अद्भुत गाँव, यहां हिंदू-मुसलमान सब संस्कृत में करते हैं बात

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नयी दिल्ली । गांव की सुबह, आसमान में चहकती पक्षियों की आवाज, सफेद कुर्ता धोती पहने झोला टांगकर स्कूल जाते बच्चे, घरों से आती संस्कृत के श्लोकों और शंख की मधुर ध्वनि, ये दृश्य किसी गुरुकुल का नहीं बल्कि एक साधारण से गांव का है। ये गांव कर्नाटक के शिवमोगा जिले में बसा है। हम बात कर रहे हैं ‘मत्तूरु’ गांव की। इस गांव को ‘संस्कृत गांव’ के नाम से जाना जाता है। इस गांव में सब लोग आपस में संस्कृत में बातचीत करते हैं। इस बात पर यकीन करना थोड़ा मुश्किल है लेकिन ये बिल्कुल सच है। आप जब इस गांव में कदम रखेंगे तो आपको ‘नमो नम:, कथम् अस्ति? अहम् गच्छामि। त्वम् कुत्र अस्ति?’ जैसे वाक्य सुनने को मिलेंगे।
संस्कृत को मानते हैं मातृभाषा
इस गांव में संस्कृत की शिक्षा देने वाले श्रीनिधि ने बताया कि मत्तूरु गांव में करीब साढ़े 9 हजार आबादी है। गांव के लोग पिछले 40 सालों से संस्कृत में बात करते आ रहे हैं। इस गांव के लोग संस्कृत भाषा को मातृभाषा मानते हैं। अब गांव में देश विदेश से लोग संस्कृत सीखने आते हैं। गांव के लोगों को संस्कृत सीखना अनिवार्य है। गांव के सभी बच्चों को बचपन से ही संस्कृत के साथ योग और वेदों की शिक्षा दी जाती है।
संस्कृत बोलने के लिए चलाया आंदोलन
श्रीनिधि ने बताया कि गांव में संस्कृत बोलने की शुरुआत साल 1981 में हुई, जब गांव में संस्कृत भारती संस्था की स्थापना की गई। इस संस्था ने ‘संस्कृत संभाषण आंदोलन’ को शुरू किया। इस आंदोलन के तहत ये तय किया गया कि सब लोग संस्कृत को मातृभाषा मानें और अपने व्यवहार में शामिल करें। इसके बाद गांव के लोगों ने संस्था के साथ मिलकर काम किया। केवल दो साल में ही यानी 1982 में गांव को देशभर में ‘संस्कृत ग्राम’ के नाते जाना जाने लगा।
श्रीनिधि ने एनबीटी से भी संस्कृत में ही बात की। उन्होंने कहा कि वो ये नहीं मानते कि पूरा गांव संस्कृत बोलता है, लेकिन पूरा गांव संस्कृत सीखने और बोलने की कोशिश जरूर करता है। गांव के बच्चों की संस्कृत भाषा में नींव मजबूत हो सके इस वास्ते गांव में ‘शारदा शाला’ की शुरुआत की गई। ये एक स्कूल है, जहां बच्चों को संस्कृत के साथ-साथ योग और वेद की शिक्षा दी जाती है। गांव में संस्कृत और वेद की शिक्षा लेने के लिए विदेशों से तक लोग आते हैं।
संस्कृत भाषा सीखने विदेशों से आते हैं लोग
संस्कृत भारती संस्था के साथ काम करने वाले कृष्णन ने बताया कि गांव में संस्कृत सीखने के लिए कोर्स चलाए जाते हैं। यह सब परंपरागत परिधान पहनते है और चोटी रखते हैं। अगर कोई संस्कृत सीखना चाहता है तो यहां 20 दिनों का एक कोर्स चलता है। इसके लिए कोई फीस भी नहीं ली जाती। गांव के लोग संस्कृत सीखकर देशभर में बड़े पदों पर तैनात हैं। गांव में हिंदू या फिर मुसलमान सब लोग संस्कृत में ही संवाद करते हैं।
ऐसा नहीं है कि गांव के लोगों को केवल संस्कृत भाषा का ज्ञान है। इस गांव में रहने वाले लोग फर्राटेदार अंग्रेजी भी बोल सकते हैं और कर्नाटक की स्थानीय भाषा को भी जानते हैं। गांव में एक चौपाल लगती है, जहां कई बुजुर्ग हाथ में माला लिए मंत्रोच्चारण करते हैं। मत्तूरु गांव की एक खास बात यहां की शादियां हैं। गांव में आज भी पारंपरिक तरीके से शादियां होती हैं। यहां करीब 6 दिन की शादियां होती है और लोग पारंपरिक रस्मों को निभाते हैं। गांव में जातिभेद है न ही कोई और विवाद। सब लोग एक दूसरे का भरपूर सहयोग करते हैं। एक और जहां हम अपनी संस्कृति से दूर हो रहे हैं, वहीं ये कर्नाटक का मत्तूरु गांव अपनी भाषा और संस्कृति को बचाने की कोशिश कर रहा है। गांव के लोगों ने संस्कृत को केवल एक भाषा न मानकर आंदोलन की तरह बचाने का काम किया है।

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