कफ़न भाग-2

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दीपा गुप्ता

जाड़े का समय था। सूरज जल्दी ही डूब गया। माधव को जब तक होश आया तब तक चारों ओर अंधकार छा गया। पक्षी भी अपने घर को लौट चुके थे। घीसू को अब भी बेहोश देख माधव घबराते हुए उसके चेहरे पर पानी की छीटें मारने लगा। घीसू आँखें खोलते ही बोला-क्यों चिल्ला रहा है? देख नही रहा मेरा सर दर्द के मारे फटा जा है ।
“दोनों ने पहली बार शराब को होंठो से जो लगाया था।”
उन्हें याद आया कि- वे तो कफन लेने आए थे। गांव वाले उनका इंतजार कर रहे होगे और बुधिया की लाश वैसे ही पड़ी होगीं।
माधव ने घीसू से पूछा- “जब सब पूछेंगे, एक तो इतना देर ऊपर से खाली हाथ तो हम क्या बोलोंगे”
“चिंता मत कर तू… वहां कोई न होगा हमसे सवाल-जवाब करने वाला।”
दोनों जब घर पहुंचे तो वहां न लोगों की भीड़ जमा थी और न ही बुधिया की लाश थी। काफी इंतजार के बाद दोनों बाप-बेटे न आए तो लोगों ने ही बुधिया की चिता को आग दे दिया।
“आखिर किसके पास इतना समय है जो अपना काम-धंधा छोड़छाड़ उन बेशर्मों के लिए अपना कीमती समय खराब करें।”
दोनों श्मशान घाट पहुंचे। दूर-दूर तक एक परिंदा तक नजर नही आ रहा था।माधव चिता को देखते हुए बोला -“ये हमें माफ करेगी ना।” इस बार घीसू भी मौन होकर आसमान की तरफ देखने लगा।
बुधिया की चिता अभी ठंडी भी नही हुई और उन्हें पेट की चिंता सताने लगी।

घीसू आसमान की ओर देखते हुए बोला-” मालूम होता है आजकल ऊपर वाला सिर्फ अमीरों का है गरीबों का नही।” यही तो थी बिचारी जिसे हमारी फिक्र थी। हमारा पेट पाला करती थी। उसे भी छीन लिया। आज के समय में लोग अपनो से मुंह मोड़ लेते है तो हमें कौन पूछेगा।
माधव ने कहा- “कफन में मिले रुपये में से कुछ पैसे बचे है और जो अनाज मिला था वो भी पड़ा होगा। उससे कुछ दिन का गुजारा तो हो ही जाएगा पर उसके बाद का ….?”
जब मेरी औरत मरी थी,तो तू मेरे पास था इसलिए मैंने दूसरे ब्याह का सोचा नही। तेरे पास तो कोई नही है। मेरी भी उम्र हो चली है.. क्या पता कब मेरा भी बुलावा आ जाए।अकेले पहाड़ जैसे जिंदगी कैसे काटेगा। तू दूसरा ब्याह कर ले, उसके बाद मुझे कुछ हो भी गया तो मैं और बुधिया स्वर्ग में आराम से तो रहेंगे।
“शादी हो गई तो वो भी कोई न कोई काम करके दो जून की रोटी का इंतजाम कर ही लेगीं”- सोचकर माधव ब्याह के लिए हाँ बोल देता है।

