संयम, अनुशासन, सृजन ही हमारे रक्षक हैं, शामिल कीजिए जीवन में

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नया साल शुरू हो गया है और साल के आरम्भ में ही कोविड ने डराना शुरू कर दिया है। ओमिक्रॉन के बढ़ते मामलों को लेकर सरकारो ने सख्ती बरतनी शुरू कर दी है। बंगाल में भी आंशिक लॉकडाउन लग चुका है। सवाल यह है कि इतना सब कुछ होने के बाद आखिर नागरिक और सरकार, इतने लापरवाह क्यों हैं? देश की छोड़िए, क्या अपने प्रति लोगों की कोई जिम्मेदारी नहीं है? 2019 के बाद जिस तरह का भयावह दृश्य कोविड – 19 ने दिखाया, इतनी मौतें हुईं, इतने कारुणिक दृश्य दिखे, आखिर क्या कारण है…कि इसे देखकर भी हम नहीं सुधरे? हम मानते हैं कि हमारी संस्कृति और परम्परा समावेशी है लेकिन समावेशी होने के लिए जनता का जीवन दाँव पर लगाना कहाँ की बुद्धिमानी है? क्या राजनीतिक महत्वाकाँक्षाएँ इतनी बड़ी होनी चाहिए कि खतरे के बावजूद रैलियाँ होती रहें? जब हम बात डिजिटल भारत की करते हैं, ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था की करते हैं तो हम डिजिटल मतदान के बारे में विचार क्यों नहीं करते? जिस तरह से हमारी लापरवाही बनी हुई है और कोविड का आतंक फैल रहा है, वहाँ अर्थव्यवस्था को खड़ा करना ही सबसे बड़ी चुनौती है तो क्या ऐसी स्थिति में घर से काम करने की संस्कृति को अधिक व्यावहारिक बनाना एक सही विकल्प नहीं होगा? एक बात तो तय है कि लम्बे समय तक कोविड हमारे बीच रहने जा रहा है, बीमारी को तो बदला नहीं जा सकता, बदलना तो हर एक नागरिक को है। तैयारी तो सरकारों को करनी है तो हम अपनी संरचना को मजबूत करें, यह एक ऐसा कदम है जो आगे की राह खोलेगा मगर उससे भी जरूरी है कि हमारे जीवन में संयम, अनुशासन, सृजन जैसे शब्दों का व्यावहारिक रूप लागू हो क्योंकि यही हमारा रक्षक है मगर उससे पहले भी एक सवाल हम सुधरेंगे कब?

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