कन्हैया लाल सेठिया..रचनाकर्म पर कुछ बातें..भाग -2

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– डॉ. वसुंधरा मिश्र

गतांक से आगे

महाकवि सेठियाजी का काव्य’ दीप किरण’ – – -महाकवि सेठियाजी का संपूर्ण काव्य जीवन की चरम विरोधी धाराओं के बीच विराजित सत्य के अस्तित्व को ढूंढने की गूढ़तम अनुभूतियों की जय यात्रा है।
दीपकिरण का कवि चिरंतन का साधक है। इस काव्य संग्रह में 147 के लगभग कविताएं संग्रहित हैं। कवि ने स्वयं कहा है कि गो धूलि की बेला में प्रज्वलित इस दीपकिरण को अब पौ फटने की बेला से लेकर पथ पर चलने का उपक्रम हुआ है तो इसके उर में स्नेह है या नहीं, इसकी चिंता मैं क्यों करूँ? क्षितिज पर जब कि एक प्रभापूर्ण रक्त बिम्ब उदय हुआ ही चाहता है तब इस दीपकिरण के बांटे पड़े मिटते अंधेरे को ही इसका सुहाग क्यों न मान लूँ।
कवि की कोमल भावनाएं स्वतः ही प्रकृति प्रीतम से जुड़ी हुई हैं उसे किसका डर है – –
प्रात – सा प्रियतम सुंदर
फूंक सखी झकझोर
कहेगी मिल ले, क्या डर!(नव प्रबाल – सा रंग)
दीप की इन किरणों में सूर्य किरणों – सी प्रचंडता नहीं है, वे तो अनमोल हैं – –
रवि किरणों का ताप नहीं है,
चपला का उत्ताप नहीं है,
अर्ध – निशा का प्रिय – पथ- पंथी बता सकेगा मोल!
दीप की ये किरणें अनमोल।
छोटा सा दीप लेकिन उसकी कोमल किरणें उग्र नहीं शांत हैं जो हृदय को शान्ति प्रदान करती हैं।
‘फूल विहंसता शूल मौन है’ कविता में कवि कहता है – – –
फूल विहँसता शूल मौन है,
एक डाल के दोनों साथी,
दोनों को ही हवा झूलाती,
फूल झरेगा, शूल रहेगा, सत्य कौन है?
भूल कौन है?
एक ही पेड़ में रहने वाले फूल और शूल में फूल खिला हुआ होता है हंसता है लेकिन शूल अंत तक पेड़ में ही रहता है। फूल को पता है कि उसे झड़ जाना है फिर भी हँसी खुशी में अपना क्षणभंगुर जीवन बिताता है वहीं शूल कठोर और नीरस बनकर रहता है इसलिए सभी उससे दूर रहते हैं। वह अपने लिए ही जीता है दूसरों को तो कष्ट ही देता है।
सुख दुःख इस सृष्टि के दो भाग हैं जिनका वर्णन हमारे शास्त्रों में हुआ है।वेद, गीता , उपनिषद, पुराण आदि भारतीय काव्य के उत्स रहे हैं जो हिंदी के आदिकाल से लेकर आधुनिक काल तक किसी न किसी रूप में उसकी धारा में अंतर्निहित है। निर्गुण निराकार ब्रह्म के उपासकों और संतों ने अपने भीतर स्थित शक्तियों को पहचानने पर बल दिया है। भारतीय दर्शन का प्रभाव सेठिया जी की रचनाओं पर पड़ना स्वाभाविक है। उनका कहना था कि बिना दर्शन के कविता का मूल्य नहीं है। भारतीय दर्शन जीवन जीने की कला है।
दीपकिरण काव्य संग्रह की अधिकतर रचनाएँ दीप के विभिन्न रूपों को उजागर करती हैं और उसी के मिस जीवन दर्शन को विश्लेषित करती हैं – –
नीर भरी नदियाँ लहराते
सागर उनमें प्यास बुझाते
किंतु गगन की एक बूंद हित
चातक के नयनों में जल है (दीपकिरण, पृष्ठ 25)
कवि के लिए प्रकृति छांँह की तरह है – – –
‘छांँह – सी तुम, धूप सा मैं ‘कविता में वे कहते हैं – – – लहर सी तुम, फूप सा मैं
गीत सी तुम रूप सा मैं (दीपकिरण, पृष्ठ 26)
प्रकृति कवि की सखी है – – वे उसके सूखे हृदय में अपनी स्नेह की स्निग्धता भरना चाहते हैं –
ठहर सखी मैं दीप जला दूँ
शुष्क हृदय में स्नेह भरूँ मैं
फिर बाती को ज्वलित करूँ मैं
स्वयं तृषित हूँ तो इससे क्या
इन प्यासों की प्यास बुझा दूँ। (पृष्ठ 36)
कवि दीप के माध्यम से समाज के साधारण और निचले वर्ग के लोगों के लिए द्रवित है। धूप के प्रचंड रूप के सामने छोटे-छोटे दीपों की क्या बिसात है। कवि उनके जीवन में अपनी प्यास नहीं, उनकी प्यास को बुझाने के लिए उद्यत है। तभी तो वह कहता है – –
मैंने तो जलना ही सीखा (पृष्ठ 34)—
उजला दिन ढलता है – – – –
सूने नभ में एक सितारा
दिन का बन प्रतिरूप बिचारा
झाँक रहा है बिना दिवस के जग
कैसे चलता है? (पृष्ठ 37)
मिट्टी से बना दीप कितने संघर्षों को झेलता है।उसी तरह सागर की सीप की भी स्थिति है – – –
मैं मिट्टी का दीप
चिनगारी ही पी लेता हूँ
जल जलकर ही जी लेता हूँ
पर जब प्रिय आगम की बेला
एक फूंँक में पहुंँचा देते मुझको मरण समीप
मैं सागर की सीप
युग युग तल के तम में रोती
किंतु पीर जब बनती मोती
कर दो टूक कलेजा मेरा
एक चोट में पहुंँचा देते मुझको मरण समीप
मैं अधरों का गीत
शब्द शब्द गूंँथ गूँथ कर कोई
बड़े यत्न से लड़ी सँजोई
किंतु बहाना लेकर लय का
एक कम्प में पहुँचा देते मुझको मरण समीप।(पृष्ठ 40)

