पर्यावरण दिवस विशेष : सनातन है भारतीय परम्परा में पर्यावरण की चिंता

ग्लोबल वार्मिंग तथा जलवायु परिवर्तन के कारण उत्पन्न होने वाले पर्यावरण संकट की समस्या व इसके समाधान के उपाय पर विचार- विमर्श और इसके प्रति लोगों में जागरूकता पैदा करने के लिए प्रतिवर्ष पांच जून को विश्व पर्यावरण दिवस मनाया जाता है। इसमें कोई शक नहीं कि विज्ञान और नवीनतम प्रौद्योगिकी ने ही ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन द्वारा ग्लोबल वार्मिंग के संकट को गहराया है, लेकिन स्वयं पाश्चात्य विज्ञान के पास भी इस समस्या को कोई समाधान नहीं है। चिन्ता का विषय यह भी है कि पर्यावरण विज्ञान का एक गौरवशाली इतिहास रखने वाला भारत जैसा देश भी विश्व पर्यावरण सम्मेलनों में ग्लोबल वार्मिंग की समस्या का सही मायने में निदान और समाधान रखने में असमर्थ रहा है।

भारतीय परम्परा में पर्यावरण की चिंता आदि सनातन काल से की गयी है। उस समय समस्त प्रकृति ही पूज्य थी। प्रकृति की महता, संरक्षता, पूजा के अनेक प्रसंग वैदिक साहित्य में भरे पड़े है। यजुर्वेद के एक लोकप्रिय मंत्र36/17 में अंकित मन्त्र -द्योः शांतिरंतरिक्षं… । में समूचे पर्यावरण को शान्तिमय बनाने की अद्भुत स्तुति है। स्वस्तिवाचन की इस अद्भुत ऋचा में द्युलोक, अंतरिक्ष और पृथ्वी से शान्ति की भावप्रवण प्रार्थना करते हुए कहा गया है कि जल शान्ति दे, औषधियां-वनस्पतियां शान्ति दें, प्रकृति की शक्तियां – विश्वदेव, सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड शान्ति दे। सब तरफ शान्ति हो, शान्ति भी हमें शान्ति दें। वेद के इस मन्त्र में मनुष्यों को स्पष्ट रूप से आदेश देते हुए कहा गया है कि जैसे प्रकाश आदि पदार्थ शान्ति करने वाले होवें, वैसे तुम लोग प्रयत्न करो।

उल्लेखनीय है कि पर्यावरण एक व्यापक शब्द है, जो उन संपूर्ण शक्तियों, परिस्थितियों एवं वस्तुओं का योग है, जो मानव जगत को परावृत्त करती हैं, तथा उनके क्रियाकलापों को अनुशासित करती हैं। सृष्टि में चारों ओर व्याप्त विराट प्राकृतिक परिवेश को ही पर्यावरण कहा जाता है। परस्परावलंबी संबंध का नाम पर्यावरण है। हमारे चारों ओर विद्यमान वस्तुएं, परिस्थितियां एवं शक्तियां सब हमारे क्रियाकलापों को प्रभावित करती हैं, और उसके लिए एक सीमा, एक दायरा सुनिश्चित करती हैं। इसी सीमा, दायरे को हम पर्यावरण कहते हैं। यह दायरा व्यक्ति, गांव, नगर, प्रदेश, महाद्वीप, विश्व अथवा संपूर्ण सौरमंडल या ब्रह्मांड हो सकता है। इसीलिए आदि ग्रन्थ वेद में द्युलोक से लेकर व्यक्ति तक समस्त परिवेश के लिए शांति की प्रार्थना की है। और इसीलिए वैदिक ग्रन्थों से लेकर वर्तमान के चिंतकों और मनीषियों ने समय-समय पर पर्यावरण के प्रति अपनी चिंता को अभिव्यक्त कर मानव जाति को सचेष्ट करने के प्रति अपने उत्तरदायित्व का निर्वाह किया है। ताकि द्युलोक से लेकर पृथ्वी के सभी जैविक- अजैविक घटक संतुलन की अवस्था में रहें, अदृश्य आकाश अर्थात द्युलोक, नक्षत्रयुक्त दृश्य आकाश अर्थात अंतरिक्ष, पृथ्वी एवं उसके सभी घटक-जल, औषधियां, वनस्पतियां, संपूर्ण संसाधन (देव) एवं ज्ञान-संतुलन की अवस्था में रहें, तभी व्यक्ति और विश्व, शांत एवं संतुलन में रह सकता है।

