आयातित नहीं है, भारत की परम्परा में है आतिशबाजी

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(यह तमिलनाडु के तिरुवरूर स्थित त्यागराज मंदिर में 700 वर्ष पुरानी पेंटिंग है, जिसमें दीपावली के समय पटाखे चलाने का चित्रण किया गया है.)

भारतीय परम्परा में आतिशबाजी कोई नयी बात नहीं है। हमारी संस्कृति हर उत्सव पर आतिशबाजी होती रही है, इसके उल्लेख भी मिलते हैं। इंटरनेट पर जब इस बारे में हमने जानकारी प्राप्त करनी चाही तो फेसबुक पर मिथिलेश जी की वॉल पर ये दो लेख मिले। इसके बाद हमने इसे आधार बनाकर आगे की पड़ताल की। हम ये दोनों आलेख आपके सामने रख रहे हैं। यह दोनों  लेख और इसमें उपलब्ध चित्र भी मिले।

आलेख – 1 

मेकिंग इंडिया ऑनलाइन से हमने यह लेख लिया है जिसे यशार्क पांडेय ने लिखा है। चूँकि हमारा उद्देश्य इतिहास को आपके सामने रखना है इसलिए हम इस लेख के कुछ अंश ही ले रहे हैं। इसके साथ ही हम सभी लिंक आपको दे रहे हैं ताकि आप खुद यह सामग्री पढ़ सकें और उपयोगी जानकारी प्राप्त कर सकें। लेख के कुछ अंश इस प्रकार हैं – 

यह जर्मन इंडोलॉजिस्ट गुस्तव ओपोर्ट की पुस्तक का उद्धरण है जिसमें उन्होंने गनपाउडर के आविष्कार का श्रेय भारत को दिया है तथा चीन के दावे को नकारा है
पटाखे, पर्व, प्रदूषण और प्रोपैगैंडा: इतिहास, वर्तमान और भविष्य …..
भारत में पटाखों का इतिहास बहुत पुराना है. पुणे स्थित भंडारकर ओरिएंटल रिसर्च इंस्टिट्यूट के प्रो० परशुराम कृष्ण गोडे ने इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ कल्चर (बेंगलुरु) के ट्रांज़ेक्शन सं० 17 (1953) में एक लेख प्रकाशित किया था जिसमें उन्होंने प्राचीन भारत में आतिशबाजी के इतिहास का विवरण दिया है. प्रो० गोडे लिखते हैं कि सन 1443 में देवराय द्वितीय के शासनकाल में सुल्तान शाहरुख़ का एक दूत विजयनगर के दरबार में रहता था. इसने लिखा है कि रामनवमी के उत्सव पर उसने वहाँ आतिशबाजी देखी थी. ऐसे ही बहुत से उल्लेख मिलते हैं जो बताते हैं कि चौदहवीं, पंद्रहवीं शताब्दी में कश्मीर, उड़ीसा और गुजरात में न केवल उत्सव बल्कि विवाह समारोह आदि में भी आतिशबाजी होती थी. डॉ सत्यप्रकाश (डी०एस०सी०) अपनी पुस्तक ‘प्राचीन भारत में रसायन’ में उड़ीसा के गजपति प्रताप रुद्रदेव की पुस्तक कौतुक चिंतामणि को उद्धृत करते हुए लिखते हैं कि पन्द्रहवीं शताब्दी में राजा के दरबार में विभिन्न प्रकार के अग्निक्रीड़ायें की जाती थीं: कल्पवृक्ष बाण, चामर बाण, चन्द्रज्योति, चम्पा बाण, पुष्पवर्त्ति, छुछंदरी रस बाण, तीक्ष्ण नाल और रस बाण. ऐसे ही उल्लेख आकाशभैरवकल्प नामक पुस्तक में है जिसमें यह बताया गया है कि बांस के बने पिंजरों से अग्निबाण (राकेट कह सकते हैं) छोड़े जाते थे जो आकाश में फूटने के बाद मोरपंख का बना हुआ चँवर या आजकल के ‘अनार-पटाखा’ जैसी रंग-बिरंगी आतिशबाजी करते थे. प्रो० गोडे के अनुसार भारत में आतिशबाजी की कला चौदहवीं शताब्दी में चीन से आई किन्तु इस तथ्य को नकारा नहीं जा सकता कि रसायनों के प्रयोग से विस्फोट करने का ज्ञान भारतीयों को चौदहवीं शताब्दी के पहले से था क्योंकि प्रो० गोडे ने अपने लेख में तेरहवीं शताब्दी के फ़ारसी इतिहासकार शेख मुसलिदुद्दीन सादी का उल्लेख किया है जिसने अपनी रचना गुलिस्तान में एक स्थान पर लिखा था कि एक हिन्दू (अर्थात् तत्कालीन ‘गुलाम’) किसी से ‘नाफ्था’ फेंकना सीख रहा है. यह नाफ्था एक प्रकार का ज्वलनशील तरल पदार्थ है जिसे आज नाफ्थालीन कहा जाता है. इसे बोतल में भरकर चिंगारी लगाकर शत्रु पर फेंकने से शत्रु जल जाता है. शुक्रनीति में भी अग्निचूर्ण का उल्लेख है किन्तु शुक्रनीति का रचनाकाल निश्चित नहीं है. महत्वपूर्ण यह है कि प्रो० गोडे अपने लेख में आकाशभैरवकल्प पुस्तक को उद्धृत करते हुए दीपावली पर्व का उल्लेख भी करते हैं जिसमें राजा को रात्रि में बाणविद्या (अर्थात् आज के समय का राकेट) देखने के लिए आमंत्रित किया गया है.
ये दाराशिकोह की शादी का चित्र है

