कला कभी नहीं मरती : स्मृतियों में चित्रकार सीमा चतुर्वेदी

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कोलकाता । कलाकार के मरने के बाद भी उसकी कला कभी नहीं मरती। सीमा चतुर्वेदी एक ऐसी ही कलाकार थीं जो अपने असाध्य रोग कैंसर से लड़ती हुए मृत्यु को प्राप्त हुईं। मंडाला चित्रों के लिए जानी जाने वाली सीमा चतुर्वेदी विगत कई वर्षों से पेंटिंग में काफी काम कर रही थीं। आईसीसीआर में अवनींद्रनाथ टैगोर गैलरी में डायमंड फोर के तत्वावधान में लगी एक प्रदर्शनी में उनसे मिलने का अवसर मिला। प्रदर्शनी का उद्घाटन रामानंद बंदोपाध्याय ने किया था। कला के विविध रूपों जैसे वाटर कलर, ऑयल पैंटिग के लगभग साठ चित्रों की प्रदर्शनी लगी थी जिसमें कृष्ण और गणेश के कई प्रतीकात्मक और परंपराओं से युक्त चित्र थे जो उनकी कल्पना के विस्तार को दर्शाते थे। सीमा ने बीमारी को कभी भी अपने मन पर हावी नहीं होने दिया और सदैव ही उनके होठों पर सकारात्मक मुस्कान लिए रहतीं थीं। तीस मार्च बाईस उनके जीवन का आखिरी दिन था। अपने अंतिम समय में अपोलो अस्पताल में भर्ती रहीं जहां उन्होंने दुनिया से विदा लिया। अपने घर परिवार को संभालती हुई कैंसर से लड़ती हुई रंगों में जीवन को खोजती सीमा जीवन के रंग बिखेरती दिखाई देती है। लोक वेशभूषा में दो राजस्थानी स्त्रियों की पेंटिंग, समूह नृत्य चित्र, झील में खिला कमल, बुद्ध की विभिन्न भंगिमाओं के चित्र तो कला की विशिष्टता लिए हुए हैं। साथ ही मंडाला प्रिंट वाले कॉफी मग तो बहुत ही मनोरम हैं जब भी कोई कॉफी मग देखेगा उसे कलाकार की सकारात्मकता का एहसास होगा। कलाकार मर जाता है लेकिन उसकी कला जिंदा रहती है।सीमा की अंतिम इच्छा थी कि फलों के पेड़ लगवाने की जिसे पूरा किया उनके पति बेटा और बेटी दामाद और बच्चों ने । न्यू टाउन के स्मृति वन में अमरूद, आम, चीकू, अमलतास, बरगद आदि के पेड़ सीमा की अंत्येष्टि अवशेष के साथ लगाए गए। भवानीपुर एजूकेशन सोसाइटी कॉलेज की प्रो मीनाक्षी चतुर्वेदी (सीमा की जेठानी) ने बताया कि वह इंटीरियर डिजाइनर भी थीं और उनको रंगों का बहुत ज्ञान था। इस अवसर पर डॉ वसुंधरा मिश्र ने श्रद्धांजलि अर्पित की।

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