ए वीर सपूतों! तुम्हें सलाम अर्चना ने दी काव्यांजली

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कोलकाता ।  कोलकाता की प्रसिद्ध संस्था अर्चना द्वारा स्वरचित रचनाओं के द्वारा अॉन-लाइन काव्यांजली आयोजित की गई। विभिन्न विषयों पर कविता के विभिन्न रूपों में भी नये प्रयोग की कविताओं को सुनाया गया। मुक्तक, दोहा, सोरठा और मुकरियों- क्षणिकाओं के साथ कविताओं और गीतों के द्वारा काव्य संध्या में सभी सदस्यों ने अपनी रचनाएँ सुनाई।
संगीता चौधरी ने ए वीर सपूतों! तुम्हें सलाम कविता सुना कर विजय दिवस के अवसर पर सभी वीर सपूतों को श्रद्धांजलि अर्पित की गई । सुशीला चनानी, मृदुला कोठारी, हिम्मत चौरडिया, भारती मेहता(अहमदाबाद) , बनेचंद मालू, संगीता चौधरी, मीना दूगड़, शशि कंकानी, उषा श्राफ, इंदु चांडक और डॉ वसुंधरा मिश्र ने भाग लिया।
क्षणिकाएं-सुशीला चनानी ने क्षणिकाओं के साथ अपनी कविता और मुकरियांँ सुनाई उनकी पंक्तियाँ – हवा भी दीपक से कैसा रिश्ता निभाती है!/जलाती भी है बुझाती भी है, पायदान जैस विनम्र भी न बनो,पौंछने लगेंगे लोग पैरों की रजकण, चाटुकारिता की सीढ़ी चढ़ना चाहते हो, आसमाँ में घर बसाने,चाहते हो/कैसे अहमक हो चाहते हो बालू के घरौंदों तले रास रचाना! शशि कंकानी ने दिलों दिल की बात समझ ली /चुप रहकर, कुछ न कहकर /जो बात जुबां न कह सकीं वो बात समझ गयी थी नजर और बढ़ते रहे अपने लक्ष्य की और /निरंतर- गतिशील ,कलम की तरह भर खुशियों की स्याही बढ़े चले- आओ बढ़े चले, मीना दूगड़ – थम गई बरखा,छा गई हिम कणों की बहार, वनस्पति जगत में सजी ओस बूंदों की कतार। और खूंटी से टंगा कलैंडर हवा से फड़फड़ा रहा था/वर्ष का अंत जान विदाई का गम जता रहा था। उषा श्राफ -माँ ने बेटे को चूमा और रिश्तों की बगिया मुरझा न जाए कहीं। भारती मेहता रिश्ता हो तो हाइडरोजन आक्सीजन जैसा/मिलने पर अपना अहम् खो बनाते हैं शीतल, तृप्तिदायक जल ! हिम्मत चोरड़़िया – दोहा-सतत चले ये गोष्ठियाँ, बढ़े कलम की धार।/करे क्रांति ये अर्चना, रचे नया संसार।।मुक्त हरिगीतिका छंद में-जन्मे जहाँ पर बेटियाँ…/अन्याय का हो सामना…हाइकु-कूड़े का ढ़ेर/धरा के नन्हें फूल/रोटी खोजते।।, मृदुला कोठारी -हर रंग में रंग दे रहे खुशियों को तमाम उम्र/ मृदु हस्ताक्षर की तरह कागजों में दर्ज किए जा रहे हैं/सफेद कागज पर कलम के साथ/स्याही को बिखरते देखा है/दिल तो मेरा था पर गैरों को बसते देखा है। इंदु चांडक – गीत नींद से सबको जगाती है सुबह, कुं- जीवन जीने की कला बिरला जाने कोय, जो जाने हँसता रहे नहीं जाने सो रोय, कुं- किसके मन में क्या भरा कैसे जाने कोय, अन्तस में सब छिपा रहे मुख पर लिखा न होय, गीत – जीवन का संदेश लाती है सुबह/सूर्य का रथ खींच लाती है सुबह, बनेचंद मालू – मेरी रचना जो पढ़ी गई /मैं सोचता बहुत हूँ।/ सोचना मेरी आदत है।/यह भी सोचता हूँ/जे नहीं सोचता हूँ/उनको लानत है। वसुंधरा मिश्र – परिवर्तन होना चाहिए। सोच में परिवर्तन लाना होगा कविताएं सुनाई।इंदु चांडक ने ऑन-लाइन जूम तकनीक को संभाला तथा धन्यवाद ज्ञापन किया मृदुला कोठारी ने और संचालन किया डॉ वसुंधरा मिश्र ने ।

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