प्रकृति में परिलक्षित होने वाले जल, वायु, मृदा, पादप और प्राणी आदि सभी वस्तु, परिस्थितियां एवं शक्तियां सम्मिलित रूप में पर्यावरण की रचना करते हैं। अर्थात जीवों की अनुक्रियाओं को प्रभावित करने वाली समस्त भौतिक और जीवीय परिस्थितियों का योग पर्यावरण है। प्रकृति ही मानव का पर्यावरण है और यही उसके संसाधनों का भंडार है। वैदिक ग्रन्थों में उन समस्त उपकारक तत्वों को देव कहकर उनके महत्व को प्रतिपादित किया गया है। आदिकाल से ही इन देवताओं के लिए मनुष्य का जीवन ऋणी हो गया है। यही कारण है कि वैदिक पौराणिक ग्रन्थों में मनुष्य को पितृऋण और ऋषिऋण के साथ-साथ देवऋण से भी उन्मुक्त होने की चेतावनी देते हुए कहा गया है कि मनुष्य अपने कर्तव्य में देवऋण से मुक्त होने के लिए भी कर्तव्य करें। वैदिक ग्रन्थों में उसके लिए यह मर्यादा स्थापित की गई है। पर्यावरण को संतुलित रखने के लिए सूर्य, वायु, वरुण अर्थात जल एवं अग्नि देवताओं की महत्वपूर्ण भूमिका को स्वीकारते हुए इन देवताओं से रक्षा की कामना की गई है। ऋग्वेद 1/158/1, 7/35/11तथा अथर्ववेद 10/9/12 में दिव्य, पार्थिव और जलीय देवों से कल्याण की कामना की गई है।

पर्यावरण शब्द की उत्पत्ति, परि-उपसर्ग के साथ आवरण शब्द की संधि से होती है। आङ्पूर्वक वरण शब्द का प्रयोग भी संस्कृत शब्दार्थ-कौस्तुभ ग्रंथ में हुआ है, जिसका अर्थ है- ढकना, छिपाना, घेरना, ढक्कन, पर्दा, घेरा, चारदीवारी, वस्त्र, कपड़ा और ढाल। कौस्तुभ ग्रंथ में ही संस्कृत के उपसर्ग परि का अर्थ-सर्वतोभाव, अच्छी तरह, चारों ओर तथा आच्छादन आदि के रूप में मिलता है। और आङ् भी संस्कृत का एक उपसर्ग है, जिसका अर्थ, समीप, सम्मुख और चारों ओर से होता है। वरण शब्द संस्कृत के वृ धातु से बना है, जिसका अर्थ, ‘छिपना, चुनना, ढकना, लपेटना, घेरना, बचाना आदि है। इसी प्रकार पर्यावरण – परि+आवरण से बने शब्द का अर्थ, चारों ओर से ढंकना, चारों ओर से घेरना या चारों ओर का घेरा होगा। विभिन्न कोशकारों ने इसका अर्थ- पास पड़ोस की परिस्थितियां और उनका प्रभाव के रूप में माना है। पर्यावरण को आंग्ल भाषा में इन्वायरमेंट कहा जाता है। इन्वायरमेंट शब्द का प्रयोग ऐसी क्रिया जो घेरने के भाव को सूचित करे, के संदर्भ में किया जाता है। विभिन्न कोशों में इसके विभिन्न अर्थ वातावरण, उपाधि, परिसर, परिस्थिति, प्रभाव, प्रतिवेश, परिवर्त, तथा वायुमंडल, वातावरण और परिवेश, अड़ोस-पड़ोस, इर्द-गिर्द, आस-पास की वस्तुएं एवं पर्यावरण आदि किये गए हैं।

