आयातित नहीं, मिथक नहीं, बंगाल की परम्परा और इतिहास हैं राम

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शुभजिता फीचर डेस्क

राम और कृष्ण भारत की आत्मा हैं और एक ऐसा इतिहास भी, जिसे तथाकथित प्रबुद्ध वर्ग ने दबाने और छुपाने का भरपूर प्रयास किया। प्राचीन इतिहास को साहित्य से लेकर शिक्षण संस्थानों से बाहर किया गया और राम को लेकर तो राजनीति ही हो रही है। प्रबुद्ध वर्ग को सम्भवतः यह स्मरण नहीं कि बंगाल इसी भारत भूमि का अंग है…आप इतिहास और संस्कृति को जितना दबायेंगे, वह उतनी ही शक्ति और वेग के साथ आपके सामने होंगे। हद तो तब हो गयी जब राम को ही आयातित बताने वाले खड़े हो गये…कहा गया कि राम नहीं बल्कि दुर्गा बंगाल की देवी हैं…और वे याद रखना भूल गये कि इस बंगाल में वैष्णव परम्परा ही आदि परम्परा रही है और शक्ति की आराधना इसके बाद आरम्भ हुई। 13वीं शताब्दी में द्वैत वैष्णव आराधना की माधव शाखा विद्यमान थी जो विजय नगर के उडूपी से फैले और नीलांचल (पुरी, ओडिशा) से होती हुई बंगाल पहुँची। माधवेन्द्र पुरी, ईश्वर तीर्थ और श्री चैतन्य इसके केन्द्र में थे। माधवाचार्य के पूर्व 9 वीं शताब्दी में मल्ल शासकों के अन्तर्गत आने वाले गंगा के दक्षिणी भाग और रहर बंगाल में भी वैष्णव परम्परा थी। कृतिवास की रामायण है और खुद राम ने भी शक्ति की आराधना की थी। ऐसे में जरूरी था कि यह सत्य सामने आये कि बंगाल न तृण का है…न वाम का है…इसके लोकमानस में राम ही हैं….और सनातन ही हैं और आज से नहीं हैं…तब से हैं जब प्रबुद्ध वर्ग का जन्म भी नहीं हुआ था। इस बार यात्रा बंग भूमि के उन स्थलों और परम्पराओं की ओर….जहाँ राम भी हैं और रामायण भी…
पुरुलिया का अयोध्या सर्किट और सीता कुंड

सीता कुंड, पुरुलिया

सीता कुंड पुरुलिया की अयोध्या ग्राम पंचायत के बाघमुंडी गाँव में है। यहाँ छोटे जलाशयों में कमल दिखते हैं। सीता कुंड का सम्बन्ध रामायण से है। हिन्दु मिथकों के अनुसार राम और सीता अयोध्या की पहाड़ियों में आये थे और वनवास के दौरान रहे भी। सीता को प्यास लगी थी और राम उनकी प्यास बुझाने के लिए अपने वाणों से धरती से जल प्रवाहित किया और सीता की प्यास बुझी। अतएव इस स्थान को सीता कुंड कहते हैं। टुंड्रा समुदाय के लोग शिकार पर जाने से पहले सीता कुंड का पानी पीते हैं। स्थानीय लोगों ने सीता कुंड से 500 मीटर की दूरी पर राम मंदिर भी बनवाया है। लोग यहाँ आराधना भी करते हैं।
मालदा का रामकेलि गाँव