गरीब क्षुद्र और निम्न श्रेणी के लोग अपने अंँधेरों को दूर करने के लिए कई संघर्ष झेलते हैं और समाज को अपना बहुमूल्य योगदान देते हैं लेकिन उसका मोल उन्हें मरण समीप पहुंँचा कर दिया जाता है।
कवि ने ‘मैं तुम्हारे प्यार का आधार लेकर क्या करूँ’ , ‘देख घन के बीच उजली दामिनी की रेख’ , ‘ढल चली दिन की अवस्था हो गया दिन वृद्ध’ , ‘मौन सोई छाँह’ , ‘प्रीत की क्या रीत साथी’ , ‘सहसा दीप जला’ , ‘कितना विषम प्राण का सौदा’ , ‘विहग के लघु लघु कोमल पंख’ ,’ रात अंधेरी पथ पर चलता’ आदि दीप के लिए अनगिनत भावों से पूर्ण चित्रों का प्रयोग किया है। अपनी ‘सांस’ को तूली और,’ रंग जीवन ‘को मानते हुए कवि संपूर्ण चित्र के बनने का सपना देखता है – –
पूर्ण होगा चित्र जिस दिन
तूलिका रुक जाएगी फिर
तू चितेरा जो अचिर है
उस घड़ी बन जाएगा चिर
चाहता है और क्या तू
मोल इस श्रम का अकिंचन।
जड़ता और अचेतन मनुष्य को प्रेम का स्पर्श आकाश का विस्तार देता है – – रवीन्द्र नाथ की ये पंक्तियाँ स्मरण हो आईं। ‘ पारसमणि छुआओ प्राणे– ऐ जीवन धन्य करो’। कवि सेठियाजी की पंक्तियाँ – –
मधुरे मैं आकाश बन गया
मैं जड़ तेरे सरस परस से सहसा नया विकास बन गया। ऐसा ही अहसास दिलाती हैं।

फूलों को खिलते देख कवि को अच्छा लगता है लेकिन ‘सांझ’ होते ही वह गिर जाता है और शूल भी चुभ जाता है लेकिन वैसी स्थिति में भी वह दीप को जलते हुए देखता है।
‘मेघों की ढोलक की धुन पर’ कविता में वर्षा का बहुत सुंदर चित्रण है जहांँ मेघों की धुन और लय में बूंँदों का मंजीरा पहनकर विद्युत रूपी ‘पतुरिया’ की थिरकन देखते ही बनती। चाँद सितारे ऊँघते लगे लेकिन विरहिन प्रिय के आने इंतजार करते करते उसकी ‘अँगुरिया’ घिस गईं। पवन की’ कुटलाई’ भी इतनी तेजी से बढ़ गई थी कि प्रिय के दस्तक देने पर भी बंद ‘किंवरिया’ खुल न सकी।वर्षा में नायिका का नायक के लिए प्रतीक्षा करना रीति कालीन नायिकाओं की भी याद दिलाती है।(पृष्ठ 89)वर्षा के मानवीकरण का बहुत सूक्ष्म और सुंदर वर्णन है।
जयशंकर प्रसाद जी ने प्रकृति को एक नवयुवती के रूप में चित्रित किया है लेकिन राष्ट्र के हितों को ध्यान में रखते हुए देशवासियों को जागरण का संदेश भी देते हैं जो कवि की जिम्मेदारी को दर्शाता है।
‘बीती विभावरी जाग री, अंबर पनघट में डूबो रही तारा घट उषा नागरी’ जैसे अनेक उदाहरण मिलते हैं। जहाँ प्रकृति का मानवीकरण और राष्ट्र जागरण का संदेश है।

