अवैध कॉलोनियां शहरी विकास में बाधक, कार्ययोजना बनाएं राज्य – सुप्रीम कोर्ट

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नयी दिल्ली । देश भर में पनप रही अवैध कॉलोनियों पर चिंता जताते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ये कॉलोनियां शहरी विकास में बाधक हैं। शीर्ष कोर्ट ने कहा, राज्य सरकारें इन कॉलोनियों को बनने से रोकने के लिए समग्र कार्ययोजना बनाएं।
जस्टिस एल नागेश्वर राव और जस्टिस बीआर गवई की पीठ ने वरिष्ठ वकील गोपाल शंकरनारायणन को इस मामले में न्यायमित्र भी नियुक्त किया। उन्हें यह सुझाव देने के लिए कहा है कि इन कॉलोनियों को बनने से रोकने के लिए सरकारें क्या कदम उठा सकती हैं। शीर्ष अदालत सामाजिक कार्यकर्ता जुवादी सागर राव की याचिका पर सुनवाई कर रही थी। याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील श्रवण कुमार ने कहा, तेलंगाना, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश की सरकारें अपने राज्यों में अवैध कॉलोनियों को नियमित कर रही हैं। पीठ ने कहा, देश के हर शहर में कुकुरमुत्तों की तरह पनप रहीं अवैध कॉलोनियों के भयावह परिणाम हो रहे हैं। हमने हैदराबाद और केरल में बाढ़ की स्थिति देखी है, यह सब अवैध कॉलोनियों के कारण हुआ। शीर्ष अदालत ने इन कॉलोनियों से संबंधित सारे रिकॉर्ड न्यायमित्र को सौंपने का निर्देश दिया। न्यायमित्र दो सप्ताह में सुझाव अदालत के सामने रखेंगे। मामले की सुनवाई तीन सप्ताह बाद फिर होगी।
क्या कॉलोनियों का रजिस्ट्रेशन बंद कर दें
एक सुझाव यह है कि इन कॉलोनियों का रजिस्ट्रेशन बंद कर दिया जाए ताकि लोग मालिकाना हक का दावा न कर सकें। राज्य सरकारें कोई कदम उठाएं, अन्यथा हमें कोई राह निकालनी होगी। -सुप्रीम कोर्ट
कानूनों का उल्लंघन कर रहे अधिकारी
याचिका में कहा गया है कि इन शहरों के अधिकारियों ने फिर से अवैध कॉलोनियों को नियमित करने के लिए नोटिस जारी किया है। यह कानून के शासन और इमारत कानून आदि का गंभीर उल्लंघन है। ऐसा करने से अवैध निर्माण को बढ़ावा मिलता है।
उधर…राजधानी दिल्ली में झुग्गियां ढहाने पर रोक
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को दिल्ली के सरोजिनी नगर इलाके में करीब 200 झुग्गियों को हटाने की कार्रवाई पर रोक लगाते हुए कहा कि आदर्श सरकार को मानवीय रुख अपनाना चाहिए क्योंकि यह मौलिक अधिकार से जुड़ा मसला है। शीर्ष अदालत ने झुग्गीवासियों की याचिका पर केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर जवाब दाखिल करने के लिए कहा है। याचिका में गुहार लगाई है कि बिना उचित राहत व पुनर्वास योजना के कोई कार्रवाई नहीं होनी चाहिए।
जस्टिस केएम जोसेफ और जस्टिस हृषिकेश रॉय की पीठ ने आदेश में कहा, कोई दंडात्मक या जबरन कार्रवाई नहीं होगी। सोमवार को अगली सुनवाई की जाएगी। पीठ ने कहा, जब आप आदर्श सरकार के रूप में उनसे व्यवहार करते हैं, तो आप यह नहीं कह सकते कि आपके पास कोई नीति नहीं है। बस उन्हें वहां से हटा दें। शीर्ष अदालत ने दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि हर झुग्गीवाले व्यक्ति के पास भी व्यक्तिगत अधिकार है।
सरकारी जमीन पर कब्जे से रहने का हक नहीं
केंद्र सरकार की ओर से पेश एडिशनल सॉलिसिटर जनरल केएम नटराज ने तर्क दिया, किसी ने सरकारी जमीन पर कब्जा कर मतदाता पहचानपत्र हासिल कर लिया, तो उसे रहने का अधिकार नहीं मिल सकता है। वहीं, दिल्ली सरकार का प्रतिनिधित्व करने वाले वकील ने कहा, लोगों की रक्षा की जानी चाहिए।
न्यायिक विस्टा बनाने पर सुप्रीम कोर्ट ने पूछा केंद्र का रुख
सुप्रीम कोर्ट ने अदालत और बार की बढ़ती जरूरतों को लेकर शीर्ष अदालत के आसपास के क्षेत्र में न्यायिक विस्टा बनाए जाने को लेकर सोमवार को केंद्र का रुख पूछा। इस विस्टा में राष्ट्रीय राजधानी में मौजूद सभी अधीनस्थ अदालतों, न्यायाधिकरणों, दिल्ली हाईकोर्ट, बार एसोसिएशनों के लिए न्यायिक अवसंरचना बनाने का विचार रखा गया है।
जस्टिस विनीत शरण और जस्टिस जेके माहेश्वरी की पीठ ने न्यायपालिका की बढ़ती जरूरतों के मद्देनजर अनियमित निर्माण का संदर्भ देते हुए पूछा कि क्या सेंट्रल विस्टा की तर्ज पर न्यायिक विस्टा के बारे में सोचा जा सकता है।
सेंट्रल विस्टा संसद, केंद्र सरकार के कार्यालयों और लुटियंस जोन की अन्य महत्वपूर्ण इमारतों की पुनर्निर्माण परियोजना है। पीठ ने कहा, हम यह निर्देश नहीं दे रहे कि आप यह करें या वह करें। लेकिन हम इस मामले में केंद्र का पक्ष जानना चाहते हैं।

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