नयी सुबह के साथ घीसू माधव के लिए लड़की ढूंढने के काम में लग गया। भला उनके विचित्र जीवन से कौन परिचित न था। घीसू जहां-जहां जाता सब रिश्ते के लिए मना कर देते और बोलते- पागल हो गया है ..जो अपनी बेटी की शादी तेरे माधव से करवाएंगे।
“सही भी था। इन बेगैरतों के घर कौन अपनी बेटी देना चाहेगा। इनके घर बेटी देना मतलब जीते-जी नर्क में झोंकने के समान।”
माधव‌ घीसू से बोला-अब तुम लड़की देखना बंद करो। कोई भी ब्याह के लिए हाँ नही बोलने वाला है इसलिए कुछ और सोचो क्योंकि कुत्तों जैसी मेहनत हमसे होने से रही।
अचानक घीसू को अपने एक दोस्त की याद आती है। तुम्हारा कोई दोस्त भी है। आजतक तो देखा नही। हाँ, और कभी हम बहुत अच्छे दोस्त हुआ करते थे। सुना है ना कि-“जब मुसीबत आती है तो परछाई भी साथ छोड़ देती है फिर वो तो दोस्त ही था।”वो तो ठीक है पर जिसने इतने सालों में कभी तुमसे मिलने की कोशिश नही की वो भला अपनी बेटी की शादी मुझसे क्यों करवाएगा। क्योंकि लोगों से सुना है उसकी लड़की के लिए रिश्ते तो बहुत आए पर बात नही बनी। उसका रंग थोड़ा काला है इसलिए सबने ना बोल दिया।
दूसरे ही पल दोनों वहां पहुंच गए। घीसू को देखते ही उसका दोस्त सोचने लगा- “ये मुसीबत कहां से मेरे घर आ गए।” सब राम कहानी सुना कर घीसू ने सीधा माधव के लिए धनिया का हाथ मांग लिया। पुराना दोस्त होने के कारण दोनों बाप-बेटे के आदतों से भलीभाँति परिचित था। इसलिए सबकी तरह वो भी अपनी बेटी की शादी माधव से नही कराना चाहता था। पर लोगों के ताने जो धनिया का जना हराम कर रहे थे उसे याद आ गए और मजबूरी में शादी के लिए हाँ बोल दिया। हाँ सुनते ही घीसू ने चट मंगनी पट ब्याह करवा दिया और वहाँ से धनिया को अपने संग ही लेकर लौटे।
धनिया को माधव के साथ देख लोग बाते करने लगे- “एक को गए अभी पांच दिन भी न हुआ और दूसरी बुधिया आ भी गई।”
धनिया अपने संग ज्यादा कुछ तो नही बस दो रुपये और कुछ अनाज लेकर आयी। जिसे देखते ही माधव बोला-“लगता है अब लकड़ी काटने की भी मेहनत नही करनी होगी।”
कुछ दिनों के पश्चात, धनिया माधव से कहती है- सुनते हो जी! घर में अन्न का एक दाना तक नही है। तो, मुझे क्यों सुना रही है। जा अपने बाप के घर…जैसे पिछली बार रुपये…जैसे पिछली बार रुपये और अनाज लेकर आयी थी वैसे अब भी ले आ। कैसी बात कर रहे हो जी…तुम्हारे होते हुए बाबा के सामने हाथ फैलाऊं! उनसे माँग कर तुम्हारा घर चलाऊंगी तो तुम्हें और तम्हारे पिता को शर्म न आएगी।
शर्म किस बात की…चोरी करके खाने से तो मांग कर खाना अच्छा है। तू जिस लाज-शर्म की बात कर रही है वो तो हम कब का पानी में घोल कर पी लिए है। अगर तुझे मांगने में इतनी दिक्कत है तो तू भी जाकर पिसाई या घास छीलने का काम ढूंढ ले।
धनिया को घीसू-माधव के कामचोर होने की खबर तो थी पर पति के मुँह से ऐसी बातें सुनकर सोचने लगी- “पिताजी ने मुझे किस गलती की इतनी बड़ी सजा दी।”
दो दिन निकल गए पर घीसू-माधव झोपड़े से हिले तक नही। अंत में हारकर धनिया को ही काम की तलाश में निकलना पड़ा। और धनिया भी खाना बनाने का काम कर उन दोनों का पेट पालने लगी।
“अपने पिता के घर कितने आराम से थी। हाँ, रोज लोगों के ताने सुनने पड़ते थे पर दो वक़्त का खाना और तन ढकने को कपड़े तो मिलते थे।यहां तो कभी -कभी सिर्फ आँसुओं से ही पेट भरना पड़ता है।”
अचानक तबियत खराब होने पर पता चला कि धनिया माँ बनने वाली है पर इस बात ने उसकी चिंता और बढ़ा दी। यहां एक वक़्त का पेट पालना भी मुश्किल है…इसमें बच्चे के लिए दुध,तेल…इत्यादि का कहां से इन्तजाम करुँगी। बुधिया ने दोनों बाप-बेटे को आलसी बनाया था ही धनिया के आने से वो और भी अधिक आरामतलब हो गए। फिर भी धनिया ने प्रयास किया उन्हें किसी तरह काम करने को मनाने का पर कोई लाभ न हुआ।
“प्रसव-पीड़ा से तड़पती बुधिया की चीखें जब उन दोनों की आत्मा को न छू सकी तो बच्चा आने की खबर क्या बदल देता।”
माधव धनिया से बोला-” किसने कहा कि काम करने से ही बच्चे पल सकते है। क्या मैं बड़ा नही हुआ..तब भी हमारी हालत ऐसी ही थी जैसी अभी है। जैसे मैं पला वैसे वो भी पल जाएगा।”
जिन दिनों गर्भवती महिलाओं को उठने-बैठने में मुश्किलें होती है। स्नेह, देखभाल की आवश्यकता होती है…उस स्थिति में भी धनिया को काम करना पड़ रहा था। काम करते हुए उसे प्रसव-पीड़ा आरम्भ हो गयी और उसने एक कुपोषित लड़के को जन्म दिया। जिसका नाम हरिया रखा।
बेटे को गोद में लेते ही वर्षों बाद या यूं कहे पहली बार माधव के मन में सहानुभूति का अंकुरण तो फुटा पर अब भी मेहनत करने को तैयार न हुआ।

