कठिनाइयों में साहस ही हमारा संबल और पाथेय होना चाहिए

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प्रो, गीता दूबे

सभी सखियों को नमस्कार। सखियों, आप सब से यह प्रार्थना है कि आप स्वयं भी स्वस्थ जीवनशैली अपनाएं और अपना और अपने परिवार वालों का ख्याल रखें। साथ ही शारीरिक स्वास्थ्य का ही नहीं मानसिक स्वास्थ्य का ध्यान भी रखें। भारत वर्ष को‌ वैसे तो आध्यात्म का केन्द्र स्थल माना जाता है और मन को साधने पर बहुत बल दिया जाता है लेकिन यहाँ मानसिक स्वास्थ्य पर‌ कम से कम बात की जाती है और अगर कोई व्यक्ति मानसिक रोग से ग्रस्त है तो उसक बारे में चर्चा करने से लोग बचते हैं। अगर किसी को थोड़ी बहुत मानसिक समस्या हो तो उसे पागल करार देकर हम अपने कर्त्तव्य का पालन कर लेते हैं। और समाज उन पागल करार दिए गए लोगों के साथ क्या सलूक करता है, यह सभी को‌ मालूम है। इसीलिए जरूरी है कि मन के स्वास्थ्य पर‌ भी हम उतना ही ध्यान दें जितना शरीर के स्वास्थ्य की परवाह करते हैं। किसी बड़ी मुश्किल, परेशानी या बीमारी के कारण बहुत बार हमारा मन इतना प्रभावित हो जाता है कि वह निराशा से हताशा की सीढियाँ उतरते हुए कब अवसाद के गर्त में डूब जाता है, हमें बहुधा इसका पता ही नहीं चलता। लेकिन हमारा समाज शरीर के बुखार आदि को तो बीमारी समझकर उसका इलाज करवाता है लेकिन मन के बुखार को टालता ही जाता है। जरूरत इस बात की है कि मन के रोग और विचलन का भी इलाज समय रहते  किया जाए तभी समाज का सर्वांगीण विकास संभव हो पाएगा। एक शोध के अनुसार भविष्य में मानसिक अवसाद सबसे बड़े रोग के रूप में उभर कर सामने आएगा। एक आंकड़े के अनुसार पिछले दस वर्ष वर्षों में मानसिक अवसाद के कारण आत्महत्या करने वालों की संख्या में काफी इजाफा हुआ है, इसीलिए जरूरी है कि समय रहते हम सचेत हो जाएं और इस रोग के लक्षणों पर अपनी कड़ी नजर रखें ताकि स्थिति के हाथ से बाहर निकलने के पहले ही उसका निदान किया जा सके। कहने को तो हम कह देते हैं कि “मन के सारे हार है मन के जीते जीत” लेकिन इस मन के विचलन और बिखराव को समझने या स्वीकारने से हम बचते हैं। एक समय में अगर ‌किसी में मानसिक विचलन के‌ लक्षण दिखाई देते थे तो लोग डॉक्टर की सलाह लेने की जगह सोखा- ओझा या पंडित -औलिया की शरण में जाते थे और झाड़ -फूंक के माध्यम से इसका इलाज ढूंढने की कोशिश करते थे। समय बदला और अब शहरों आदि में तो बच्चे, किशोर , युवा आदि की मदद के लिए मानसिक रोग विशेषज्ञ या काउन्सिलर की मदद लेने को गलत नहीं माना जाता लेकिन इसके बावजूद अभी भी लोग मानसिक रोगों और रोगियों के प्रति सहज नहीं हो पाएं हैं। इसी कारण मानसिक रोगी की स्थिति जब तक इतनी नहीं बिगड़ जाती कि लोगों को खुद ब खुद किसी रोगग्रस्त व्यक्ति को देखकर उसके रोग की गंभीरता का अंदाजा लग जाए या रोगी कुछ ऐसा कदम उठा ले कि उसके वापस लौटने की कोई गुंजाइश ही ना बचे, अक्सर लोग इसे छिपाने की कोशिश ही करते हैं।