कवि सेठिया जी कविता में अपने मन की बात’ मुझे राह का शूल बना दो’ कविता में माखनलाल चतुर्वेदी की कविता का आभास होता है।पुष्प की अभिलाषा की पंक्तियाँ – मुझे तोड़ लेना वनमाली, उस पथ पर देना तुम फेंक, मातृभूमि पर शीश नवाने, जिस पथ जाएँ वीर अनेक’ कहते हैं।
सेठियाजी उस काल के कवि हैं जब राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त, माखनलाल चतुर्वेदी, रामधारी सिंह’ दिनकर’ आदि कवियों की रचनाएँ भारतवासियों को उद्वेलित कर रही थीं।
महादेवी वर्मा के’ मधुर – मधुर मेरे दीपक जल ‘की – सी एक कसक सेठिया जी की हर रचना में दिखाई पड़ता है। राष्ट्र के प्रति उनका अनवरत प्रेम शेष लोगों तक पहुंँचाने के लिए उद्यत है – – –
तुम मधुर गान, मैं वेणु विकल
हैं जिसके उर में भी छेद,
तुम प्रथम पाठ, मैं शेष पृष्ठ
अब रहा न जिसमें भेद, (पृष्ठ 111दीप)
वे कहते हैं मैं ऐसे हर व्यक्ति का गीत बनूँ, तुम गाओ। कवि उनके स्वरों का मादक मधु लेकर पतझर को वसंत में बदलना चाहता है।
‘काले बादलों की ओट लेकर छिपी हुई रात’ रो रही है। प्रकृति उनके दुख से दुखी है। (पृष्ठ 114,दीप )
‘तारों की बिखरी बस्ती में’ – जब वे कहते हैं कि पूनम को उस दिन देखा था /चेहरा था कैसा गोल भरा? पर, आज दूज को देख रहा /बस, दुबला पतला डरा डरा।
कवि चाँद को अपने से तुलना कर देखता है। कमजोर वर्ग हमेशा अपनी कमजोरी के कारण चिंताओं से घिरा हुआ होता है। (पृष्ठ 144दीप)’ झंझा के प्रबल झकोरे’ में चाँद सितारे डूबे हुए हैं और चपल विद्युत का करुण उजाला है। चित्रों का प्रयोग बहुत ही अलग उपमाओं से की है पृष्ठ 166दीप)
दीप किरण में ननद भाभी के रिश्तों और बेटी के रूपक से वर्षा का सुंदर चित्रण है जो संभवतः किसी कवि में नहीं मिलता – – -‘ नभ वर के घर में रोती
पीहर की सुधि में पगली(‘ पृष्ठ 178 दीप)
दीप जलता है। उसकी किरणों से वह अपने तिमिर को तिरोहित करना चाहता है – बहुत ही सुंदर पंक्तियां – – –
अपनी कोमल किरण आँज कर /मेरा तिमिर तिरोहित कर दो। नेह पिये अकुलाती प्रतिपल /मेरी सुघड़ सलोनी बाती, /आधी रात कटी आँखों में/कब से बैठी विरहा गाती, – – – मुझे मिले पाथेय प्रभा का
मैं प्रभात की बाँह पकड़ लूँ/—अपनी अरुण अंगुलियों से छू /मेरा शाप विमोचित कर दो!
दर्द, शून्य, ठोकर, कटुता,घृणा जितने अधिक मिलते हैं वह उतना ही ज्यादा खुशी का अनुभव करेगा। उसके लिए गरल पीना आसान है लेकिन उसको पचाना कठिन होता है।, प्यार को पाना कठिन क्या /है कठिन उसको निभाना (पृष्ठ 180) कवि जानता है कि इस असंगति से भरे संसार में संगति का शिवमय रूप संजोना होगा।पृष्ठ 184। अंत में, कवि का अटूट विश्वास है कि काल भाल पर चढ़ने वाले जग में यदा-कदा ही आते हैं। ‘क्षर से अक्षर बनने वाले होते कोई नर विरले ‘194-।
अपनी मन गंगा में अवगाहन करने वाला ही सहज मुक्ति की मुक्ता चुगता है 195, दीप। वे कहते हैं वही सत्य है जो अशेष है। अतः इसका अनुसंधान चलता रहता है। शूल, सुमन, दीप, प्रेम, पीड़ा, दिन, रात, मौन, विकल, आँसू, पतझर, अम्बुद, कोयल, चाँद, बादल, किरणें, अचल, प्रकाश, चमेली, नलिनियांँ, अंबिया, क्षितिज आदि प्रकृति के प्रतीकों के साथ कवि अपने भावों को अभिव्यक्ति का माध्यम बनाते हैं। दुखों से गुजर कर ही कवि ऐसे गीत गा सका।

क्रमशः

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