अपने समय की विदुषी कवयित्री थीं रत्नकुँवरि बीबी

प्रो. गीता दूबे

सभी सखियों को नमस्कार। सखियों आज मैं आपको रत्नकुँवरि बीबी की कथा सुनाऊंगी। इनका जन्म मुर्शिदाबाद के प्रसिद्ध जगत सेठ घराने में हुआ था। वह अत्यंत विदुषी स्त्री थीं और कविताएँ लिखती थीं। राजा शिवप्रसाद “सितारे हिंद” उनके पोते थे। उनका परिचय स्वयं उनके पोते की जुबानी जानिए जो अपनी दादी को सम्मानपूर्वक याद करते हुए लिखते हैं- “वह संस्कृत की बड़ी पंडिता थीं। छहों शास्त्रों की वेत्ता। फारसी भाषा भी इतनी जानती थीं कि मौलाना रूमी की मसनवी और दीवान शम्स तबरेज जब कभी भी हमारे पिता पढ़कर सुनाते तो उसका संपूर्ण आशय समझ लेती थीं। गाने- बजाने में अत्यंत निपुण थीं। चिकित्सा यूनानी और हिन्दुस्तानी दोनों प्रकार की जानती थीं। योगाभ्यास में परिपक्व थीं। यम -नियम और वृत्ति ऋषियों और मुनियों की सी थी। सत्तर वर्ष की अवस्था में भी बाल काले थे तथा आँखो की ज्योति बालकों सी थी। वह हमारी दादी थीं। इससे हमको अब उनकी अधिक‌ प्रशंसा लिखने में लाज आती है। परंतु जो साधु संत और पंडित लोग उस समय के उनको जानने वाले काशी में वर्तमान हैं वे सब उनके गुणों को अद्यावधि स्मरण करते हैं।” इस उद्धरण से यह स्पष्ट होता है कि वह अत्यंत ज्ञानी और गुणवती महिला थीं। स्वास्थ्य संबंधी नियमों का पालन करते हुए स्वस्थ और खुशहाल जीवन जीती थीं। बेटों और पोतों के सानिध्य में उन्होंने खुशहाल और लंबा जीवन जीया एवं वृद्धावस्था में साधु-संतों की संगति में, भगवद्भक्ति में जीवन बिताया।
काव्य रचना में इनकी रूचि थी। इनके जीवनकाल में तो इनका कोई ग्रंथ प्रकाशित नहीं हुआ लेकिन इनके पोते राजा शिवप्रसाद “सितारे हिंद” ने संवत 1945 में इनका एक ग्रंथ “प्रेम- रत्न” प्रकाशित करवाया। कुल 76 पृष्ठों की इस पुस्तक में दोहा और चौपाई छंदों में श्रीकृष्ण की लीलाओं का सरस वर्णन किया गया है। इसमे कृष्ण के जीवन से जुड़े विभिन्न प्रसंगों का जीवंत वर्णन हुआ है। इन छंदों को पढ़ते हुए इनकी विद्वता और काव्य कौशल का आभास सहजता से हो जाता है। दोहा छंद में ब्रज की प्राकृतिक सुषमा के वर्णन के साथ ही कृष्ण के मथुरा गमन के पश्चात ब्रज वासियों की स्थिति, उनकी विरह-व्यथा का मार्मिक वर्णन प्रस्तुत उद्धरण में हुआ है-
“वरन वरन वन तंबुवन दीनो तान वितान।
अति फूले फूले फिरत, डेरा परत न जान।।
जबते मथुरा तन चितै, तजि ब्रज-जन यदुनाथ।
विरह- विथा बृज में बढ़ी, तहँ सब भये अनाथ।
प्रिय तीरथ कुरुखेत सब, आए ग्रहण नहान।
यदुपति राधा गोप गण, नन्दादिक वृषभान।।
गोप एक नटभेष सजि आयो बीच बजार,
तहँ खरभर लशकर परयो, सो अति रह्यो निहार।।
इक यादव हँसिके कह्यो, कहाँ तुम्हारो बास।
अति सुन्दर तन छबि बनी, नाम कहहूँ परकास।।
तब उनहू कहि तुम कहहू, काके सँग कित ठाऊँ।
द्वारावति -पति कटक यह, कह्यो यदुव निज नाउँ।।
सुनत द्वारका नाम तिहि, लियो बिरह उर छाय।
हा नँद- नंदन कंत कहि, गयो ग्वाल मुयझाय।।
अब एक उदाहरण चौपाई छंद में रचित कविता का भी देखिए जिसमें कृष्ण के प्रताप और महात्म्य का वर्णन है। भक्तवत्सल कृष्ण अपने भक्तों की सभी कामनाएँ पूरी करते हैं और विपत्ति के समय उनकी रक्षा के लिए तत्पर रहते हैं। ऐसे भगवान कृष्ण की महिमा का बखान रत्नकुँवरि बीबी ने पूरे भक्ति भाव से किया है-
