इतिहास के पन्नों में सिमट रही मारवाड़ी गद्दियां

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कोलकाता । पश्चिम बंगाल के मिनी राजस्थान के नाम से मशहूर बड़ाबाजार की खास पहचान मारवाड़ी गद्दियां इतिहास के पन्नों में सिमट रही हैं। कोलकाता में निवासरत प्रवासी राजस्थानियों में होली, दिवाली जैसे त्यौहार हो या अन्य अवसर एक दूसरे के हर सुख-दुख में साथ रहकर सारी बातें यहां साझा होती है।
बड़ाबाजार के व्यापार जगत में अपनी अलग छवि संजोए मारवाड़ी गद्दियां आज अतीत का हिस्सा बनती जा रही हैं। ये गद्दियां साड़ी, होजियरी, सूटिंग, शर्टिंग से लेकर कपड़ों के थोक व्यवसाय का स्थान होती हैं। जहां काम करने के साथ रहने की निःशुल्क सुविधा है।
बड़ाबाजार की पहचान कही जाने वाली गद्दियों में बरसों पुरानी व्यवस्था आज भी चल रही है, लेकिन वर्तमान में इनकी संख्या हजारों से सिमट कर सैकड़ों में रह गई है। एक अनुमान के मुताबिक इन गद्दियों की संख्या आज लगभग 200 रह गई है। हर वक्त गुलजार रहने वाली बड़ाबाजार की मारवाड़ी गद्दियों में पहले की अपेक्षा काफी कम लोग रहते हैं। मालिक और कर्मचारियों के सामंजस्य से सैकड़ों बरस पुरानी इस व्यवस्था का निर्वहन अभी भी हो रहा है। पर कम। कपड़े के हब के रूप में विख्यात बड़ाबाजार गद्दी बाहुल्य क्षेत्र है।
आपसी तालमेल से शुरू गद्दी में रहने का सिलसिला
पहले जब लोग काम के सिलसिले में राजस्थान से कोलकाता आते थे तो नौकरी मिलने के बाद खाने की व्यवस्था राजस्थानी बासा में आसानी से हो जाती थी। लेकिन रहने की काफी असुविधा होती थी। वहीं मालिकों को रात में गद्दी की चिंता रहती थी। इसी बीच यह रास्ता निकला कि जो व्यक्ति गद्दी में अथवा उस गद्दी मालिक की खुदरा व्यापार की दुकान में काम करेगा वह उस गद्दी में रह सकता है। इसका लाभ मालिक और कर्मचारी दोनों को मिला। जहां प्रवासी कर्मचारियों को रहने की निशुल्क सुविधा मिल गई वहीं गद्दी के मालिक, गद्दी की सुरक्षा से भी आश्वस्त हो गए।
क्या है गद्दी?
गद्दी मालिकों की बाजार में खुदरा व्यवसाय की दुकानें होती हैं जिसका ज्यादातर माल गद्दियों में रखा जाता है। इन्हीं गद्दियों में थोक व्यापार होता है। इन गद्दियों में औसतन करोड़ों रुपये सालाना का व्यापार होता है। विभिन्न चीजों का व्यवसाय करने वाली इन गद्दियों में ज्यादातर ग्रामीण तथा उपनगरीय क्षेत्रों के व्यापारी थोक खरीददारी करने आते हैं।
बोले प्रवासी राजस्थान
कई वर्षों तक बड़ाबाजार की गद्दी में रहने वाले प्रवासी राजस्थानी लीलाधर शर्मा ने पत्रिका को बताया कि गद्दी में साथ रहने वाले एक दूसरे के भाई, ताऊ, चाचा होते हैं। उत्सव, त्यौहार या फिर कोई दुख-सुख, सबसे पहले आपस में साझा करते थे। साथ रहने वालों को एक दूसरे की पूरी जानकारी रहती थी।
उन्होंने बताया कि पहले इन गद्दियों में बड़ी संख्या में प्रवासी रहते थे लेकिन आज इनकी संख्या काफी कम हो गई है। इसका मुख्य कारण उन्होंने कहा कि ज्यादातर लोगों ने कोलकाता, हावड़ा या आसपास के लिलुआ, बेलूर, हिंदमोटर, रिसड़ा आदि उपनगरीय क्षेत्रों में घर लेकर परिवार बसा लिया और यहां रहना छोड़ दिया है।
यहां है गद्दियां
यहां पारख कोठी, सदासुख कटरा, कमेटी कोठी, बिलासराय कटरा जैसे कई वाणिज्यिक मकानों में पहली या उससे ऊपर मंजिल की गद्दियों में बड़ी संख्या में प्रवासी राजस्थानी के अलावा बिहार, उत्तरप्रदेश और ओडिशा के लोग रहते हैं। जो ज्यादातर इन्हीं गद्दी मालिकों के यहां काम करते हैं।
लॉकडाउन में सुनी पड़ गई थी गद्दियां
2020 में कोरोना के कारण लागू लॉकडाउन के दौरान बड़ी संख्या में प्रवासी लोगों के अपने प्रदेश लौट जाने से बड़ाबाजार की मशहूर गद्दियां सुनी पड़ गई थी। सन्नाटे की चादर में लिपटी ये गद्दियां बाजार खुलने पर वापस चहक उठी लेकिन कम होती गद्दियों की संख्या से यह प्रथा अब गाहे बगाहे सिमटती जा रही है।

(साभार – राजस्थान पत्रिका)

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