इक दर्द!

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पूजा सिंह
मरना अब आसान है
मरने के लिए
पार नही करनी पड़ रही अब
उम्र की दहलीज ।
बस
होनी चाहिए व्यवस्था
बनना चाहिए माहौल
खड़े हैं कतार में लोग
निराश एक रोदन में!
जिस दिन
जिसकी ड्यूटी खत्म होगी
वे भी हो जाएंगे खत्म।
मायूसी बिखड़ी पड़ी है
चारो ओर बन रहा है
तमाशा सन्नाटे में
शहरों में जल रही है लाइट्स
हो गई है चकाचौंध
सिवाए उस घर के
जिसका दीया
अब बुझ गया था।
मैंने सुनी एक ख़बर
जिसमे सौ मजदूर
भूख से तड़प कर
मर चुके थे
जिसमे
डेढ़ साल की बच्ची
मर चुकी माँ के
सीने पर लोट रही थी।
मैंने देखी एक ख़बर
जिसमे
लाखों लावारिस लाशें
निकाली जा रहे थीं!!
और
देख पा रही हूँ उस घर को भी
जिसकी चौखट पर
यमदूत घंटियाँ बजा रहा है
वह जो कराह रहा है दर्द से
फिर भी कह रहा है छोड़ दो…..!
मैं जीना चाहता हूँ
रास्ते अभी खत्म नहीं हुए मेरे
वो भय जो साक्षात है
जो है प्रत्यक्ष  लगातार
वो  महज़ इक दर्द है!!

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