ऐ सखी सुन – परिवेश हो या पर्यावरण, सुन्दर बनाना होगा

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गीता दूबे

ऐ सखी सुन 5

सभी सखियों का मेरा नमस्कार। सखियों, त्यौहारों का सिलसिला अभी तक जारी है और दीपावली, भाई दूज के बाद अब छठ की तैयारी है जो बिहार का महापर्व माना जाता है। और अब तो यह पर्व बिहार की सीमा का अतिक्रमण कर पूरे देश ही नहीं दुनिया के कई हिस्सों में जोर शोर से मनाया जाता है। जहाँ- जहाँ बिहारी लोगों की बस्तियां आबाद हुईं वहाँ वहाँ उनके रीति रिवाज, खान -पान और‌ पर्व -संस्कृति ने भी अपनी पहचान कायम की। और इस तरह छठ की महिमा फैलती गई। तमाम भारतीय त्यौहारों की तरह यह भी  परिवार केन्द्रित त्यौहार है जिसमें निसंदेह स्त्रियों की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। हालांकि कहनेवाले कह ही सकते हैं कि इसमें पूरे परिवार की भूमिका रहती है लेकिन तमाम और पर्व त्यौई की ही भांति स्त्रियों के कंधे पर हमेशा की तरह कुछ अतिरिक्त भार पड़ता है जिसे वह खुशी -खुशी उठाती भी हैं वह चाहे घर की साफ सफाई करना हो, नियमों का निष्ठापूर्वक पालन करना हो या फिर कठिन उपवास करते हुए भी मीठे ठेकुए का प्रसाद‌ बनाना हो।‌ यह स्त्री की शक्ति ही है कि वह भूखे रहकर भी तमाम लोगों के लिए सुस्वादु भोजन या प्रसाद बनाना नहीं भूलती। और‌ मेरी प्यारी सखियों, आश्चर्य की बात कहें या चिंता की कि स्त्री की जिस शक्ति और वैशिष्ट्य के लिए उसकी सराहना होनी चाहिए वही उसके शोषण का कारण बन जाती है। समाज सदियों से स्त्री पूजा का छद्म रचते हुए उसकी सहनशक्ति की परीक्षा लेता रहता है। जब तक वह सहती है तब तक देवी और जैसे ही अपनी जुबान खोलकर किसी बात का विरोध करने का निर्णय लेती है रातों-रात कुलटा साबित कर दी जाती है। लेकिन इससे देवी पूजा की परंपरा कभी बाधित नहीं होती। वह ज्यों की त्यों वर्तमान है और उसका स्वरूप समय के साथ बदलता या नये रूप में ढलता संवरता रहता है। शायद यही कारण है कि भारतीय परंपरा में कोई भी त्यौहार देवताओं के साथ साथ देवियों को उसी अविभाज्य रूप में शामिल करता है जैसे किसी भी सहज स्वाभाविक परिवार में स्त्री पुरुष की समान भूमिका होती है। तकरीबन सभी देव अपनी- अपनी देवियों के साथ ही पूजित होते हैं, जैसे शिव पार्वती, राम सीता, विष्णु लक्ष्मी आदि। और कुछ देवियों यथा काली, दुर्गा, सरस्वती, लक्ष्मी आदि की अलग से पूजा का विधान भी है अर्थात देवियों का पलड़ा पूजा के‌ आसन पर किसी भी रूप में देवों से कम नहीं है। शायद इसी कारण लोक पर्वों में बहुत से देवताओं की पूजा भी प्रकारांतर‌ से देवी पूजा का रूप ले लेती है। 

