सदियों पुराना है गुझिया का इतिहास

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गुजिया की शुरुआत काफी पुरानी है। यह एक मध्यकालीन व्यंजन है जो मुगल काल से पनपा और कालांतर में त्योहारों की स्पेशल मिठाई बन गई। इसका सबसे पहला जिक्र तेरहवीं शताब्दी में एक ऐसे व्यंजन के रूप में सामने आता है जिसे गुड़ और आटे से तैयार किया गया था। ऐसा माना जाता है कि पहली बार गुजिया को गुड़ और शहद को आटे के पतले खोल में भरकर धूप में सुखाकर बनाया गया था और यह प्राचीन काल की एक स्वादिष्ट मिठाई थी। लेकिन जब आधुनिक गुजिया की बात आती है तब इसे सत्रहवीं सदी में पहली बार बनाया गया। गुजिया के इतिहास में ये बात सामने आती है कि इसे सबसे पहली बार उत्तरप्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र में बनाया गया था और वहीं से ये राजस्थान, मध्यप्रदेश, बिहार और अन्य प्रदेशों में प्रचलित हो गई। कई जगह इस बात का जिक्र भी मिलता है कि भारत में समोसे की शुरुआत के साथ ही गुजिया भी भारत आयी और यहां के ख़ास व्यंजनों में से एक बन गयी। यह भी कहा जाता है कि गुझिया को ब्रज में भगवान कृष्ण को भोग के रूप में चढ़ाया जाता था, और वहीं से यह व्यंजन देश भर में फैल गया।

गुजिया और गुझिया में है अंतर 

अक्सर आपने लोगों को इस मिठाई के दो नाम लेते हुए सुना होगा गुजिया और गुझिया, आपमें से ज्यादातर लोग शायद नहीं जानते होंगे कि ये दोनों ही मिठाइयां अलग तरह से बनाई जाती हैं। वैसे तो दोनों ही मिठाइयों में मैदे के अंदर खोए या सूजी और ड्राई फ्रूट्स की फिलिंग होती है लेकिन इनका स्वाद थोड़ा अलग होता है। दरअसल जब आप गुजिया की बात करते हैं तब इसे मैदे के अंदर खोया भरकर बनाया जाता है, लेकिन जब आप गुझिया के बारे में बताते हैं तब इसमें मैदे की कोटिंग के ऊपर चीनी की चाशनी भी डाली जाती है। दोनों ही मिठाइयां अपने -अपने स्वाद के अनुसार पसंद की जाती हैं।

गुजिया के हैं अलग-अलग नाम 

इस स्वादिष्ट मिठाई गुजिया को देशभर में अलग-अलग नामों से जाना जाता है जहां महाराष्ट्र में इसे करंजी कहा जाता है वहीं गुजरात में इसे घुघरा कहा जाता है, बिहार में इस मिठाई को पेड़किया नाम दिया गया है वहीं उत्तर भारत में से गुजिया और गुझिया नाम से जानी जाती है।

अलग जगहों में गुजिया के रूप हैं अलग 

वैसे तो मुख्य रूप से गुजिया को बनाने के लिए मैदे को मोइन डालकर डो तैयार किया जाता है और इसकी लोई को पूड़ी की तरह से बेलकर उसमें खोया या भुनी हुई सूजी को उसमें चीनी मिलाकर भरा जाता है। फिर इस पूड़ी को मोड़कर किनारों को दबाकर गुजिया वाला आकार दिया जाता है। लेकिन कुछ और जगहों पर इसे अलग ढंग से भी बनाया जाता है। इसके ऊपर चाशनी की परत भी चढ़ाई जाती है और कुछ जगह गुजिया में ऊपर से रबड़ी मिलाकर भी खाई जाती है।
पहले सिर्फ खोया और सूजी की गुझिया ही मिलती थी लेकिन अब चाकलेट से लेकर जैम, सारे ड्रायफू्रट्स तक की ढेरों स्वाद वाली गुझिया मिलने लगी है। आहार विशेषज्ञों की मानें तो भारत में त्योहारों के अवसर पर बनाए जाने वाले व्यंजन लजीज स्वाद के साथ कैलोरी वाले भी होते हैं। गुझिया मिलाए जाने वाले सूखे मेवे, नारियल, गुड़ तथा अन्य सामग्री स्वास्थ्य के लिए पोषक होती है। सूखे मेवे में जो वसा, एंटीआक्सीडेंट्स, विटामिन ई, कैल्शियम, मैग्नेशियम, पोटेशियम से भरपूर होते हैं। वहीं नारियल के अपने ढेरों फायदे हैं। गुड़ तथा घी भी भरपूर कैलोरी वाले होते हैं। अब तो लो कैलोरी गुझिया तथा शुगर फ्री गुझिया, रोस्टेड गुझियज्ञ भी खासतौर पर बनने लगी हैं। कई दुकानदारां ने तो समोसा, मटर शेप, चंद्रकली, लौंग जैसे आकार भी दिए हैं।

बिहार में पिड़ुकिया नाम से मशहूर गुझिया का एक दिलचस्प किस्सा यूं भी है कि जब पुराने समय में 13-14 साल की उम्र में लड़कियों की शादी हो जाया करती थी तब लड़की पाक-कला का परिचय उसके गुझिया बनाने के ढंग से होता था। हांलाकि गुझिया मध्यकाल का पकवान है। गुझिया के बारे में कहा जाता है कि यह मिठाई मुख्य रूप से पश्चिमी देशों में मध्य एशिया होते हुए भारत आइ्र। आज गुझिया बनाने के लिए तरह-तरह के सांचे मिलते हैं, लेकिन मध्यकाल में गुझिया बनाने के लिए महिलाएं होली के कुछ दिनों पूर्व से ही नाखून काटना बंद कर देती थीं। गुझिया को किनारे से मोडऩे के लिए अपने नाखून का ही प्रयोग करती थीं।
(स्त्रोत साभार – हर जिंदगी एवं दैनिक जागरण एवं अन्य स्त्रोत)
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