“भक्ताधीन विरद प्रभु केरे, गावत वाणी वेद घनेरे।
संतत रहत भक्त के पासा। पुरवत हैं प्रभु तिनकी आसा।।
जे सप्रेम प्रभु सों मन लावै। तिनको कबहूँ नहिं बिसरावै।।
ग्राह- ग्रसित गजराज छुड़ाए। गरुड़ छाँड़ि तहँ आतुर धाए।।
पुनि प्रभु पाण्डव जरत बचायो। द्रुपद- सुता को बसन बढायो।
अजामील यम ते रखि लीन्हों। भजन प्रताप ध्रुवहिं वर दीन्हों।।
जन प्रहलाद अभय करि थाप्यो। ताही बार न बारहु व्यापो।।
जे जन मन ते ध्यावहिं जैसे। ताकहुँ प्रभु फल देते तैसे।।
बीबी रत्नकुँवरि के पदों में कृष्ण भक्ति में डूबे उद्गार अत्यंत सरस और सहज भाव से अभिव्यक्त हुए हैं। कुछ आलोचकों का यह मानना है कि अवधी भाषा में सिर्फ रामकाव्य की रचना ही हुई है लेकिन अवधी भाषा में विरचित “प्रेम-रत्न” के पद इस बात के प्रमाण हैं कि अवधी भाषा में सरस और सशक्त कृष्ण काव्य भी रचा गया। कृष्ण की भक्ति और उनके प्रेम में आपाद मस्तक डूबे ब्रजवासियों के प्रेम विह्वल ह्दय के भावों -अनुभावों का वर्णन बीबी रत्नकुँवरि ने सफलतापूर्वक किया है। दोहा छंद में वर्णित एक प्रसंग देखिए जिसमें कृष्ण के आने की सूचना पाकर सब लोग आनंद में भरकर अपनी सुधबुध खो बैठे हैं-
“भये मगन सब प्रेम रस, भूलि गये निज देह।
लघु दीरघ बै नारि नर, सुमिरत श्याम-सनेह।।
कहत परस्पर युवति मिलि, लै लै कर अँकवार।
प्रीतम आये का सखि, तन साजहुँ शृंगार।।
जब गोपियाँ इतनी मगन हैं तो राधा की दशा तो सबसे अलग होगी ही, राधा की मार्मिक अवस्था का वर्णन कवयित्री ने अत्यंत निपुणता से किया है-
“तहँ राधा की कछु दशा, वर्णत आवै नाहि।
मलिन वेश भूषण रहित, विवस रहित मन माहिं।।
कबहुँ मुरझावत बिरह-वश, पीत वरण ह्व जाय।
कबहुँ व्यापत अरुणता, प्रेम मगन मुंद छाय।।
कान्ह-कान्ह कबहूँ कहत, कबहूँ रटत निज नाम।
मौन साधि रहि जात जब, श्रमित होत निज बाम।।
चख चितवत जित तित हरि, श्रवण मुरलि धुनि-लीन।
श्याम बास बसि नाक मणि, रूप -पयोनिधि मीन।।
तन मध धन गृह जनन की, नेकहु सुधि तिहि नाहिं।
चितवत काहू नहिं दृगन, लगन लगी उर माहिं।।”
रत्नकुँवरि बीबी ने सफल एवं आनंदमय पारिवारिक जीवन जीते हुए कृष्ण भक्ति से परिपूरित सुंदर और भावप्रवण काव्य की रचना की। ये पद पाठकों के ह्दय और मस्तिष्क दोनों पर सहजता से अपनी छाप छोड़ते हैं। चूंकि उस समय की स्त्रियों में अपनी कविता के प्रति सजगता का अभाव था , संभवतः इसीलिए लंबी आयु प्राप्त करने और सुखी जीवन जीनेवाली बीबी रत्नकुँवरि की रचनाएँ उनके जीवन काल में प्रकाशित नहीं हो पाईं होंगी। साहित्यिक अभिरुचि संपन्न पारिवारिक परिवेश ने जहाँ उन्हें काव्य रचना के लिए प्रेरित किया वहीं साहित्य प्रेमी पौत्र ने उनकी रचनाओं को दुनिया के सामने लाकर अपने पारिवारिक और सामाजिक दायित्व का निर्वाह किया अन्यथा कालांतर में उनकी रचनात्मक प्रतिभा से साहित्यिक जगत अनिभिज्ञ ही रहता। अब भी गहन शोधकर्ताओं को छोड़ दें तो बहुत से लोग इनके नाम और साहित्यिक अवदान से अपरिचित ही हैं। रत्नकुँवरि बीबी जैसी न जाने कितनी स्त्री रचनाकारों की रचनाएँ काल के गाल में समा गई होंगी क्योंकि उन्हें प्रकाशन का सौभाग्य नहीं मिला।

 

 

 

 

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