हाँ सखियों, बिल्कुल सही समझा आपने। मैं यहाँ छठ पर्व की बात कर रही हूँ। है तो यह सूर्य की उपासना का पर्व जिसमें पहले ढलते हुए सूर्य की पूजा की जाती है और उसके बाद उगते हुए सूर्य की उपासना कर, व्रत का पारण अर्थात अन्नग्रहण किया जाता है। लेकिन लोक आस्था इस देव पूजा को किस तरह देवी पूजा में बदल देती है, इसका सुंदर उदाहरण यह पर्व है। व्रती या उपासक सूर्य की जय-जयकार करने के साथ साथ छठी मैया से वरदान भी माँगते हैं। दरअसल सूर्य अर्थात प्रकृति पूजा का यह सिलसिला मानव सभ्यता के आदिम काल से आरंभ हुआ और आज भी बदलते परिवेश और आधुनिकता की बयार के बावजूद जारी है। चूंकि हमारे समाज में बहुत सी देवियों का प्रभाव है, सकारात्मक और नकारू दोनों ही रूपों में, अर्थात सामान्य मनुष्य उनसे डरता भी है और‌ उनकी पूजा भी करता है शायद इसी वजह से सूर्योपासना का यह पर्व देवी पूजा के रूप में सहजता से ढल गया होगा। इसके पीछे के कारणों या मान्यताओं पर कभी और विस्तार से बात करूंगी। 

प्रकृति पूजा, देवी पूजा या लोक आस्था के इस व्रत की एक बड़ी विशेषता है कि इस में शारीरिक और मानसिक स्वच्छता को इतना अधिक महत्व दिया जाता है कि यह भय लोगों के मन में बना रहता है कि नियम भंग होने से छठी मैया नाराज हो जाएंगी और उनका क्रोध परिवार को नष्ट कर देगा। इसीलिए तमाम नियमों का पालन एक भयमिश्रित आस्था के साथ किया जाता है। समसामयिक परिस्थितियों में जहां करोना नामक वायरस ने हमारे देश ही नहीं पूरी दुनिया के शारीरिक मानसिक और आर्थिक स्वास्थ्य को संकट में डाल दिया है , तब हमें स्वच्छता का महत्व अनायास ही समझ में आ रहा है और‌ दीपावली तथा छठ जैसे लोक पर्वों का महत्व भी जिसमें साफ सफाई पर अत्याधिक महत्व दिया जाता है। लेकिन समस्या यह है कि हम अपने घरों का कचरा तो साफ करते हैं लेकिन सार्वजनिक स्थानों पर बेझिझक गंदगी बिखेरते हैं। छठ के पहले जिन घाटों को साफ सुथरा कर‌ चमका दिया जाता है वही घाट पूजा के समापन के बाद गंदगी के ढेरों से ढँक जाते हैं।

एक सवाल पूछना चाहती हूँ सखियों, क्या साफ सफाई की इस व्यवस्था को हम अपने रोजमर्रा के जीवन का अविभाज्य और स्वाभाविक हिस्सा नहीं बना सकते ? क्यों हम पर्व त्यौहारों पर ही साफ सफाई करें, क्यों न साफ सफाई को जीवन का मूलमंत्र बना लें। क्यों सिर्फ अपने घर की सफाई को ही महत्त्व न दें बल्कि सार्वजनिक स्थलों को भी साफ रखने की कोशिश करें। अब यह मत पूछना सखी कि मैं यह बात आप सखियों से ही क्यों कह रही हूं, तो आप ही बताइए का मैं किस से कहूं ? जिस तरह हर पर्व त्यौहार में हम औरतें कमर कस कर सफाई अभियान में लग जाती हैं, बच्चों को बात -बात पर साफ सुथरा रहने की हिदायत देती हैं, उसी तरह हमें परिवेश की स्वच्छता की जिम्मेदारी भी अपने मजबूत कंधों पर उठानी होगी। कब तक हम इस प्रतीक्षा में रहेंगे कि कोई दूसरा मसीहा, नेता या समाज सुधारक आएगा और समाज उसके पीछे-पीछे चल पड़ेगा। वह दौर समाप्त हो गया। अब हमें यह काम अपने ‌हाथों में लेना होगा और परिवार और समाज को एक दिशा देनी होगी।  तो आइए, आज साथ मिलकर यह शपथ लें कि परिवेश हो या पर्यावरण, घर हो या समाज, उसे स्वच्छ और सुंदर बनाने की जिम्मेदारी न केवल हम स्वयं उठाएंगे बल्कि औरों को भी इस राह पर चलना सिखाएंगे। फिलहाल विदा, अगली मुलाकात तक के लिए।

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