हरिया के आने से माधव को अनोखा एवं पसंदीदा काम मिल गया जिसके लिए मेहनत बिल्कुल भी नही करनी पड़ती थी। बस, हरिया को रुलाता और लोगों के सामने कर अपना हाथ फैलाता… लोग सहानुभूति के नाम पर कुछ न कुछ दे ही देते।माधव हंसते हुए बोला-“ये तो बहुत बढ़िया व्यापार है… बच्चे को आगे करो और पैसा कमाओं।”
यू ही छः वर्ष निकल गए और आज भी माधव हरिया के जरिये लोगों को ठगता। अब भी उनकी स्थिति वैसी की वैसी थी। बस, हरिया के जरिये एक वक़्त के खाने का इतंजाम हो ही जाता था।
एक दिन पंडित जी ने गांव में भंडारा रखवाया। जिसमें सभी लोग आमंत्रित थे। घीसू का भी परिवार जल्दी से पहुंच गया।
माधव बोला- ‘चलो! आज भंडारा के बहाने पेट भर अच्छा खाना तो मिलेगा। धनिया आते समय थोड़ा खाना बंधवा लेना…क्या पता फिर कब नसीब हो ये छप्पन भोग।”
हरिया पहली बार इतने सारे स्वादिष्ट पदार्थों को देखते हुए बोला-” पंडित जी हमेशा भंडारा क्यों नही करवाते है। रोजाना ऐसा खाना क्यों नही मिलता।” आपलोगों ने तो कई बार ऐसा भोजन किया होगा न।
माधव बोला- कई बार तो नही पर एक बार जरुर खाया है…वो भी तेरी बड़ी मां की ही बदौलत। जब तक थी तबतक तो हमारा पेट पाला ही मरी भी तो खूब खिला-पिलाकर। कफन के लिए मिले रुपये से न केवल पेट भर करके खाया बल्कि पहली बार किसी को दान देने का भी सुख भोगा था।
माधव घीसू से बोला- “सब कहाँ से कहाँ चले गए और हम अब भी वैसे के वैसे ही है।”
क्या हो गया माधव…. इसके पहले तो कभी तुझे इतनी गहरी सोच में देखा नही।
हरिया की उसके दोस्तों के संग लड़ाई हो गई तब से ही मैं परेशान हूँ। उसका दोस्त है ना मुरली… उसके बाप ने उसे कोई खिलौना दिलाया है जिसे दिखा कर हमारे हरिया को खूब चिढ़ा रहा था और बोल रहा था कि- जब इससे खेल कर मेरा मन भर जाएगा तब तू ले लियो क्योंकि तेरे बापू तो कभी तुझे खिलौना दिला नही सकते। हरिया की वो उदासी बहोत चुभ रही है। भूल ही नही पा रहा हूं। कैसा पिता हूं ना मैं… न अपने बेटे को पेट भर भोजन दे सकता हूं और न ही खिलौने..।
इतने सालों में जो कोई न कर सका वो बेटे की उदासी और आंसू ने पल भर में कर दिया। सबेरा होते ही माधव बिना किसी को कुछ बताएं काम के तलाश में निकल गया। शाम हो गई पर कहीं काम न मिला। सब यह कहकर मजाक उड़ाते कि – “देखो भाईयों! कौन काम करने आया है।अब ये कामचोर काम करेगा।”
