शुभजिता स्वदेशी – महिला सशक्तीकरण का प्रतीक मजेदार, लज्जतदार लिज्जत पापड़

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चाय कॉफी के संग भाए, कर्रम कुर्रम – कुर्रम कर्रम
मेहमानों को खुश कर जाए, कर्रम कुर्रम – कुर्रम कर्रम
मजेदार, लज्जतदार, स्वाद स्वाद में लिज्जत – लिज्जत पापड़!

90 के दशक से ये जिंगल लोगों की जुबान पर चढ़ा हुआ है। उसी जुबान पर चढ़ा है लिज्जत पापड़ का स्वाद भी। लिज्जत पापड़ की शुरुआत 7 गुजराती महिलाओं ने 80 रुपये कर्ज लेकर की थी। आज महिलाओं की संख्या 7 से बढ़कर 45 हजार हो गई है और 80 रुपए का कर्ज अब 1600 करोड़ रुपये के टर्नओवर में बदल चुका है।

7 गुजराती महिलाएं और ‘लोहाना निवास’ की छत : बात है 1959 के गर्मियों की। मुंबई के गिरगांव इलाके में लोहाना निवास नाम की एक इमारत थी। उसकी छत पर 7 गुजराती महिलाएं बैठक के लिए इकट्टा हुईं। एजेंडा था कि कैसे अपने खाली समय का उपयोग करके घर की आर्थिक स्थिति को सुधारने में मदद की जाए। तय हुआ कि वो मिलकर पापड़ बनाएंगी और बाजार में बेचेंगी। 80 रुपए कर्ज लेकर पापड़ का सामान लाया गया। सभी महिलाओं ने मिलकर पहले दिन 4 पैकेट पापड़ बनाए। पापड़ बेचने में पुरुषोत्तम दामोदर दत्तानी ने उनकी मदद की। उन्होंने चारो पैकेट गिरगांव के आनंदजी प्रेमजी स्टोर में बेच दिए।
पहले दिन 1 किलो पापड़ बेचकर 50 पैसे कमाई हुई। अगले दिन 1 रुपए। धीरे-धीरे और महिलाओं ने जुड़ना शुरू किया। अगले 3-4 महीने में ही 200 से ज्यादा महिलाएं जुड़ गईं। जल्द ही वडाला में भी एक ब्रांच खोलनी पड़ी। साल 1959 में 6 हजार रुपए की बिक्री हुई थी, जो उस वक्त के हिसाब से काफी बड़ी रकम थी।
कारोबार बढ़ने लगा तो बनाई को-ऑपरेटिव सोसायटी : इन सात महिलाओं को समाजसेवी छगन बप्पा का साथ मिला। उन्होंने कुछ आर्थिक मदद की जिसका इस्तेमाल महिलाओं ने मार्केटिंग टीम, प्रचार या लेबर बढ़ाने में नहीं, बल्कि पापड़ की गुणवत्ता सुधारने में किया। मुनाफा देख और महिलाओं ने जुड़ने की इच्छा जताई तो इसके संस्थापकों ने एक को-ऑपरेटिव सोसाइटी रजिस्टर कराने का फैसला लिया। इसमें शुरुआत से ही कोई एक मालिक नहीं बनाया गया बल्कि महिलाओं का समूह ही इसे चलाता है। सात महिलाओं के साथ शुरू हुए इस वेंचर में आज करीब 45 हजार से ज्यादा महिलाएं काम करती हैं।