रामकेलि मंदिर, मालदा

रामकेलि गाँव। यहाँ है 500 साल पुराना मदन मोहन मंदिर। मान्यता है कि यहाँ श्रीराम 4 दिन ठहरे थे और सीता ने पिंडदान यहीं किया था। आज भी महिलायें यहाँ बिहार से पिंडदान करने आती हैं। सीता का कुंड और रामायण का वटवृक्ष होने की मान्यता भी है। रामकेलि गाँव की प्रसिद्धि यहाँ स्थित मदन मोहन जिउ मंदिर के लिए है। जिस स्थान पर यह मंदिर है, वहाँ वृन्दावन की तरफ जा रहे श्री चैतन्य देव ने विश्राम किया था। आज भी एक पत्थर पर उनके चरण चिह्न हैं। इसके साथ ही कदम्ब और तमाल के वृक्ष हैं जिसके पास यह मंदिर बनाया गया है मगर रामकेलि की ख्याति का एक और कारण है जिसके बारे में बात कम होती है। सनातन धर्म में महिलाओं को पिंडदान की अनुमति नहीं है मगर इस स्थान पर आज भी बिहार से महिलाएँ पिंडदान करने आती हैं। इस दौरान एक मेला लगता है और आम तौर पर यह ज्येष्ठ, श्रावण और आषाढ़ में लगता है। यहाँ फिरोज मीनार के पास जहाँ यह कुंड है, वहीं पर एक बरगद का वृक्ष भी है। दावा किया जाता है कि यह वृक्ष भी काफी पुराना है। पंडित पाणिग्रही के मुताबिक महाप्रभु चैतन्य देव 15 जून 1515 को रामकेलि आये थे और रूप सनातन से उनकी भेंट भी इसी स्थान पर हुई थी। इस स्थान का उल्लेख रामकेलि पंजिका में भी किया गया है। राम से इसका सम्बन्ध शोध का वि। हो सकता है परन्तु यह स्थान वैष्णव परम्परा की धारा का साक्षी तो है ही।

बाँकुड़ा का रामनवमी मेला और बाउल मिलन

राममंदिर, विष्णुपुर, बांकुड़ा,

बाँकुड़ा में है सोनामुखी और यहीं पर होता है रामनवमी मेला। मेले में बाउल एकत्रित होते है। इस मेले को जयदेवी केन्दुली मेला का लघु रूप भी माना जाता है। सोनामुखी के सदियों पुराने रामनवमी मेले में वैष्णव धारा की अविच्छिन परम्परा के साथा संथाली तथा राजवाड़ी संस्कृति की झलक भी मिलती है।
हुगली के गुप्तीपाड़ा का रामचन्द्र मंदिर

गुप्तीपाड़ा का रामचन्द्र मंदिर

हुगली में 18वीं सदी में चारचाला मंदिर है जहाँ ईस्ट इंडिया कम्पनी के जमाने से श्रीराम की आराधना होती आ रही है औऱ यह कोलकाता से अधिक दूर भी नहीं है। इस टेराकोटा मंजिर में कृष्णचन्द्र. वृन्दावन चन्द्र और चैतन्य भी हैं। हालाँकि ये चार मंदिर अलग – अलग काल में निर्मित किये गये हैं पर रामचन्द्र मंदिर शेवड़ाफुली के राजा हरीश चन्द्र राय ने बनवाया था। टेराकोटा शैली का उत्कृष्ट उदाहरण है यह मंदिर और इसकी दीवारों पर रामायण की गाथा भी उत्कीर्ण है। गुप्तीपारा के मंदिर परिसर में चार भव्य वैष्णव मंदिर हैं: चैतन्य, वृंदावनचंद्र, रामचंद्र और कृष्णचंद्र। रामचंद्र मंदिरों में कई टेराकोटा कलाकृतियाँ हैं, और सभी संरचनाएं बंगाल की स्थापत्य कला की भव्यता दर्शाती हैं जिसमें महाकाव्यों और पुराणों के दृश्यों को चित्रित करने वाली नक्काशी है। मुख्य मंदिर वृंदावन चंद्रजी का मंदिर है। इसके बाईं ओर कृष्ण चंद्रजी का मंदिर है और दाईं ओर एक रामचंद्र मंदिर है। वृंदावन चंद्र मंदिर में भगवान जगन्नाथ, बलराम और सुभद्रा की मूर्तियां हैं। रथ यात्रा यहां का सबसे मनाया जाने वाला त्योहार है।
मिदनापुर के चन्द्रकोना का रघुनाथ मंदिर

