अर्चना संस्था ने शब्दों से खेली होली 

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कोलकाता ।  अर्चना संस्था ने जूम ऑनलाइन माध्यम पर सदस्यों के साथ शब्दों की स्वरचित खेली होली। फागुनी बयार आई रंग भरा प्यार लाई। गुनगुनाती धूप आई किशमिश ठंड लाई। विद्या भंडारी, प्रसन्न चोपड़ा ने मुझ पर क्यों चिल्लाते पत्नी जोर से चिल्लाई, भारती मेहता – रंग तो बहुत रहे मेरे पास भरूँ किसमें, अनुकूल आकृति ही न मिली !, उषा श्राफ -रंगों का इन्द्र धनुष है होली, मृदुला कोठारी ने आओ भाईलिया धूम मचावा, सतरंगी फागणियो मनावा। शशि कंकानी ने पीछे- पीछे गोप चलत हैं, आगे चले नन्द लाल।भरके हाथों में अबीर,गुलाल रे कि आयो होली रो त्यौहार। सुशीला चनानी ने होली की रंग-रंगीली गोष्ठी में खूब रंग बरसे!हम सब भीगे!आनन्द आ गया ।
सब टाइटिल की आस लगाये बैठे थे वो भी पूरी होगी छारण्डी के दिन ! । इन्दु ने भी मीठे मीठे फूलों करंग बरसाये और अन्त में हिम्मत जी ने होली का खूब हुडदंग मचाया ! सांचो कहूँ सखी वृन्दावन को सो सो आनन्द भयो आज तो!, सुशीला चनानी ने होली आयी रस भरी,बरसे चहुँ दिशा रंग।पग थिरके पायल बिना,बाजे ढोल मृदंग।। राधा कृष्ण होरी-(मन हरण छन्द)भर पिचकारी कान्हा, राधिका को मारी, हिम्मत चोरड़़िया ने गीत -कुण्डलिया- सारे रंगो से सजा, होली का बाजार, जोगीरा-आओ मिलकर खेलें होली.., बनेचंद मालू की पंक्तियाँ जब आता है फागुन का महीना,छा जाता है कुछ नशा सा!/भीना भीना!.. इन्दु चाण्डक के संचालन में हुई गोष्ठी में विद्या भंडारी ,सुशीला चनानी,मृदुला कोठारी ,बने चन्द जी मालू,नवरतन भंडारी ,प्रसन्न चोपड़ा ,हिम्मत चोरड़िया,संगीता चौधरी ,शशि कंकाणी ,भारती मेहता ,ऊषा सराफ ने शिरकत की।
होली के सतरंगी रगों में भीगी गोष्ठी में सभी रचनाकारों ने विभिन्न भाव शब्दो में भर कर पिचकारी चलायी ।बहुत ही आनन्द और उल्लास भरी गोष्ठी में सभी सदस्यों की सहभागिता रही। डॉ वसुंधरा मिश्र ने कार्यक्रम की जानकारी दी ।

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