आदिवासी जीवन और संस्‍कृति पर केंद्रित होगा 28वां हिंदी मेला 

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कोलकाता । देश में मातृभाषा प्रेम, सांस्कृतिक विविधता और अभिव्यक्ति की आजादी के पक्ष में कोलकाता का सात दिनों का हिंदी मेला आगामी 26 दिसंबर को शुरू हो रहा है। इसका उद्घाटन मानिकतला के राममोहन हाल में लघु नाटक मेला के साथ होगा और 1 जनवरी तक बाकी 6 दिनों का आयोजन पास के फेडरेशन हॉल सोसाइटी में होगा।

हिंदी मेला की राष्ट्रीय संगोष्ठी में देश के कई सुप्रसिद्ध हिंदी साहित्यकार और आदिवासी विमर्शकार आ रहे हैं। उनमें मोहनदास नैमिषराय, भगवानदास मोरवाल, रवि भूषण, मधु कांकरिया, अवधेश प्रधान, महादेव टोप्पो,मृत्युंजय कुमार सिंह आदि प्रमुख हैं। एक प्रेस कांफ्रेंस को संबोधित करते हुए मिशन के संयुक्त महासचिव प्रो. संजय जायसवाल ने 28वें हिंदी मेले की केंद्रीय थीम पर चर्चा करते हुए कहा कि आदिवासी साहित्य -संस्कृति से महानगर के लोगों का संवाद इस बार का फोकस है। इसका उद्देश्य भारतीय संस्कृति की अखंडता को मजबूत करना है। इस अवसर पर विशेष रूप से उपस्थित प्रसिद्ध कवि आलोचक डा. विजय बहादुर सिंह ने कहा कि हिंदी मेला में गांवों के मेले की आत्मा है और पूरे देश में यह एक अनोखा प्रयोग है। शिक्षाविद और मिशन के अध्यक्ष शंभुनाथ ने कहा कि जब देश में कहीं लिटरेरी फेस्टिवल नहीं होता था, तब से हिंदी मेला हो रहा है। इसमें पटाखे न हों, पर यह हिंदी में अखंड भारतीय आत्मा का उत्सव है। इस अवसर पर डा. राजेश मिश्र, रामनिवास द्विवेदी और महेश जायसवाल ने भी हिंदी मेला का अभिनंदन किया।

कोलकाता का हिंदी मेला युवाओं और विद्यार्थियों के लिए एक पहचान बन चुका है। इस मेले का मुख्य आकर्षण इस बार विभिन्न भाषाओं के गान पर नृत्य और मल्टीमीडिया काव्य प्रस्तुति है। हिंदी मेला में देश के दूसरे राज्यों के विश्वविद्यालयों के भी विद्यार्थी बड़ी संख्या में भाग लेते हैं। हिंदी मेला विद्यार्थियों और नौजवानों के बीच खासतौर पर लोकप्रिय है और कोलकाता का गौरव है।

हिंदी मेला भारत में अपनी तरह का अनोखा है। यह बच्चों, विद्यार्थियों और नौजवानों के बीच साहित्य को लोकप्रियकरण बनाने का अभियान है। इसमें पश्चिम बंगाल के विभिन्न कोनों से 3000 से अधिक बच्चे, विद्यार्थी और नौजवान भाग ले रहे हैं। हिंदी मेले का उद्देश्य युवाओं के मन में हिंदी भाषा, साहित्य और उदार भारतीय संस्कृति के प्रति अनुराग पैदा करना है और युवाओं की सृजनात्मक प्रतिभा को प्रकाश में लाना है।

28वें हिंदी मेले में कई सांस्कृतिक प्रतियोगिताओं का आयोजन किया गया है, जिनमें लघु नाटक, काव्य आवृत्ति, काव्य संगीत, काव्य नृत्य, आशु भाषण, हिंदी प्रश्न मंच, लोक गीत, कविता पोस्टर, मल्टीमीडिया, रचनात्मक लेखन, कविता कोलाज, वाद-विवाद, फोटोग्राफी और चित्रांकन प्रमुख हैं। इन प्रतियोगिताओं में भाग लेने वाले नौजवानों और विद्यार्थियों के पुरस्कार हिंदी के बड़े साहित्यकारों के नाम पर हैं। बच्चे और युवा निराला, प्रसाद, महादेवी वर्मा, नागार्जुन, अज्ञेय, मुक्तिबोध, हरिवंश राय बच्चन, धूमिल, सर्वेश्वर, केदारनाथ सिंह, मंगलेश डबराल, अनामिका, कात्‍यायनी, कुमार अंबुज, दुष्यंत कुमार आदि की कविताओं की आवृत्ति करते हैं, उन्हें वाद्ययंत्र पर गाते हैं, उन कविताओं के भाव पर आधारित नृत्य करते हैं और पोस्टर या चित्र बनाते हैं। हिंदी मेला में लोक धुनों के बाजारीकरण के समानांतर स्वस्थ लोकगीत सांस्कृतिक उमंग के साथ गाए जाते हैं। हिंदी मेला साहित्य और कलाओं का अंत:संबंध मजबूत करने का अभियान भी है।

यह चिंताजनक है कि उच्चत्तर उद्देश्यों को समर्पित शिक्षण-संस्थान भी पॉप कल्चर की चपेट में आ गए हैं। हिंदी मेला की सांस्कृतिक प्रतियोगिताएं पॉप कल्चर के प्रतिवाद और असहमति में खड़ी हैं। सांस्कृतिक पुनर्निर्माण मिशन ने यह निर्णय लिया है कि इस वर्ष कोलकाता विश्वविद्यालय की पूर्व प्रोफेसर चंद्रकला पांडेय (कोलकाता) एवं बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर अवधेश प्रधान (बनारस) को ‘कल्याणमल लोढ़ा-लिली लोढ़ा शिक्षा सम्मान’ प्रदान किया जाएगा। हिंदी मेला हिंदी की अखंडता और भारतीय भाषाओं के आत्मसम्मान की रक्षा के लिए एक विशिष्ट आवाज है। यह उल्लेखनीय है कि हिंदी मेला शिक्षकों, लेखकों और साहित्य प्रेमियों के आर्थिक सहयोग के साथ हो रहा है। जमीन से जुड़ा इस तरह का हिंदी मेला अन्य हिंदी राज्यों में भी आयोजित होना चाहिए।

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