चन्द्रकोना रघुनाथ मंदिर के भग्नावशेष

राजा चन्द्रकेतु द्वारा स्थापित चन्द्रकोना में कई मंदिर हैं जो रघुनाथ जी को समर्पित हैं। रघुनाथ अर्थात श्रीराम और मल्यनाथ और लाल (दोनों ही श्रीकृष्ण से सम्बन्धित) बताया जाता है कि 17वीं शताब्दी में यह मंदिर बर्दवान के कृतचन्द ने बनवाया था। रघुनाथ जी का मंदिर ओडिशा की स्थापत्य शैली से प्रेरित है और 52 फीट ऊँचा है मगर संरक्षण की कोई व्यवस्था नहीं है।
हावड़ा के रामराजातला का राम मंदिर और रामनवमी मेला

हावड़ा के रामराजातला का राम मंदिर

अयोध्याराम चौधरी, जमींदार ने इस क्षेत्र में पहली बार राम पूजा शुरू की। उनके अनुसार, उन्हें भगवान राम की पूजा करने के लिए कुछ दिव्य निर्देश मिले थे। उसके बाद उन्होंने भगवान राम की एक विशाल बारोवारी पूजा शुरू की। समय के साथ यह पूजा लोकप्रिय होती गयी और इस इलाके का नाम ही रामराजातला रखा गया। लेकिन उस समय उस क्षेत्र में सरस्वती पूजा बहुत प्रसिद्ध थी और ग्रामीण पिछले 300 वर्षों से इसका आयोजन करते आ रहे थे। तो सरस्वती पूजा करने वाले कुछ ग्रामीणों ने राम पूजा का विरोध किया। दोनों समूह कई चर्चाओं के बाद इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि राम पूजा की जाएगी और ज्ञान की देवी सरस्वती को भगवान राम और सीता के शीर्ष पर रखा जाएगा। उस दिन से प्रथा ने सरस्वती पूजा के दिन चौधरी पारा शिव मंदिर में षष्ठितला के बांस के खांचे से बांस काटना शुरू कर दिया और उन बांसों की पहली पूजा की। शुरूआती दिनों में मेले में पहले तीन दिन पूजा होती थी। उसके बाद यह एक पखवाड़े तक और फिर एक महीने तक चलता रहा। अब राम पूजा चैत्र-बैसाख मास की रामनवमी से शुरू होकर श्रावण मास के अंतिम रविवार तक चलती है। यह पश्चिम बंगाल में सबसे लंबे समय तक चलने वाला मेला है। 18वीं सदी में वामन अवतार और सावित्री सत्यवान मंदिर भी बने। मंदिर की दीवारों पर रामायण और महाभारत की गाथा उकेरी गयी है।
नदिया के कृष्णगंज का राम सीता मंदिर

नदिया शिवनिवास मंदिर परिसर में भी श्रीराम हैं

नदिया के कृष्णगंज में लाल ईंटों से बना यह मंदिर 1762 में स्थापित किया गया था और शिवनिवास मंदिर परिसर में है। इनमें राम सीता मंदिर, राजराजेश्वर शिव मंदिर और रागिनीश्वर शिव मंदिर है और इसका एक शिखर है। यह चार चाला स्थापत्य शैली में बना मंदिर है और मर्यादा पुरुषोत्तम राम की आराधना की दैनिक आराधना का केन्द्र भी है। कृष्णगंज की स्थापना राजा कृष्ण चन्द्र द्वारा एक अस्थायी नगर के रूप में की गयी थी और बर्गीजों के आक्रमण से बचने के लिए राजधानी को कृष्णनगर से कृष्णगंज में स्थानांतरित किया गया था। यहाँ पत्थरों का इस्तेमाल मंदिर के लिए किया गया है और श्रीराम और सीता देवी की अष्टधातु से बनी प्रतिमाएं स्थापित की गयी हैं।
मिदनापुर के तमलुक का रामजिओ देओल और सीता -राम मंदिर

मिदनापुर के तमलुक में स्थित राम जिउ मंदिर

मिदनापुर के तमलुक के हरीर बाजार इलाके में ओडिशा स्थापत्य शैली में निर्मित रामजिउ मंदिर है जो 18वीं सदी में बना था। यह चार चाला शैली में निर्मित मंदिर है। घाटाल के खारार में सीता राम देओल टेराकोटा स्थापत्य शैली का एक और मंदिर है और इसकी विशेषता इसके 13 शिखर हैं। यह मंदिर 1865 में माजी जमीन्दारों द्वारा बनवाया गया था।
मिदनापुर के चिरुलिया का रामचन्द्र मंदिर

