अन्याय के विरुद्ध अनवरत जारी रहेगा स्त्री का संघर्ष

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प्रो. गीता दूबे

सभी सखियों को नमस्कार। सखियों, आज अक्सर यह बात कही जाती है कि स्त्रियाँ निरंतर सशक्त हो रही हैं। उन्हें कमोबेश ही सही आजादी मिल रही है लेकिन आधुनिक भारत के आकाश में परचम की तरह फहराई जानेवाली इस तथाकथित आजादी के बावजूद स्त्रियों की स्थिति में कोई खास परिवर्तन होता नहीं दिखाई देता। जैसे ही स्त्रियाँ थोड़ी सी चैन की साँस लेने की सोचती हैं और अपनी आजादी की सीमा में हाथ- पैर पसार कर निश्चय करना चाहती हैं कि यह हकीकत ही है, स्वप्न नहीं, ठीक उसी समय देश में कोई ना कोई ऐसी घटना घट जाती है कि हम स्त्रियों को अपनी आजादी पर‌ शक होने लगता है। और तब हमें ऐसा लगता है कि यह क्या, यह आज़ादी तो नकली है। अभी भी हमारे समाज के बहुसंख्यक लोग स्त्री की जगह घर की चारदीवारी के अंदर‌ ही मानते हैं और‌ जैसे ही वह घर से बाहर निकलकर अपने लिए कोई मक़ाम हासिल करना चाहती है, उसकी राह में रोड़े अटकाना शुरू कर‌ देते हैं। पहले तो एक समय सारिणी तय कर‌ दी जाती है, जिसका अनुपालन उसे करना होता है और उसका जरा सा उल्लंघन करने पर उसकी न केवल बुरी तरह आलोचना की जाती है बल्कि घर- समाज वाले उस को लांक्षित करने से भी नहीं चूकते। इन स्थितियों को देखते हुए अनायास एक प्रश्न मन में जन्म लेता है कि आखिर तमाम दावों के बावजूद स्त्री की स्थिति सुधरती नजर क्यों नहीं आती। क्यों समाज का बड़ा हिस्सा स्त्री को दोयम दरजे की नागरिक ही नहीं एक दासी से भी बदतर मानता है, जिसे जब चाहे तब लांक्षित, अपमानित या दंडित किया जा सकता है। वस्तुत: स्त्री के साथ -साथ समाज को जितनी तेजी से बदलना चाहिए था, वह बहुत कम बदला। मन में यौन कुंठा और रुढ़िवादी विचारों को छिपाए तथाकथित प्रगतिशील नागरिक स्त्री मुक्ति की बात और वकालत तो करते हैं लेकिन किसी न किसी मौके पर उनके अंदर का वनैला पशु अपने दाँत और नाखूनों से स्त्री की अस्मिता को घायल करने से बाज नहीं आता है। हालांकि हम शिक्षा के क्षेत्र में लगातार नई ऊंचाइयों को छूने की कोशिश में लगे हुए हैं, वह चाहे विज्ञान का क्षेत्र हो या तकनीक का, लेकिन सभ्यता के कई चरण पार करने के बावजूद, जंगलों और कंदराओं से निकलकर अंतरिक्ष में अपनी विजय पताका फहराने के बावजूद, हम अभी तक सही अर्थों में न सभ्य हो पाएं हैं न ही सजग और संवेदनशील नागरिक ही बन पाए हैं।

