ऐ सखी सुन – कोरोना काल में सबसे ज्यादा परेशान तो महिलाएँ ही हुईं

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गीता दूबे

ऐ सखी सुन , समय बहुत खराब है और मौसम भी। आधे लोग बीमार हैं तो आधे बेईमान। अब बेईमानी भी तो एक तरह की बीमारी ही है और सखी यकीन मानो करोना से कुछ कम खतरनाक नहीं है, यह बीमारी। करोना के लिए तो फिर भी वैक्सीन की खोज चल रही है और अगले साल की तिमाही न सही छमाही तक तो न सही बाजार में पर खास -खास  लोगों के दरबार में तो पहुंच ही जाएगी। लेकिन बेईमानी का वैक्सीन भला कब बनेगा। जाने कब से हमारे राजनेता और बुद्धिजीवी इस लाइलाज़ बीमारी का इलाज ढूंढने में जी जान से लगे हुए हैं लेकिन इसका हाल तो यह है कि “दर्द बढ़ता ही गया ज्यों ज्यों दवा की।”

सुन सखी, अब यह सवाल तो तुम्हारे मन में जरूर आ रहा होगा कि इन दोनों विपदाओं से तो सारी दुनिया ही परेशान हैं वह स्त्री हो या पुरूष, तो मैं यह बात खास तौर पर सखियों अर्थात स्त्रियों को ही संबोधित करके क्यों कह रही हूं। तो सखी बात यह है कि आप लोग यह बात पूरी तरह से नहीं जानते कि करोना हो या बेईमानी, दोनों से सब से ज्यादा परेशान है, आधी आबादी। समझ में नहीं आया ना, तो सुनिए। पहले करोना की ही बात करें, फिलहाल सबसे ज्यादा उत्पात तो इसी ने मचा रखा है।

करोना काल में जो लॉकडाउन हुआ उसमें सबसे ज्यादा तकलीफ़ महिलाओं को हुई। बात अगर घरेलू महिलाओं की करें तो पहले घर के काम काज और परिवार की जिम्मेदारियां निभाने के बाद उन्हें थोड़ा सा वक्त अपने लिए भी मिल जाता था जिसमें वे अपने विभिन्न शौक पूरे कर सकती थीं, सहेलियों से गपिया सकती थीं ,सोशल मीडिया पर मुक्त विचरण कर सकती थीं या फिर ‘दूर के दर्शन’ करतीं अथवा दोपहर की नींद ही पूरी कर सकती थीं। लेकिन करोना के फलस्वरूप हुए इस लॉकडाउन ने उनका यह  स्पेस या  निजी कोना भी उनसे छीन लिया। एक तो घरेलू सहायिका की अनुपस्थिति में पूरे घर को संभालना दूजे चौबीसों घंटे घर पर बने रहने वाले पति और बच्चों की फरमाइशें ही नहीं पूरी करना बल्कि उनके अवसाद या चिड़चिड़ेपन को‌ भी झेलना। घर पर‌ रहकर पढ़ाई और दफ्तर का काम पूरी मुस्तैदी से संभालने वालों से सहयोग तो क्या ही मिलना था बल्कि उनकी वक्त -बेवक्त की फरमाइशों के लिए भी तैयार रहना जरूरी था। न जाने कितनी महिलाएँ इस दोहरी मार में अपना सुख चैन बिसार बैठीं। और बची खुची कसर पूरी कर दी बढ़ती हुई घरेलू हिंसा की घटनाओं ने। जी बिल्कुल, आंकड़े बताते हैं कि लॉकडाउन में घरेलू हिंसा की घटनाओं में बहुत ज्यादा बढ़ोत्तरी हुई है। आर्थिक पक्ष‌ और नौकरी से जुड़ी हुई तमाम चिंताओं ने पतियों का रक्तचाप बढ़ा दिया तो पतियों ने अपनी हताशा का विषाक्त कचरा अपनी पत्नियों पर उड़ेल दिया। हद तो तब हुई जब खेल भी खतरनाक बन गया ‌और उसकी परिणति भी हिंसा में हुई। एक छोटी सी घटना इस तथ्य को गहराई से व्याख्यायित करने के लिए काफी होगी। एक अखबार की रिपोर्ट के अनुसार, करोना काल में मन बहलाने और समय काटने के लिए पति-पत्नी लूडो खेल रहे थे और संयोग से पत्नी खेल- खेल में पति परमेश्वर से जीत गई। तो अपनी हार से झल्लाए -बौखलाए पति देवता ने पत्नी की जीत का उपहार, उसके  गालों पर तमाचा जड़ कर दिया। पत्नी की इतनी हिमाकत कि खेल में ही सही पति से बाजी मारी ले जाए। तो अब भुगतो परिणाम। यह छोटी सी घटना यह सिद्ध कर देती है कि तमाम बड़े बड़े अखबारी दावों के बावजूद स्त्रियों की स्थिति बहुत ज्यादा नहीं बदली है।

