार्गदर्शन में फेविकोल का हाथी वाला प्रतीक बनाया गया। पिडिलाइट के जिन विज्ञापनों को आज भी याद किया जाता है, वे 1980 के दशक के आखिर में अस्तित्व में आए। ओगिल्वी में पीयूष पांडे, कंपनी को उसकी पहचान बनाने में मदद करने का माध्यम बने।

​फेविकोल के लिए लीक से हटकर मार्केटिंग रणनीति
फेविकोल को कारपेंटर्स यानी बढ़ई के लिए एक ईजी टू यूज ग्लू के तौर पर कोलेजन और जानवरों की चर्बी पर बेस्ड गोंद का विकल्प बनाने के लिए उतारा गया था। कोलेजन और फैट बेस्ड गोंद, आम भाषा में सरेश के रूप में जाना जाता है। इसे अप्लाई करने से पहले पिघलाने की जरूरत होती है। फेविकोल को लोकप्रिय बनाने के लिए पारेख ब्रदर्स ने इसे रिटेल स्टोर्स को न बेचकर सीधा बढ़ईयों को देना शुरू किया। यह उस वक्त बिल्कुल नया कदम था। फेविकोल की मार्केटिंग 54 देशों में होती है और इसका इस्तेमाल कारपेंटर, इंजीनियर, शिल्पकार, इंडस्ट्री से लेकर आम लोग भी करते हैं। फेविकोल भारत में सबसे ज्यादा बिकने वाला गोंद है।

​कैसे बढ़ती चली गई पिडिलाइट

जब फेविकोल अस्तित्व में आया तो पिडिलाइट केवल एक फैक्ट्री के साथ केवल एक उत्पाद बनाती थी, जो था फेविकोल। इसके बाद 1963 में कंपनी ने मुंबई के कोंडिविटा गांव में पहला आधुनिक मैन्युफैक्चरिंग प्लांट स्थापित किया। आज इसी इमारत में कंपनी का कॉरपोरेट हेड ऑफिस है। 1990 में पिडिलाइट इंडस्ट्रीज प्राइवेट लिमिटेड बनी। पिडिलाइट 1993 में शेयर बाजार पर सूचीबद्ध हुई। इसने तेजी से प्रगति की और विदेशों भी अपने पांव फैलाए। 1997 में कंपनी को एफई ब्रांडवैगन ईयर बुक द्वारा टॉप 15 भारतीय ब्रांड्स में जगह दी गई। साल 2000 में कंपनी ने एमसील को खरीदा और एक नया डिवीजन बनासाल 2001 में डॉ. फिक्सइट- द वाटरप्रूफिंग एक्सपर्ट लॉन्च हुआ। फेविकोल को साल 2002 में कान्स लॉइन्स इंटरनेशनल फेस्टिवल ऑफ क्रिएटिविटी में सिल्वर लॉइन अवॉर्ड मिला। इसका ‘बस वाला विज्ञापन काफी लोकप्रिय हुआ था। साल 2004 में पिडिलाइट 1000 करोड़ रुपये के टर्नओवर पर पहुंची और इसी साल फेविकोल मरीन लॉन्च हुआ। पिडिलाइट की 2013 तक 14 सहायक कम्पनियाँ थीं।

​इन क्षेत्रों में भी फेविकोल मैन ने दिया योगदान

महुआ में एक आर्ट्स एंड साइंस कॉलेज को शुरू करने में योगदान दिया।
भावनगर के साइंस सिटी प्रॉजेक्ट के लिए 2 करोड़ रुपये दान किए।
गुजराती साहित्य परिषद को भी दान दिया।
2009 में बड़ौदा में बलवंत पारेख सेंटर फॉर जनरल सीमेंटिक्स एंड अदर ह्यूमन साइंसेज की स्थापना की।
​धीरूभाई अंबानी के थे दोस्त

बलवंत राय, रिलायंस इंडस्ट्रीज के संस्थापक धीरूभाई अंबानी के घनिष्ठ मित्र भी थे। बलवंत राय को साल 2011 में जे टैलबॉट विन्शेल अवॉर्ड मिला। फोर्ब्स ने 2012 में उन्हें धनवानों की सूची में 45वां स्थान दिया। वह विनायल केमिकल्स के चेयरमैन भी रहे। बलवंत राय का निधन 25 जनवरी 2013 को हुआ। पिडिलाइट इंडस्ट्रीज अमेरिका, ब्राजील, थाइलैंड, इजिप्ट, बांग्लादेश, दुबई आदि में भी बिक्री करती है। इस वक्त पिडिलाइट इंडस्ट्रीज का टर्नओवर 19.39 करोड़ रुपये है। कंपनी का मार्केट कैप 1,12,373.04 करोड़ रुपये है। बीएसई पर पिडिलाइट के शेयर की कीमत 2211.40 रुपये है। वित्त वर्ष 2020-21 में पिडिलाइट का राजस्व 6,216.33 करोड़ रुपये रहा था। सितंबर तिमाही में पिडिलाइट का राजस्व 2,213.40 करोड़ रुपये रहा है। पिडिलाइट के प्रॉडक्ट्स में फेविकोल के अलावा फेविक्विक, डॉ. फिक्सइट, एमसील, फेविकोल मरीन, फेविकोल एसएच, फेविकोल स्पीड एक्स, फेविकोल स्प्रे, फेविकोल फ्लोरिक्स, फेविकोल फोमिक्स आदि शामिल हैं।

( स्त्रोत साभार : नवभारत टाइम्स )

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