कविता:- मेरी ‘हिन्दी’

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-निखिता पाण्डेय

मेरी ‘हिन्दी’ का हृदय
अत्यंत विस्तृत है…..
इसके मन में केवल ‘भारत’ ही नहीं,
पूरे विश्व का प्रेम समाहित है।
इसके हर पन्ने में…….
विचारों की मालाएं खिली रहती हैं।
यही हमारी जननी,
हमारा पोषण करती है।
प्रतिदिन इसमें सृजन की धारा प्रवाहित होती है…
मुझे पता है,
मैं भी इसी का हिस्सा हूं…..
पंत,प्रसाद और महादेवी वर्मा ने भी
अपना प्रकृति-प्रेम
इसी ‘हिन्दी’ से
अपने रचना-संसार में पल्लवित किया।
धूमिल ने भी अपना क्रांतिकारी स्वर,
इसी ‘हिन्दी’ से जागृत किया…..
और जन-जन के अग्रदूत बने।
निराला ने इसी ‘हिन्दी’ के माध्यम से जनमानस के अंधविश्वास के
थोथे जंजीरों से मुक्ति दिलायी।
चंद्रधर शर्मा ‘गुलेरी’ ने
युद्ध की विभीषिका से अपना प्रेम उजागर किया
और ‘हिन्दी’ की पहचान को एक नयी दिशा दी…
यह धारा चलती रही….
इसकी नींव भारतेंदु ने
अपने मातृभाषा की शक्ति को
ईमानदारी से प्रस्तुत
किए……
और इसे सर्वोच्च स्थान प्रदान किया……
क्योंकि ऐसी निराली है,
मेरी ‘हिन्दी’।

 

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