थक हार के माधव जमींदार के पास गया। सरकार! मुझे काम चहिए पर कोई काम पर नही रख रहा।अब आपका ही सहारा है।
इतने समय से किसी को दिखाई तक न दिया और आज काम मांगने आया है। तेरे को काम देना मतलब बैठे-बैठे अपना नुकसान करवाना।
ऐसे मत बोलिए सरकार… आप एक बार काम पर रखकर देखिए तो सही। मैं पूरी लगन के साथ काम करुंगा और समय पर भी आऊंगा।
ठीक है तो कल से आ जाना पर समय से वरना तेरी कोई जरुरत नही है ।
सबेरा होते ही माधव खेत में पहुंच गया और काम करने लगा। उसे इस तरह काम करता देख लोग बोलने लगे- अरे! ये माधव ही है ना…इसको क्या हो गया है। कल तक तो ऐसे काम से भागता था जैसे हिरण शेर को देख कर भागती है और आज ये इतनी लगन से काम कर रहा है। यह चमत्कार कैसे हो गया…!
माधव लोगों की बातों को अनसुना कर इस बात से अंजान कि यह खेत कभी घीसू का ही हुआ करता था…वो रात-दिन अपने बेटे के लिए पूरे मन से मेहनत करने लगा।
कुछ दिनों बाद माधव जमींदार साहब के आया और बोलने लगा- “साहब! थोड़े पैसे की मदद हो जाती तो बहुत उपकार होता।” जमींदार माधव से बोला- तुझे और पैसे उधार चाहिए! अब तो तेरी औरत भी खेत में तेरा हाथ बंटाती है फिर भी पैसे मांग रहा है…
साहब! अपने बेटे को पढ़ना चाहता हूँ। चाहता हूं हरिया पढ़-लिख कर बड़ा साहब बने और हमारा नाम सुधारें। उसके दाख़िला के लिए पैसे की जरूरत है। साहब! उधार समझकर दे दो, मेरे महीने में से कांट लीजिएगा। जमींदार साहब उसे 10 रुपये  लाकर दे देता है।
रूपया मिलते ही माधव सरकारी स्कूल में जाकर हरिया का दाखिला करवा देता है। शाम को घर लौटते हुए हरिया के लिए नये कपड़े और किताबें लाता है। और अपने बेटे के सर पर हाथ फिराते हुए बोला- कल से अपना हरिया भी सबके साथ स्कूल जाएगा। हरिया की खुशी देख माधव को आज एक अलग ही सुकून मिलता है। हरिया माधव से अपने नये-नये कपड़े और किताबें लेकर अपने दोस्तों को दिखाने भाग जाता है।
उनके हालत आज भी बाकी लोगों की तरह बहुत अच्छे तो नहीं थे पर अब वे पहले जैसे फटेहाल भी नहीं थे। उनकी जिंदगी की गाड़ी पटरी पर आ गई थी और धीमी गति के साथ आगे बढ़ रही है।

(दीपा शुभ सृजन युवा की सदस्य हैं और इनकी कहानियाँ कई जगह प्रकाशित हो चुकी हैं और यह कहानी पाठ भी कई मंचों पर करती रही हैं)

(वीडियो सौजन्य – हिन्दी का आंगन)

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