कला और हस्तशिल्प के जरिए सरस मेले में जुड़ा भारत

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भारत जोड़ता है और भारत जुड़ता है अपनी हर गली से लेकर अपनी कला, हस्तशिल्प, इतिहास समेत कई ऐसी चीजों से, जिनको देखकर हमें अपने देश पर गर्व होता है। शुभजिता इन छोटी – छोटी चीजों और बातों, किस्सों से लेकर शख्सियत को आपके सामने लायी है जिनको देखकर आप भी कह उठेंगे – मेरी जान हिन्दुस्तान।
आप हमें वीडियो या आलेख भेज सकते हैं मगर मेरी जान हिन्दुस्तान आपको वीडियो के अन्त में कहना होगा और कुछ खबर या स्टोरी भेजते हैं तो भी इसको जोड़ना होगा। हम अपनी इस मुहिम में युवा साथियों को लेकर चल रहे हैं।
इस बार हमारे साथ थीं दीपा ओझा। दीपा टीएचके जैन कॉलेज की छात्रा हैं। कोलकाता में हाल ही में आयोजित सरस मेला की रिपोर्टिंग उन्होंने हमारे साथ की। शुभजिता युवा सृजन प्रोत्साहन योजना के तहत शुभजिता प्रतिनिधि के रूप में दीपा ने सरस मेला कवर किया…ये स्टोरी उनकी ही कलम से निकली है

कला और हस्तशिल्प के जरिए सरस में मेले में जुड़ा भारत

– दीपा ओझा
कोलकाता में सरस मेला 2020, सेंट्रल पार्क के विधान सभा में लगा था । यह मेला कई सालों से लगाया जाता रहा है, इस साल भी यह मेला बेहद खूबसूरत तरीके से लगाया गया और भारत के कई राज्यों से कलाकार और शिल्पी यहाँ आये थे। यहाँ हस्तशिल्प के नायाब नमूने हमें देखने को मिले । आइए दिखाते हैं आपको सरस मेला –


लकड़ी पर उकेरी गयी अद्भुत कलाकृतियाँ
सरस मेला में सबसे पहले हमारी मुलाकात हुई आंध्रप्रदेश से आये कारीगर से जो लकड़ियों से सजावटी कलाकृतियाँ बनाते हैं और साथ ही बड़ी-बड़ी मूर्तियां भी बनाते हैं। उन्होंने हमें बताया कि उन्होंने यह हुनर अपने दादा जी और पिता जी से सीखा है साथ ही वे ये कार्य बचपन से ही अपने परिवारजनों के साथ करते आये हैं और यह कार्य उनके परिवार में पिछले 100 वर्षों से किया जा रहा है। अपनी कला के विषय में बताते हुए उन्होंने हमें बताया कि लकड़ी की ज़्यादातर वस्तुएं और मूर्तियां वे नीम की लकड़ियों से बनते हैं जिससे कि वे जल्दी खराब न हो।

बंगाल का पट्ट चित्र
इसके बाद हम मिले पूर्वी मिदनापुर से आई महिलाओं से हम मिले जो बंगाल का पट्ट चित्र लेकर आयी थीं। कालीघाट पट्ट चित्र पश्चिम बंगाल की पारम्परिक कला है और इसमें आपको बंगाल की संस्कृति भी दिखती है। इन चित्रों को बनाने के लिए प्राकृतिक रंग ही उपयोग में लाये जाते हैं। इस महिला ने अपनी चित्रकारी हाथ से बने कागज पर, केतलियों,कांच के गिलास पर, टीशर्ट्स पर, और साड़ियों पर भी प्रदर्शित की थी। यह उनके रोज़गार का माध्यम बना है साथ ही उन्होंने यह भी बताया कि सरकार इसमे उनको पूर्ण सहयोग देती है।


बोम्मोलता – कठपुतली कला की धरोहर
इसके पश्चात हम पहुंचे आंध्र प्रदेश के बोम्मोलता के स्टॉल पर , जो पुश्तों से कलाकृतियों के निर्माण का कार्य कर रहे हैं, यह कार्य इनके लिए पारंपरिक है । इनके परिवार को उनके कला के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिल चुका है। बोम्मोलता दरअसल चमड़े पर बनायी गयी कलाकृतिय़ाँ हैं जो प्राचीन समय में कठपुतली के खेल में इस्तेमाल की जाती थीं। इन पर किया गया बारीक काम कलाकार के धैर्य को दिखाता है। अब इनसे सजावटी सामान बनाये जाते हैं और इनकी भारी माँग भी है।


राजस्थान की जूतियाँ
राजस्थान में जितने रंग हैं, उतने ही रंग हमें राजस्थान के स्टॉल पर मिले जहाँ जूतियों पर चटकीले रंग और कढ़ाई दिखी। इन पर हाथ का काम था और जूतियाँ ऐसी कि इनको हर कोई खरीदना चाहेगा।

झारखंड के लोहरदगा में बनी दरियाँ

पेन कलाकारी
यह भी आन्ध्र प्रदेश में ही बनायी जाती है। दूर से देखने पर आप इसे मधुबनी चित्रशैली समझ सकते हैं मगर वास्तविकता में यह बिलकुल अलग है। इस चित्रशैली में कपड़े को दूध और घी में डुबोने के बाद सुखाया जाता है। इसके बाद 6 माह से भिगोकर रखे गये लोहे के चूर्ण से बनी स्याही से कलमकारी की जाती है। इसमें जो रंग इस्तेमाल किये जाते हैं. वे फूलों और फलों जैसी प्राकृतिक चीजों से बनते हैं।

मधुबनी
बगैर मधुबनी चित्रशैली के कोई भी हस्तशिल्प मेला अधूरा सा लगता है तो बहुत खोजने के बाद हमें बिहार का स्टॉल मिला। यहाँ हमें प्राकृतिक रंगों के इस्तेमाल से तैयार की गयी साड़ियाँ, दुप्पटे और सूटपीस मिले। यहाँ पर भागलपुरी टसर भी देखने को मिला।
इसके अतिरिक्त हमें उत्तर 24 परगना के बेंत का काम दिखा। फूड स्टॉल पर कई तरह के व्यंजन दिखे मगर एक आलेख में सबको समेटना सम्भव नहीं है। कला और शिल्प का लाजवाब संगम देखकर ही कह उठी मेरी जान हिन्दुस्तान

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