वर्तमान सन्दर्भ में पर्यावरण के दो भेद किये जा सकते हैं। पहला, भौतिक अथवा प्राकृतिक पर्यावरण और दूसरा सांस्कृतिक अथवा मानवकृत पर्यावरण। भौतिक अथवा प्राकृतिक पर्यावरण के अंतर्गत वे तत्व सम्मिलित होते हैं, जो जैवमंडल का निर्माण करते हैं। और सांस्कृतिक अथवा मानवकृत पर्यावरण में आर्थिक क्रियाएं, धर्म अधिवास, आवासीय दशाएं एवं राजनीतिक परिस्थितियां आदि सम्मिलित हैं। इससे स्पष्ट है कि प्राणि-जगत को प्रभावित करने वाले पर्यावरणीय तत्व देव केवल पार्थिव ही नहीं है, अपितु उनका स्थान अंतरिक्ष और द्युलोक भी है। वैदिक ग्रन्थों मेंउन सभी से प्राणियों की मंगल-कामना एवं सुरक्षा की कामना की गई है।

पर्यावरण को जानने, पर्यावरण के समस्त रहस्यों से आवरण दूर करने के लिए यह जानना भी आवश्यक है कि पर्यावरण का निर्माण करने वाले समस्त तत्वों की सृष्टि किस क्रम में और किस प्रकार हुई और उसके कारक तत्व कौन से हैं? ऋग्वेद 10/129/ 1-7 में अंकित मन्त्र नासदासीत्रो सदासीत्तदानी…के अनुसार सृष्टि के आरंभ में न सत था न असत। ऋग्वेद 10/121/1 में अंकित मन्त्र- हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रे… में सृष्टि के विकास-क्रम को बताते हुए कहा गया है कि सर्वप्रथम जीवों का स्वामीभूत हिरण्यगर्भ अस्तित्व में आया और उसी से सृष्टि का अविच्छिन्न विकास हुआ आदि-आदि। पाश्चात्य विज्ञान के अनुसार चाहे वह सृष्टि उत्पत्ति का समय हो या अन्य कोई समय, प्रकृति सदैव तीन रूपों में विद्यमान रहती है- कण, प्रतिकण एवं विकिरण। ऋग्वेद, 7/33/7में प्रस्तुत वैदिक सिद्धांत के अनुसार प्रकृति में मूल तीन वर्ग विद्यमान हैं -त्रयः कृण्वति भुवनस्य रेत। ये हैं वरुण, मित्र और अर्यमा।

इनकी संयुक्त सत्ता को अदिति कहा गया है, जो अनादि एवं अखंड सत्ता है। व्यक्तिगत रूप से ये आदित्य कहलाते हैं। ये अनादि शाश्वत सत्ता के अंगभूत हैं। अर्यमा उदासीन कण है, जो विज्ञान की विकिरण के फोटांस के अनुरूप है। वरुण और मित्र प्रकृति का द्रव्य भाग बनाते हैं तथा विज्ञान के कण-प्रतिकण का प्रतिनिधित्व करते हैं तथा वे विपरीत आवेश (चार्ज वहन करते हैं। वैदिक परिकल्पनानुसार सृष्टिकाल से दृश्य जगत तक भौतिक पदार्थ पांच अवस्थाओं में निष्क्रमण करते हैं- पहला, शपतथ ब्राह्मण 1/1/1 में अंकित आपः (क्रियाशील) अवस्था-क्वांटम या क्वार्कसूप। दूसरा, ऋग्वेद 10/12/7 का बृहती आपः -प्लाज्मा अवस्था। तीसरा, ऋग्वेद 1/35/2 का अपानपात-नाभिक अवस्था या कॉस्मिक मैटर। चौथा, ऋग्वेद 1/164/36 का अर्ध गर्भ¬¬¬¬¬: -परमाणु अवस्था । और पांचवा, पंचमहाभूतों अर्थात पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश का दृश्य जगत।

