इतिहास के पन्नों में कहीं खो गयीं लेखनी की धनी चंपा दे भटियाणी

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प्रो. गीता दूबे

सभी सखियों को नमस्कार। सखियों, बहुत बार बड़ी और प्रतिष्ठित प्रतिभाओं के प्रकाश में कुछ प्रतिभाओं पर दुनिया की नजर‌ नहीं पड़ती और अगर पड़ती भी है तो प्रायः उंन पर सरसरी निगाह डालकर लोग आगे बढ़ जाते हैं। और जहाँ तक बात स्त्री प्रतिभाओं की है तो उनकी प्रतिभा तो घर- गृहस्थी के घेरे में बहुधा घुट कर रह जाती है। साथ ही अगर उनके पिता या पति बहुत अधिक प्रतिष्ठित या स्वनामधन्य हों तो भी स्त्री की रचनात्मकता और प्रतिभा को उस तरह से चिह्नित नहीं किया जाता। इसी सन्दर्भ में आज मैं बात कर रही हूँ, चंपा दे भटियाणी की जो पीथल नाम से प्रसिद्ध डिंगल और ब्रजभाषा के प्रख्यात कवि पृथ्वीराज राठौड़ की दूसरी पत्नी थीं। चंपादे जैसलमेर के रावल मालदेव की पौत्री और रावल हरराज की पुत्री थीं। रावल हरराज को साहित्य और कला से विशेष प्रेम था। राजस्थानी छंद शास्त्र के प्रसिद्ध ग्रंथ “पिंगल सिरोमणि” एवं श्रृंगार रस के काव्य “ढोला मारू री चौपाई के रचयिता जैन मुनि कुशललाभ उनके काव्य गुरु थे। ऐसे पिता के संरक्षण में पलने वाली बेटियों के ह्रदय में काव्य प्रेम का स्फुरण होना स्वाभाविक ही था।

रावल हरराज की बड़ी पुत्री गंगाकुंवर का विवाह बीकानेर के राजा राजसिंह तथा मंझली लीलादे का उनके छोटे भाई  पृथ्वीराज से हुआ था। लीलादे भी कविता करती थीं। लेकिन उनकी असामयिक मृत्यु के पश्चात जब शोक विह्वल हो पृथ्वीराज अपने स्वास्थ्य के प्रति लापरवाही बरतने लगे तो लीलादे से छोटी चंपादे का ब्याह पृथ्वी राज के साथ कर दिया गया। रानी चंपादे राजस्थानी और ब्रज भाषा में कविता लिखती थीं। हालांकि उनका कोई स्वतंत्र ग्रंथ तो नहीं मिलता लेकिन उनके द्वारा रचित मुक्तक अवश्य मिलते हैं जिन्हें पढ़कर उनकी प्रतिभा और रचनात्मकता का परिचय सहज ही मिल जाता है।  

वह अत्यंत रूपवती एवं बुद्धिमती स्त्री थीं और कठिन परिस्थितियों को अपनी बुद्धिमत्ता और विनोदप्रियता से सरस बनाने का हुनर भी जानती थीं। जब चंपादे पृथ्वीराज के जीवन में शामिल हुईं उस समय पृथ्वीराज खिन्न और निराश ही नहीं थे बल्कि वार्धक्य की ओर भी कदम बढ़ा रहे थे। एक दिन दर्पण में अपना प्रतिबिंब निहारते हुए उन्होंने अपना एक श्वेत केश तोड़ा तभी उन्हें चंपादे की मुस्कराती छवि दर्पण में दिखाई दी और उन्होंने अपने और चंपादे के बीच के उम्र के पार्थक्य को खेद के साथ स्वीकार करते हुए कहा-

“पीथल धोता आबियाँ, बहुली लग्गी खोड़।

पूरे जोवन मदमणी, अभी मूह मरोड़।।”

चंपादे ने इस पार्थक्य को अपनी सहृदयता और बुद्धि कौशल से किस तरह पाट दिया, यह दृष्टव्य है-

“प्यारी कहे पीथल सुनों, धोलां दिस मत जोय। 

नरां माहरां दिगम्बरां, पाकां हि रस होय।।

खेड़ज पक्का घोरियां, पंथज गधधां पाव।

नरां तुरंगा वन फ़लां, पक्कां पक्कां साव।।”

अर्थात खेती प्रौढ़ बैलों से और मार्ग की दूरी पके ऊँटों के पैरों से ही तय होती है। माना जाता है कि मर्द, घोड़े और वनफलों के पकने पर ही उनमें रस संचार होता है और स्वाद उत्पन्न होता है।

चंपादे की कविता में उनके ह्दय की गहन अनुभूतियों की अभिव्यक्ति बड़ी सघनता के साथ हुई है। हालांकि उनकी कविताओं के संकलन का कोई प्रयास नहीं हुआ है लेकिन यत्र तत्र प्राप्त उनके स्फुट छंदों में उनके जीवनानुभवों का निचोड़ मिलता है। उनके पति पृथ्वीराज राजा अकबर के दरबार में रहते थे। एक बार लंबी अवधि के उपरांत जब वे बीकानेर लौटे तो रानी चंपादे ने अपनी विरह वेदना के साथ- साथ विछोह के कारण ढलते यौवन को बड़ी मार्मिकता से निम्नलिखित कविता में पिरोया-

“बहु दीहां बल्ल्हो, आयो मंदिर आज। 

कंवल देख कुमलाइया, कहोस केहई काज।।

चुगै चुगावै चंच भरि, गए निलज्जे कग्ग।

काया पर दरियाव दिल, आइज बैठे बग्ग।।”

अर्थात केश रूपी काले कौवों की खूब देखभाल की लेकिन फिर भी वे उड़ ही गए और अब उनके स्थान पर शरीर रूपी सागर में श्वेत केश रूपी बक आ बैठे हैं, अर्थात युवावस्था तो बीत गयी और शरीर में वार्धक्य ने डेरा जमा लिया है।

ब्रजभाषा में लिखे गए चंपादे के कवित्त सहजता से प्राप्त नहीं होते जिससे यह स्पष्ट हो जाता है कि उनकी कविताओं को सहेजा नहीं गया। चंपादे की मृत्यु भी जल्दी ही हो गयी। वह भी पृथ्वी राज की पहली रानी की तरह पृथ्वी राज को अकेला छोड़ गयीं। पृथ्वीराज ने चंपादे की मृत्यु की मर्मांतक व्यथा में डूबकर कई दोहों की रचना की, जिनमें चंपादे के रूप लावण्य का सजीव चित्रण तो है ही, पृथ्वीराज का उनके प्रति अथाह प्रेम भी प्रकट हुआ है। उनमें से कुछ दोहे यहाँ प्रस्तुत हैं-

“चंपा पमला च्यारि, साम्हां दीजै सज्जणा।

हिंडोले गलिहारि, हंसते मुंहि हरिराजउत।।

चांपा चडीज वास,मौ मन मालाहर तणी। 

सैण सुगन्धि सांस, हियै आवै हरिराजउत ।।

चांपा चमकंनेह, दांतोई अनतै दामिणी । 

अहर अनै आभेह, होमि पड़ी हरिराजउत।।

हंसौ चीतै मानसर, चकवौ चीतै भांण ।

नितहु तुनै चीतखूं, भावै जांण म जाण ।।

चख रत्ते नख रतडे, दंसड़ा खड़ा खड़ देह । 

कहै पित्थ कल्याण रो, आरिख सिघ्घी अह ।।

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