उपरोक्त ऐतिहासिक प्रमाणों से स्पष्ट है कि भारत में दीवाली पर पटाखे छुड़ाना कोई नयी परम्परा नहीं है. दीवाली पर पटाखे छुड़ाना कोई ‘धार्मिक कर्मकांड’ भी नहीं है बल्कि यह तो उत्सव मनाने का एक तरीका मात्र है. उत्सव हमारी संस्कृति का अभिन्न अंग इसलिए हैं क्योंकि वे हमारी जीवनशैली में रंग भरते हैं. भारत का हिन्दू अपने पर्व, उत्सव कैसे मनाये अथवा न मनाये इसपर प्रश्न करना न्यायालय के कार्यक्षेत्र में कैसे आता है यह समझना कठिन है. उच्चतम न्यायालय ने यह कहकर कि पटाखे छुड़ाने का उल्लेख किसी हिन्दू धार्मिक ग्रन्थ में नहीं लिखा है और उसके पश्चात उपजे जनमानस के आक्रोश से व्यथित होकर अपनी ही बात काट दी है. दरअसल न्यायालय ने ही हिंदुत्व को जीवनशैली कहकर परिभाषित किया था और आज जब इनके तुगलकी निर्णय पर जनता ने आक्रोश व्यक्त किया तो माननीयों को हिन्दू एक ‘रिलिजन’ समझ में आया. यक्ष प्रश्न यह है कि माननीय पटाखे छुड़ाने की परम्परा को धार्मिक ग्रंथों में खोज ही क्यों रहे थे? उन्हें तो इसके लिए ऐतिहासिक प्रमाणों में जाना चाहिए था.

यह औरंगजेब द्वारा 1665-67 में आतिशबाजी पर लगाई गई रोक का आज्ञापत्र है, बीकानेर संग्रहालय में सुरक्षित है)

आलेख – 2

देसी सीएनएन डॉट कॉम   पर 2017 में प्रकाशित यह लेख जरूर पढ़ना चाहिए। हमने इस लेख के साथ लिंक भी दिया है जिससे आप खुद इस वेबसाइट पर जाकर इसे तथा अन्य उपयोगी सामग्री को पढ़ें। यह आलेख मकरध्वज तिवारी द्वारा लिखा गया है, शुभजिता इसे सिर्फ आगे बढ़ा रही है और यह आलेख आपको पढ़वा रही है क्योंकि इस तरह के शोधपरक आलेख ही हमें सत्य से अवगत करवा सकते हैं और मिथ्यावादियों की साजिशों को खत्म कर सकते हैं। लेख और चित्र साभार शुभजिता आपके लिए प्रस्तुत कर रही है –

भारतीय संस्कृति में आतिशबाजी का इतिहास (तथ्य और चित्र)

(ये सारे चित्र वारेन हेस्टिंग्स के कृपापात्र सीताराम द्वारा बनाये गए है, ब्रिटिश आर्काइव में सुरक्षित हैं)