अब बात करें  कामकाजी महिलाओं की तो उन्हें इस बीमारी ने‌ बुरी तरह शारीरिक मानसिक रूप से त्रस्त किया है। “वर्क फार्म होम” और वर्क फॉर होम” के दो चक्की के पाटों में वह पिसकर रह गई। आर्थिक मंदी के इस दौर में नौकरी बचानी है तो घर पर रहते हुए भी अपना काम पूरे समर्पण के साथ करना है और घर तो हर स्त्री की पहली प्राथमिकता होती ही है, उसे भला कैसे बिखरने दे। इस तरह घर और बाहर में संतुलन साधने की कोशिश में वह खुद अपना शारीरिक मानसिक संतुलन खोने की कगार पर आ गई है।

तो सखी, अब तो यह समझ में आ ही गया होगा कि इस दौर में सबसे ज्यादा तकलीफ़ औरतों ने झेली, वह हाशिए के इस पार हों या उस पार की।

अब बात करें बेईमानी की तो औरत के साथ हमेशा से बेईमानी ही हुई है। पहले तो देश के बहुत से हिस्सों में उन्हें जन्म लेते ही मार दिया जाता था, कभी नमक चटाकर तो कभी खाट के पाए के नीचे दबाकर और अगर वे किसी तरह बच गईं तो हर पल सामाजिक पारिवारिक अंकुश के नीचे सहम- सहम कर सांस लेने को बाध्य हुईं या की गईं। फिर जरा भी अपनी परिधि का उल्लंघन किया तो सम्मान रक्षा के लिए क्रूरतापूर्ण ढंग से कत्ल कर दी गईं। लेकिन विज्ञान और तकनीक की उन्नति ने तो उनसे उनके जन्म लेने का अधिकार ही छीन लिया। जैसे ही पता लगता है कि माँ की कोख में पलने वाली संतान लड़की है वैसे ही उसकी साँसें हमेशा के लिए रोक दी जाती हैं।

इसके बावजूद अगर वह मरने से बच जाती है और धरती पर आने के बाद तो कदम -कदम पर उनके साथ बेईमानी होती है। बेटे के लिए अलग नियम और बेटी के लिए अलग। इस दोहरी नीति से त्रस्त होने के बावजूद अगर लड़- भिड़कर वह अपने दम पर एक मकाम हासिल कर भी लेती है तो समाज यहाँ भी उसकी सफलता पर तंज कसने से बाज नहीं आता कि उसने वह जगह अपनी योग्यता के बल पर नहीं देह के बल पर हासिल की है।

“यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः” का जाप करनेवाला हमारा समाज नारियों को सम्मान तो दूर की चीज है समान स्थान या आसन देने में कितनी ईमानदारी बरतता है इसे जानने के लिए दैनिक अखबारों की सुर्खियाँ ही काफी होंगी। नारी के प्रति होनेवाली बेईमानी की कथा लिखने बैठूं तो सारे जहां की स्याही भी कम पड़ेगी। कुछ बातें आप सब भी जानती हैं और कुछ जान जाएंगी। अतः आज की बात यहीं खत्म करती हूँ, सखी। आप सबको सावधान करने और कुछ नयी पुरानी बातें बताने के लिए फिर आऊंगी। फिलहाल, विदा लेती हूँ, सखी।

आप सब की सखी

गीता दूबे

 

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  1. ‘ए सखी सुन- कोरोना काल में सबसे ज़्यादा परेशान को महिलाएँ ही हुई’ शुभजिता में प्रकाशित गीता दूबे का तिलमिला देने वाला व्यंग्य ख़ंजर की तरह वार करता है। दोयम दर्जे की स्थिति की दोहरी मार को झेलती स्त्रियों का मानसिक, शारीरिक उत्पीड़न लॉकडाउन के दौरान स्त्रियों को मिलने वाली छोटी सी जगह पर भी घरेलू व्यवस्था किस तरह क़ाबिज़ हो गई, इस पक्ष को अपने छोटे से व्यंग्य लेख में अत्यंत तीखे अंदाज में गीता ने रेखांकित किया है। भाषा में कथ्य के अनुरूप धार और प्रवाह है।
    मध्यम वर्ग की स्त्रियाँ, चाहे वे गृहणियाँ हों या कामकाजी हों, उनकी ज़िंदगी लॉकडाउन के दर्म्यान सबसे ज़्यादा प्रभावित हुई है जिसका ज़िक्र करते हुए व्यवस्था में व्याप्त असमान बेईमानपूर्ण सलूकों से उभरे आक्रोश को गीता दूबे ने बड़े दमख़म के साथ व्यक्त किया है।

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