लिज्जत पापड़ की संस्थापक जसवन्ती बेन

दशकों से लिज्जत पापड़ के स्वाद और गुणवत्ता का राज : लिज्जत पापड़ के देश भर में करीब 60 सेंटर हैं, लेकिन हर जगह के पापड़ का स्वाद एक जैसा रहता है। इसके पीछे एक राज है। दरअसल, पापड़ के लिए उड़द की दाल म्यांमार से, हींग अफगानिस्तान से और काली मिर्च केरल से ही मंगवाई जाती है। इन कच्चे माल को तैयार करने का तरीका भी एक जैसा है। दाल, मसाले और नमक से आटा तैयार कर लिया जाता है। इसे ही अलग-अलग सेंटर से महिलाएं उठाती हैं और पापड़ बनाकर सेंटर में वापस जमा कर देती हैं। गुणवत्ता एक जैसी रहे, इसके लिए स्टाफ के सदस्य अचानक दौरे भी करते रहते हैं। मुंबई की एक प्रयोगशाला में स्वाद परीक्षण भी होता है।
महिला सशक्तिकरण का नायाब उदाहरण है लिज्जत पापड़ : संस्था में ‘बहन’ कहकर संबोधित की जाने वाली महिलाएं सुबह 4.30 बजे से अपना काम शुरू कर देती हैं। एक समूह द्वारा शाखा में आटा गूंथा जाता है और दूसरे समूह द्वारा इसे एकत्रित कर, घर में पापड़ बेला जाता है। इस दौरान आवाजाही के लिए एक मिनी-बस की मदद ली जाती है। इस पूरी संचालन प्रक्रिया की निगरानी, मुंबई की एक 21 सदस्यीय केंद्रीय प्रबंध समिति करती है।
लिज्जत की प्रेसिडेंट स्वाती रवींद्र पराड़कर महज 10 साल की थीं, जब उनके पिता का देहांत हो गया। परिवार आर्थिक संकट में था। उनकी मां पापड़ बनाती थीं और स्वाती रोज स्कूल जाने से पहले छुट्टियों में उनकी मदद करतीं। बाद में उन्होंने लिज्जत को-ऑपरेटिव ज्वॉइन कर लिया और इसकी प्रेसिडेंट भी बन गई। लिज्जत पापड़ पर आशुतोष गोवारिकर एक फिल्म बनाने जा रहे हैं जिसका नाम होगा कर्रम कुर्रम। खबरों के मुताबिक इसमें कियारा आडवाणी लीड रोल निभाएंगी। फिल्म का डायरेक्शन ग्लेन बैरेटो और अंकुश मोहला करेंगे।

पापड़ बनाती महिलाएँ

लिज्जत पापड़ सिर्फ एक व्यवसाय के सफल होने की कहानी नहीं है बल्कि एक सामाजिक जिम्मेदारी की भी कहानी है। को-ऑपरेटिव में 15 साल से काम कर रहीं उषा जुवेकर का कहना है कि अगर देश में सभी लोग महिलाओं की इतनी फिक्र करते जितनी लिज्जत करता है, तो हमने तरक्की की नई इबारत लिख दी होती।
कहां से शुरू हुई यह संघर्ष की कहानी: मुम्बई की रहने वाली जसवंती जमनादास पोपट ने अपना परिवार चलाने के लिए 1959 में पापड़ बेलने का काम शुरू किया था। जसवंती बेन गरीब परिवार से ताल्लुक रखती थी और कम पढ़ी-लिखी भी थी लेकिन उनमें कारोबार की अच्‍छी समझ थी। उन्होंने इस काम में अपने साथ और छह गरीब बेरोजगार महिलाओं को जोड़ा और 80 रुपये का कर्ज लिया और पापड़ बेलने का काम शुरु किया। उनके साथ शामिल हुईं महिलाओं के नाम थे उजमबेन नरानदास कुण्डलिया, पार्वतीबेन रामदास ठोदानी, लागुबेन अमृतलाल गोकानी, बानुबेन तन्ना, जयाबेन विठलानी और उनके साथ एक और महिला थी, जिसे पापड़ों को बेचने की जिम्मेदारी ली थी। यह सभी महिलाएं गुजराती परिवार से थीं, तो जाहिर सी बात है कि उन्हें पापड़-खाखरा बनाने में महारत हासिल थीं। इन महिलाओं द्वारा 15 मार्च 1959 को लिज्जत का पहला पापड़ बेला गया था। पापड़ बेलने की शुरूआत किसी बड़े उद्योग या फिर पैसे कमाने के उद्देश्य से नहीं हुई थी।

कैसा है लिज्जत पापड़ का उद्योग: ये कंपनी बाकी कंपनियों से थोड़ी अलग है, इस व्यापार में सभी महिला सदस्य हैं। यहां अध्यक्षता कार्यकारी समिति से सदस्य बारी-बारी से संभालते हैं और वो भी सबकी सहमति से चुने जाते हैं। यानी सबको मौका दिया जाता है जो इस उद्योग की सफलता में एक अहम किरदार निभाते हैं। हर शाखा का नेतृत्व एक संचालिका करती है। इन शाखाओं के संचालन के लिए 21 सदस्यों वाली एक केंद्रीय प्रबंधन समिति भी बनी है। जिसमें एक अध्यक्ष, दो उपाध्यक्ष, दो सचिव और दो कोषाध्यक्ष सहित छह निर्वाचित अधिकारी हैं। इनका चुनाव सर्वसम्मति से किया जाता है और जो हर साल बदलती रहती हैं। आज की तारीख में श्री महिला गृह उद्योग लिज्जत पापड़ अब पापड़ के अलावा डिटर्जेंट और ब्रेड बनाने का काम भी कर रही है।

(स्त्रोत साभार – दैनिक भास्कर तथा इंडीटाइम्स)

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