इसी सिलसिले में एक और बात जोड़ना चाहती हूँ कि हम अपने इतिहास और प्राचीन साहित्य से भी कुछ नहीं सीखते। बार -बार उन गलियारों से गुजरने के बावजूद उससे प्राप्त सीख की कोई पुख्ता छाप हमारे मन पर अगर नहीं पड़ती तो यह दोष हमारे मन में छिपकर बैठे, नाग की तरह फुंफकारते अहंकार का है, जिसके कारण शिक्षा के प्रकाश में नहाने के बावजूद हम मन में छिपे मैल से पीछा नहीं छुड़ा पाते। लॉकडाउन के कारण इन दिनों हमारे घर के छोटे पर्दे पर हमारे ‌दो पौराणिक आख्यानों रामायण और महाभारत का पुनर्प्रसारण हो रहा है। मैंने पाया कि लोग बड़े भक्ति भाव से उस सुनी हुई कथा और हाल फिलहाल में देखें गये धारावाहिक को पुनः बड़े मनोयोग से तयशुदा समय पर‌ देखते हैं। उन आख्यानों में घटित हुई अन्यायपू्र्ण घटनाओं की प्रत्यक्ष आलोचना करते हुए सत्य के पक्ष में खड़े नजर आते हैं। अन्याय चाहे रावण का हो या कौरवों का उनके पक्ष में जनमत नहीं बनता। लोग रावण वध का समर्थन करते हैं और कौरव सेना के विनाश पर खुश होते हैं। साथ ही हर गलत बात की निंदा भी करते हैं, वह चाहे सीता की अग्निपरीक्षा हो या निष्कासन, द्रौपदी का दांव पर‌ लगाया जाना हो या भरी सभा में किया गया, उसका चीरहरण जो सिद्ध करता है कि जब मनुष्य के अंदर का राक्षस जाग जाता है तो उसके लिए रिश्तों की मर्यादा भी कोई मायने नहीं रखती। इस प्रसंग में एक और बात कहना चाहूंगी कि रामायण और महाभारत की कथा में एक विशेष अंतर अवश्य दिखाई देता है कि त्रेता से द्वापर तक का सफर करते हुए समाज की नैतिकता और मूल्यों में कफी परिवर्तन आ गया था। रावण परस्त्री अर्थात सीता का हरण अवश्य करता है लेकिन उसका शीलभंग करने का प्रयत्न नहीं करता। यह बात और है कि इसके बावजूद सीता को अग्निपरीक्षा देनी पड़ी। वहीं महाभारत में सामाजिक और पारिवारिक नैतिकता बहुधा खंड- खंड होती नजर आती है। वह चाहे दुर्योधन, दुशासन हों या जरासंध, सभी अपनी भाभी या सलहज पर न केवल कुदृष्टि डालते हैं बल्कि भरे समाज में उसकी मर्यादा का हनन करते हुए जरा भी लज्जित नहीं होते। और तब से लेकर आज तक हमारा समाज बहुत आगे बढ़ गया है, इसी कारण नैतिकता के बंधन और भी शिथिल हो चुके हैं, विशेषकर स्त्री के प्रति अनैतिक आचरण में उत्तरोत्तर ‌वृद्धि हुई हैं। हालांकि आज‌ हम यह दावा करते नहीं अघाते कि भारत‌ विश्वगुरु है लेकिन यह अहंकार पू्र्ण घोषणा करते हुए हम यह भूल जाते हैं कि गुरू बनने से पहले बहुत कुछ सीखना पड़ता है। पहले हम सही तरीके से आचरण करना तो सीख जाएं तब दूसरों को सिखाने का भरम पालने का जोखिम उठाएं। इसी संदर्भ में मैं पुनः उन पौराणिक आख्यानों की कथा याद दिलाते हुए कहूंगी कि हमने पढ़ा और देखा कि स्त्री के प्रति हुए अन्याय के कारण महाभारत जैसा युद्ध घटित हुआ जिसमें दोनों ही पक्षों ने बहुत कुछ खोया। लेकिन उससे भी हमने कुछ नहीं सीखा। हमारी सहानुभूति धारावाहिक देखते हुए भले ही द्रौपदी के साथ होती है लेकिन सभ्य समाज के ऐसे बहुत से शिक्षित पुरुष हैं जिनके अंदर छिपे दुर्योधन और दुशासन किसी सक्षम और सबल स्त्री को सामने चुनौती के रूप में खड़ी देखकर जाग जाते हैं और‌ वे उसे उसी तरह अपमानित करते हैं जैसे हस्तिनापुर की भरी सभा में द्रौपदी को अपमानित किया गया था। तकलीफ इस बात की है कि आज भी भीष्म, द्रोणाचार्य, कृपाचार्य जैसे लोग चुप्पी साधे बैठे हुए हैं। निश्चित तौर पर यह चुप्पी शांति की द्योतक नहीं बल्कि कायरता और निर्लज्जता का प्रतीक है। 

सखियों, आखिर कब तक  स्त्रियों को यह अपमान झेलना होगा। आज राजतंत्र नहीं लोकतंत्र है लेकिन इस लोकतंत्र में बहुधा उसी को न्याय मिलता है जो हर प्रकार से समर्थ हो। तो बाकी लोगों के पास क्या घुट- घुट कर जीने और रोते- रोते मर जाने का विकल्प ही बचता है। लेकिन इस विकल्प से न तो मनुष्य बचेगा ना मनुष्यता, न देश बचेगा ना सभ्यता। इसलिए हर किस्म के अन्याय के प्रति विरोध का बिगुल बजाने की जरूरत है, वह चाहे स्त्री के प्रति हो या किसी भी जाति, धर्म या देश के व्यक्ति के प्रति।

  सखियों, जहाँ तक बात स्ती के प्रति होनेवाले अन्याय या अत्याचार की है तो मुझे लगता है कि स्त्रियों को इस तरह की घटनाओं के खिलाफ डटकर खड़ा होना चाहिए और तमाम स्त्रियों को उन जुझारू स्त्रियों की हिम्मत बढ़ानी चाहिए जो अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही हैं। तथाकथित सामाजिक मान- अपमान के सवाल को दरकिनार कर स्वाभिमान की लड़ाई लड़ना मुश्किल भले ही है लेकिन इस लड़ाई को स्थगित नहीं किया जा सकता। सखियों, स्त्री को अपनी इस लड़ाई को पूरे दम- खम के साथ जारी रखना होगा क्योंकि इसके अलावा हमारे सामने को रास्ता भी नहीं है। रंजना जायसवाल की कविता “संघर्ष” की इन पंक्तियों के साथ मैं आज अपनी बात समाप्त करती हूँ लेकिन यह उम्मीद करती हूँ कि हर अपमान और अन्याय के विरुद्ध स्त्री का संघर्ष अनवरत जारी रहेगा। स्त्री शक्ति न झुकेगी, न हारेगी बल्कि अन्याय के थपेडों का सामना अपनी अपराजेय जिजीविषा शक्ति के साथ करेगी।

“समुद्र की लहरें

बहा ले जाना चाहती हैं

अपने साथ

मेरा अस्तित्व

और मैं

अटल खड़ी

समेट लेना चाहती हूँ

पूरे समुद्र को

अपने भीतर।”

 

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