भारतीय संस्कृति में प्रत्येक आनन्द के उत्सव, त्योहार आदि में लगभग 3000 वर्षों से आतिशबाजी की परंपरा रही है. पटाखें मुख्यतः बारूद के चूर्ण से बनतें है, जिसका ज्ञान भारतीयों को बहुत पहले था, रसायन शास्त्र से संबंधित सर्वाधिक पुरानी पुस्तकें संस्कृत में ही मिलती हैं. इसी बारूद से गनपाउडर बनाया जाता है, महाभारत, रामायण कालीन अग्निबाण इसी का उदाहरण है. लगभग 2300 वर्ष पुरानें कौटिल्य के अर्थशास्त्र में अग्निचूर्ण के प्रयोग का वर्णन प्राप्त होता है, चीनी विद्वानों की पुस्तकों से यह ज्ञात होता है कि भारत में इस अग्निचूर्ण का प्रयोग सैन्य उद्देश्यों के अलावा उत्सवों में रंगीन रोशनी निकालने के लिए भी किया जाता था.भारत से प्राप्त इस विधा का उपयोग चीनियों ने कई प्रकार से किया उन्होंने इससे धीमी आवाज के पटाखे, शॉवर तथा रॉकेट आदि को बनाना सीखा तथा 16 वीं शताब्दी तक भारत एवं यूरोप को आतिशबाजी का निर्यात करने लगा. मध्यकालीन भारत में 1609 में आदिलशाह की शादी में 80 हजार रुपये की आतिशबाजी की गई थी, जबकि उसी समय 1687 में रोम के साथ अपने व्यापारी सम्बन्ध रखने वाले बैंगलोर को चिक्कादेवराय वाडियार ने 3 लाख रुपयों में खरीदा था, आप आदिलशाह द्वारा आतिशबाजी पर खर्च की गई रकम की कीमत का अंदाज लगा सकतें है. 1633 का दाराशिकोह की शादी का एक चित्र प्राप्त होता है जिसमें समारोह में की गई आतिशबाजी को दर्शाया गया है. 16-17 वीं शताब्दी के कई ऐसे चित्र मिलते है जिसमें दीवाली में की जा रही आतिशबाजी को दिखाया गया है. (सभी चित्र पोस्ट के साथ संलग्न हैं). औरंगजेब के शासनकाल में 1665 में दिवाली पर आतिशबाजी करने पर रोक लगाई गई, जिस आशय का पत्र बीकानेर संग्रहालय में सुरक्षित है

आतिशबाजी की परम्परा को दर्शाता एक अन्य चित्र

17-18वीं शताब्दी में भारत में आतिशबाजी का चलन तेजी से बढ़ा तथा यह उत्सव की शान बढ़ाने का एक साधन बन गया. 1815 में फतेहगढ़ को लॉर्ड मॉरिया के स्वागत में कुछ इस तरह की सजाए गए थे और जमकर आतिशबाजी की गई थी. 1815 में ही लखनऊ के नबाब के सम्मान में रंगबिरंगी आतिशबाजी की गई थी. आतिशबाजी की इस कला ने समाज में कई आतिशबाजों को स्थापित किया. लार्ड वारेन हेस्टिंग्स के कृपापात्र चित्रकार सीताराम ने अपने चित्रों में आतिशबाजी तथा विभिन उत्सवों और की जा रही चित्रकारी को दिखाया है. 19वीं सदी की शुरुआत में आतिशबाजी की बढ़ती मांग को देखते हुए दासगुप्ता ने कलकत्ता में भारत की पहली पटाखा फेक्ट्री डाली, जहां धीमी आवाज के पटाखें, लाइट फाउन्टेन, फुलझड़ी बनाई जाती थी, बाद में यह व्यवसाय तमिलनाडु के शिवकाशी में स्थापित हो गया. इस प्रकार यह प्रमाणित होता है कि भारत में आतिशबाजी की परम्परा आधुनिकता की देन नहीं है, बल्कि वर्षों पुरानी है.

कभी ऐसे सोचिए…क्या यह जरूरी है कि आतिशबाजी चीन से आयी होगी…चीन के बहुत से यात्री प्राचीन काल में भारत आते रहे हैं। क्या यह सम्भव नहीं है कि ह्वेनसांग और फाहियान ने या फिर उनकी तरह कोई यात्री भारत से आतिशबाजी की कला लेकर चीन गया और इसे बाद में अपना बताकर चीन ने सारी दुनिया में फैला दिया…आखिर गौतम बुद्ध भी तो भारत के ही हैं मगर आज उनकी पूजा चीन, जापान, बर्मा, जैसे देशों में होती है, अफगानिस्तान में उनकी प्रतिमाएं मिलती हैं तो क्या इसका मतलब यह है कि वह चीनी या जापानी हो गये…रही बात नेपाल की तो एक समय ऐसा था जब यह देश भारत से अलग नहीं था…सारी भौगोलिक सीमाएं आज की हैं जो पहले नहीं रही होंगी तो क्या यही बात हमारी धरोहरों पर लागू नहीं होती…सोचिएगा एक बार

(साभार – पहला आलेख अंश – मेकिंग इंडिया ऑनलाइन

सभी चित्र तथा आलेख –  2- देसी सीएनएनएन डॉट कॉम से)

 

 

 

 

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