मंदिर की भव्यता दिखती है यहाँ

यह मंदिर बड़ो चाला मंदिर के नाम से भी प्रसिद्ध है और यह बंगाल का एकमात्र 12 चाला मंदिर है जो टेराकोटा स्थापत्य शैली में निर्मित है। इसकी स्थापना 1843 में हुई थी।
मुर्शिदाबाद के नाशीपुर का रघुनाथजी मंदिर

मुर्शिदाबाद के नाशीपुर में राजबाड़ी व मंदिर

मुर्शिदाबाद जिले के भगवानगोला महकमे में नाशीपुर एक गाँव है। नाशीपुर की राजबाड़ी एक पर्यटनस्थल भी है। इसे मूल रूप से नाशीपुर राज परिवार के राजा देवी सिंह ने स्थापित किया था और बाद में 1865 में राजा कीर्ति सिंह बहादुर ने इसे फिर से बनवाया। रघुनाथ जी मंदिर यहाँ का प्रमुख आकर्षण है।
मिदनापुर के राउतारा का सीता रामजू मंदिर

घोषपाड़ा में स्थित राउतारा में है सीताराम जिउ मंदिर दो 1700 में बना था। यह पारम्परिक 8 चाला टेराकोटा शैली में ईंटों से बना मंदिर है। इस मंदिर को घोष जमींदार परिवार ने बनवाया था। इसमें 13 शिखर हैं।

नदिया का मटियारी राम सीता मंदिर और ग्रामीण राम नवमी उत्सव

नदिया के मटियारी में स्थित प्रतिमा

मटियारी गंगा से दूर दैनहाटा बाजार में एक छोटा सा गांव है। मतिरारी जमींदारी प्रशासनिक परिसर में स्थित मटियारी राम सीता मंदिर की कटवा-दैनहाटा-माझेरग्राम क्षेत्र के लोगों के लिए अपनी श्रद्धा है ।ऐतिहासिक रामनवमी उत्सव और मेला इस इलाके के गांवों और छोटे शहरों से हजारों लोगों को आकर्षित करते हैं। मंदिर में भगवान राम, सीता देवी और लक्ष्मण जी की मूर्तियां हैं।
पुरुलिया का गढ़ पंचकोट – राम मंदिर के भग्नावशेष

उपेक्षित है पुरुलिया का गढ़ पंचकोट मंदिर

राजपूत वंश के दामोदर शेखर ने लगभग 90 सीई में पुरुलिया में सिंह देव वंश की स्थापना की। उन्होंने इस इलाके के पांच सामंती प्रमुखों को मिला दिया और इसलिए, इस स्थान को अंततः पंचकोट के रूप में जाना जाने लगा। यह पंचकोट से है, स्थानीय पंचेत बांध का नाम इसके नाम पर रखा गया है। ऐसा माना जाता है कि पंचकोट साम्राज्य एक बार दामोदर नदी के पानी में डूबा हुआ था। पंचकोट साम्राज्य लगभग १६वीं शताब्दी में बिष्णुपुर के मल्ल राजाओं के हाथों समाप्त हुआ और बाद में बरगी हमलों का सामना करना पड़ा। मल्ल के कब्जे के दौरान, पंचकोट राजा ने कई मंदिरों का निर्माण किया, जिनमें से पंचरत्न मंदिर, एक कृष्ण मंदिर और एक पत्थर की नक्काशीदार राम मंदिर उल्लेख के योग्य हैं। हालांकि अधिकांश मंदिर, महल और किला अब भग्नावशेष के रूप में है।
मिदनापुर में नाराजोल राजमहल का रामचंद्र मंदिर और रामनवमी