सखियों, इस छिपाने- दबाने के फेर में ही मन का यह रोग गंभीर रूप धारण कर लेता है और तब हम चाहकर भी कुछ नहीं कर पाते इसीलिए पुनः अपनी बात दोहरा रही हूँ कि इसके प्रति जागरूक होने की आवश्यकता है। फिलहाल दुनिया के और देशों की देखा देखी भारत में भी मानसिक रोगों के प्रति जागरूकता बढ़ रही है और‌ इन रोगियों का मजाक उड़ाने की जगह उनके प्रति संवेदनशीलता प्रकट की जाने लगी है। लेकिन इसके प्रति समाज की हर परत के लोगों को सचेत करने की आवश्यकता है क्योंकि जब रोग की निशानदेही होगी तभी उसका इलाज भी संभव हो पाएगा। विशेषज्ञों की मानें तो दुनिया का हर चौथा व्यक्ति अपने जीवन -काल में कभी ना कभी मानसिक अवसाद के घेरे में अवश्य आता है। कुछ लोग अपनी हिम्मत और दोस्तों तथा परिवार वालों की मदद से इस चक्रव्यूह से बाहर निकल आते हैं तो कुछ को डॉक्टरी सहायता की आवश्यकता पड़ती है। अगर यह सहायता समय पर नहीं मिलती है तो स्थिति गंभीर हो जाती है। इसीलिए आम लोगों को इसके प्रति सचेत करने के लिए हर साल 10 अक्टूबर को वर्ल्ड मेंटल हेल्थ डे (World Mental Health day) मनाया जाता है। इस दिन मानसिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता फैलाने के लिए विभिन्न कार्यशालाओं, गोष्ठियों एवं कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है। इसके साथ ही एक और तथ्य की जानकारी आप के लिए आवश्यक है कि कुछ वर्षों पहले ही लोकसभा में “मेंटल हेल्थकेयर बिल-2016” पास हुआ, जो मानसिक बीमारियों से पीड़ित लोगों को सुरक्षा और इलाज का अधिकार देता है। यह कानून अपने आप में काफी प्रगतिशील और लाभप्रद है जो समाज में मानसिक रोगियों के अधिकारों को सुनिश्चित तो करता ही है। साथ ही इलाज के लिए करवाए जाने वाले बीमे में भी इसकी वजह से नयी धाराएं जुड़ीं जिससे मानसिक रोगियों को राहत मिलेगी। बिल के प्रावधानों के मुताबिक, अब मानसिक बीमारियों को भी चिकित्सा  बीमे में शामिल  किया जाएगा। कोई भी स्वस्थ व्यक्ति अपना नॉमिनी चुन सकता है, जो मानसिक तकलीफ़ की हालत में उसकी देखभाल करेगा।

सखियों, मनोविज्ञान भी शारीरिक रोगों के कारण मन की चोटों में ढूंढता है। मनोवैज्ञानिकों की राय में यह के अनुसार अगर कोई व्यक्ति किसी रोग विशेष से पीड़ित हैं तो उसका कारण उसकी मन की गहराई में ही छिपा हुआ रहता है और उस रोग का इलाज तभी संभव हो पाएगा जब मन में कोने में छिपे उस विषाणु की निशानदेही कर ली जाएगी। सुधा अरोड़ा की कहानी “उधड़ा हुआ स्वेटर” का एक पात्र रशियन लेखक चेखव जो कि पेशे से डॉक्टर थे, की बात को उदाहरण स्वरूप प्रस्तुत करते हुए इसी ओर संकेत करता है – “डॉक्टर (चेखव) थे ना! डायरिया के लिए कहते थे- योर स्टमक वीप्स फार यू…मन उदास और बेचैन होता है तो पेट सिम्पथी में रोने लगता है। ….अगर बहुत नेगेटिव फीलिंग्स एक दूसरे को ओवरटेक कर रही हों और आप उन्हें हैण्डल न कर पाएं तो एक्जीमा हो जाता है। आपका स्किन बता देता है कि रुको, इतना काम- क्रोध जरूरी नहीं।…और अंदर ही अंदर गुस्सा, नफ़रत दबाए चलो पाइल्स, अल्सर, ब्रेन स्ट्रोक न जाने क्या-क्या हो जाता है। सप्रेशन इज़ द रूट क़ाज़ आफ आल सिकनेस। एंग्री पाइल्स, एग्रेसिव अल्सर ! तो इलाज की जरूरत तो इसको है, इसको…”बूढ़े ने चलते -चलते दिमाग को दो उंगलियों से ठकठकाया।”

तो सखियों, इस बात को गंभीरता से लीजिए और अपने मन को स्वस्थ, प्रसन्न और अवसाद मुक्त रखने की कोशिश कीजिए। साथ ही अगर आपके घर -परिवार, पास- पड़ोस या परिचय के दायरे में कोई मानसिक रोगी हो तो कोशिश कीजिए कि उसे सही समय पर सही सलाह और उपचार मिल पाए। निराशा और हताशा के क्षण तो जीवन में आते ही हैं लेकिन उन्हें मन में घर न बनाने दीजिए। सकारात्मक संगीत, साहित्य और विचारों से अपने ओर अपने आस -पास के लोगों के मन को प्रकाशमान करने की कोशिश कीजिए। साथ ही नैराश्य की घड़ी में राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त की इन पंक्तियों से प्रेरणा ग्रहण करने की आवश्यकता है-

“करके विधि वाद न खेद करो

निज लक्ष्य निरन्तर भेद करो

बनता बस उद्‌यम ही विधि है

मिलती जिससे सुख की निधि है

समझो धिक् निष्क्रिय जीवन को

नर हो, न निराश करो मन को

कुछ काम करो, कुछ काम करो।”

इसके साथ ही, मुश्किलों को चुनौती देने की कला को सीखना भी आवश्यक है। मुश्किलें तो आएंगी ही लेकिन ह्रदय को साहस से भर कर उनका सामना करना जरूरी है। कठिन से कठिन परिस्थितियों के आगे समर्पण ना करनेवाला ही साहसी होता है और यह साहस ही हमारा संबल और पाथेय होना चाहिए। तभी तो हम शायर अमीर कज़लब़ाश की तरह सोच और कह पाएंगे-

“लोग जिस हाल में मरने की दुआ करते हैं 

मैं ने उस हाल में जीने की क़सम खाई है ।”

आज के लिए विदा सखियों। अपना और अपने अपनों का ध्यान रखिए। 

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