ब्राह्मण ग्रंथों एवं उपनिषदों में इस सम्बन्ध में अंकित वर्णन वेदों की विषद व्याख्या रूप ही हैं और उन अर्थों का पूरक भी है। तैत्तिरीय ब्राह्मण 2/ 8/ 9/ 6 तथा 1/ 1/ 3/ 1, गोपथ ब्राह्मण 1/ 1/1/2, सामविधान ब्राह्मण 1/1, जैमिनीयोपनिषद ब्राह्मण 7/ 1/1, शतपथ ब्राह्मण 6/ 1/ 1/ 13, जैमिनीय ब्राह्मण 1/68 तथा 2/ 146, ऐतरेय ब्राह्मण 5/ 5/ 7, तांड्य ब्राह्मण 4/1/ 1, तैत्तिरीय संहिता 4/ 1/ 8/ 3), ऐतरेये उपनिषद 1/ 1, तैत्तिरीय उपनिषद 2/ 7/ 10 आदि में भी सृष्टि प्रक्रिया का वर्णन है, जो वेदों में किये गए सृष्टि क्रम के अनुरुप व पूरक है। दर्शन ग्रन्थों एवं वेदांत में भी इसी का अनुसरण किया गया है। मनुस्मृति में वर्णित सृष्टि सिद्धांत, पौराणिक व आयुर्वेद ग्रन्थ भी वैदिक मत की पुष्टि करते हैं।

इस प्रकार स्पष्ट है कि सृष्टि की उत्पत्ति और जगत का विकास ही पर्यावरण प्रादुर्भाव है। सृष्टि का जो प्रयोजन है, वही पर्यावरण का भी है। जीवन और पर्यावरण का अन्योन्याश्रय संबंध है। इसीलिए आदिकाल से मानव पर्यावरण के प्रति जागरूक रहा है, ताकि मानव दीर्घायुष्व, सुस्वास्थ्य, जीवन शक्ति, पशु, कीर्ति, धन एवं विज्ञान को उपलब्ध हो सके। अथर्ववेद 19/ 71/1 में यही कामना करते हुए कहा गया है- आयुः प्राणं प्रजां पशुं। अथर्ववेद 3/ 11/ 4 शत जीव शरदो … ।, ऋग्वेद 10/18/4 – शतां जीवंतु शरदः… । तथा यजुर्वेद 25/22 – शतिमिन्नु शरदो अंति में मनुष्य के सौ वर्ष, शताधिक वसंत तक जीने की कामना की गई है। और आशीर्वाद देते हुए कहा है कि हे मनुष्य! बढ़ता हुआ तू सौ शरद ऋतु और सौ बसंत तक जीवित रहे। इंद्र अर्थात विद्युत, अग्नि, सविता अर्थात सूर्य, बृहस्पति अर्थात संकल्पशक्ति और हवन अर्थात यज्ञ तुझे सौ वर्ष तक आयुष्य प्रदान करें। ऋग्वेद 7/66/16 में कहा गया है कि किसी भी तरह सौ वर्ष आरोग्यता और बल के साथ जिएं।
हम सौ वर्ष पर्यंत, ज्ञानशक्ति का विकास करें, सौ वर्ष तक जीवन को ज्ञान के अनुकूल विकसित करें, सौ वर्ष तक वेद को सुनें और प्रवचन करें और आयु भर किसी के पराधीन न रहें। ऋग्वेद 10/18/2 -3 के अनुसार संतान और धन के साथ अभ्युदय को हम प्राप्त होते हुए बाहर से शुद्ध, अंदर से पवित्र तथा निरंतर यज्ञ करने वाले हों। नृत्य, हास्य, सरलता और कल्याणमय श्रेष्ठ मार्ग के आचरण से आयु बढ़ती है। अथर्ववेद 10/3/12 तथा 19/27/8 के अनुसार दीर्घायु प्राप्ति के लिए सर्वप्रथम अपने मन में श्रेष्ठ सद्गुण बढ़ाते हुए राष्ट्रीयता तथा क्षात्रतेज अपने अंदर बढ़ाना चाहिए। प्राणशक्ति के साथ आत्मिक बल धारण करने वाले मृत्यु के वश में नहीं जाते। इसलिए वैदिक सनातन शाश्वत भावना के अनुरूप ही पर्यावरण शुद्धि एवं सुस्वास्थ्य मानव की एक महती आवश्यकता है।
(साभार – नया इंडिया)

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