नाराजोल राजबाड़ी में होती है राम की आराधना

पुरातन बंगाल के क्षत्रियों. राजपरिवारों और सामंतों में राजा राम की पूजा की परम्परा रही। मिदनापुर और नदिया में सम्भवतः सबसे अधिक राम मंदिर हैां घाटाल से लगभग 25 किमी दूर नाराजोल राजमहल 600 साल पुराना है और यहाँ के राजमहल में रामचन्द्र और सीता देवी के मंदिर हैं। बंगाल की पारम्परि कविता का रूप राम मंच पर रामधुन और पाल नाटकों में दिखता है। 1819 में नाराजोल के राजा मोहनलाल खान ने अयोध्या की रामजन्मभूमि से 1 लाख रुपये खर्च करके पत्थर मँगवाये थे। कहा जाता है कि इस निःसंतान राजा को इसके बाद पुत्र प्राप्ति हुई थी। उन्होमने रामनवमी पर राम रथ यात्रा निकालनी भी शुरू की जो आज भी कई परिसरों में निकाली जाती है।
कोलकाता में मिली 6ठीं शताब्दी की रामायण

मालदा में भी हैं श्रीराम

एशियाटिक सोसाइटी कोलकाता के विद्वानों को उस समय खुशी हुई जब उन्हें कोलकाता में एक अल्पज्ञात संस्कृत पुस्तकालय में छिपी छठी शताब्दी की रामायण की एक नई पांडुलिपि मिली। 2015 में मिली रामायण का सबसे प्रसिद्ध संस्करण वाल्मीकि का है, सबसे पुराना संस्करण जिसमें सात खंड थे। नई पांडुलिपि में केवल पांच खंड हैं और तमिल कवि कम्बा द्वारा 12 वीं शताब्दी के गायन को प्रतिस्थापित करने की संभावना है, जिसे दूसरा सबसे पुराना संस्करण माना जाता है। विद्वानों ने नई पांडुलिपि में पाठ का विश्लेषण करते हुए कहानी की पंक्ति में कुछ स्पष्ट मोड़ देखे, हालांकि मुख्य पात्र राम, सीता और रावण एक ही हैं। टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, पांडुलिपि राम और सीता को मनुष्यों के रूप में अधिक चित्रित करती है और दोनों के अलगाव पर अधिक ध्यान केंद्रित करती है। यह संस्करण उस शाप से शुरू नहीं होता है जिसने दशरथ को अपने बेटे को वनवास भेजने के लिए मजबूर किया, इसके बजाय, यह एक श्राप से शुरू होता है जो देवी लक्ष्मी पर पड़ा था।

इसमें बालकांड को शामिल नहीं किया गया है जो राम के बचपन और उत्तरकांड पर केंद्रित है। नयी पांडुलिपि राम के वनवास से लौटने और उनके सिंहासन पर चढ़ने के साथ समाप्त होती है। संस्कृत के विद्वानों के अनुसार “यहां राम भगवान से ज्यादा मानवीय हैं, क्रोध और असफलता जैसी मूर्खताओं के साथ। विवाह के समय सीता और राम की उम्र और रावण द्वारा सीता का अपहरण किए जाने की तारीख जैसे कुछ दिलचस्प विवरण इस संस्करण में हैं।” , परिषद के अध्यक्ष और एशियाटिक सोसाइटी के महासचिव ने टाइम्स ऑफ इंडिया को बताया।
बंगाल के अधिकतर हिन्दू मंदिर आक्रमण और संरक्षण के अभाव में नष्ट हो गये हैं। मुस्लिम शासकों निमर्मता के साक्षी रहे हैं ये मंदिर और 17वीं शताब्दी के पहले के निर्मित मंदिरों को खोज निकालना कठिन है। हिन्दू धर्म से धर्मांतरित होने वाले मुसलमानों ने भी मंदिरों को निशाना बनाकर ही इस्लाम के प्रति वफादारी साबित करने की कोशिश की। आजादी के बाद भी बंगाल में कई राममंदिर बने हैं।
स्त्रोत साभारऑर्गनाइजर
विकिपीडिया
पुरुलिया जिले की वेबसाइट
टाइम्स ऑफ इंडिया
तस्वीरें – श्रीनारायणम.होम.ब्लॉग तथा गूगल

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