कवयित्री शेख….जिनके सामने मुगल बादशाह की बोलती बंद हो गयी

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प्रो. गीता दूबे

ऐ सखी सुन 11

सभी सखियों को नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं। नव वर्ष 2021 आप सबके जीवन में नयी ऊर्जा का संचार करे और आप सब नये बदलाव की खुशनुमा बयार के साथ महक उठें, यही कामना है। सखियों, पिछले हफ्ते मैंने आपको ताज बेगम की कहानी सुनाई थी। आज, मैं आपको मध्ययुगीन कवयित्री शेख की कथा सुनाने जा रही हूँ। हमारे‌ समाज में किसी भी महिला की पहचान इस रूप में होती है कि वह किस की बेटी, बहन, पत्नी या माँ है। अगर उसका कुल गोत्र बहुत नामचीन न हो तो उसकी एक पहचान यह भी होती है कि वह किस की प्रेमिका है। हालांकि इस पहचान को अक्सर एक कुटिल अथवा व्यंग्यपूर्ण मुस्कान के साथ संकेतों में चिह्नित किया जाता है। लेकिन फिर भी कभी कभी इतिहास में किसी किसी महिला का परिचय इस रूप में भी उल्लिखित होता है जैसे सुजान घनानंद की प्रेमिका थीं और शेख कवि आलम की। चूंकि इतिहास लेखन की जिम्मेदारी पुरूषों के मजबूत कंधों पर‌ रही इसीलिए यही कहा गया कि शेख आलम की प्रेमिका थीं, किसी ने यह नहीं लिखा कि आलम शेख के प्रेमी थे जो कालांतर में उनके पति और उनके पुत्र जहान के पिता बने। यह भी कहा जाता है कि आलम जाति से कुलीन  ब्राह्मण थे जो शेख के प्रेम में धर्मपरिवर्तन कर मुसलमान बन गये थे।

खैर, इस बहस को यहीं विराम देते हुए मैं आपको बताना चाहूंगी कि शेख प्रसिद्ध कवि आलम की समकालीन थीं। उनका समय सन् 1694 मान जाता है। वह धर्म से मुसलमान, पेशे से रंगरेजिन तथा मन से कृष्णभक्त कवयित्री थीं। उनके बारे में  कथा प्रचलित है कि एक बार सुप्रसिद्ध कवि आलम एक दोहे की रचना कर‌ रहे थे जिसकी पहली पंक्ति तो‌ उन्होंने लिख ली थी लेकिन दूसरी पंक्ति उन्हें सूझ नहीं रही थी। उन्होंने उस आधी पंक्ति को एक कागज पर.लिखकर अपनी पगड़ी की छोर में बाँध लिया, इस विचार के साथ कि इसे बाद में पूरा अवश्य करेंगे। जब रंगरेजिन शेख को उन्होंने अपनी पगड़ी धोने और रंगने के लिए दी तो उस कागज को निकालना भूल गए। शेख ने पगड़ी तो रंगी ही, उस दोहे को भी पूरा कर दिया, जो इस प्रकार है-

“कनक छरी सी कामिनी, काहे को कटि छीन

कटि को कंचन काटि विधि कुचन मध्य धर दीनी”

इस दोहे को पढ़कर आलम कवि बहुत प्रसन्न हुए और कहा जाता है कि उन्होंने शेख को पगड़ी की रंगाई की मजदूरी के साथ एक हजार रूपए इनाम में दिए। इसके बाद स्वाभाविक रूप से उन्हें शेख से प्रेम हो गया और‌ उन्होंने उनसे ब्याह करके उन्हें अपनी जीवनसंगिनी ही नहीं काव्य संगिनी भी बना लिया। अर्थात आलम और‌ शेख  ‌मिलकर कविता करने लगे। बहुत सी कविताएँ आलम शेख के नाम से उपलब्ध हैं जो इस बात की पुष्टि करती हैं। शेख का अलग से कोई ग्रंथ नहीं मिलता है लेकिन उनके बहुत से स्फुट पद जरूर मिलते हैं जिनमें प्रेम, भक्ति और शृंगार का अद्भुत संयोजन देखने को मिलता है। वियोग शृंगार का एक मार्मिक उदाहरण प्रस्तुत है जिसे पढ़ते हुए सूरदास के वियोग शृंगार के पदों की स्मृति बरबस मन में कौंध जाती है-

“जब से गुपाल मधुबन को सिधारे भाई

मधुबन भयो मधु दानव विषम सौं

शेख कहै सारिका सिखंड खंजरीठ सुक

कमल कलेस कीन्हीं कालिंदी कदम सौं।”

शेख की ब्रजभाषा अत्यंत शुद्ध और परिमार्जित थी। अलंकारों का सहज प्रयोग उनकी विशेषता थी जिससे उनके पद सहज ही सौन्दर्य बोध संपन्न होने के साथ ह्दयग्राही भी हो उठते थे। उनकी रचनाएँ अपने कथ्य, भाषा और शिल्प में मध्यकाल के बड़े कवियों को अनायास ही टक्कर दे सकती हैं। भक्तिरस में डूबकर उन्होंने कई देवताओं की स्तुति में पदों की रचना की है। गंगा का अत्यंत ह्दयहारी वर्णन प्रस्तुत पद में हुआ है –

“नीके नाहाईं धोईं धुरि पैटो नेकु वैठो आनी

धुरि जटि गई धूरि जटि लौ भवन में

पैन्हि पैठ्यो अंबर सो निकस्यौ दिगंबर ह्वै

दृग देखो भाल में अचंभो लाग्यो मन में।”

शेख की एक विशेषता यह थी कि वह बहुत हाजिरजवाब थीं। कहा जाता है कि एक बार औरंगजेब का बेटा आलम के घर के सामने से निकल रहा था, शेख को देख उसने पूछा, “क्या आप ही आलम की स्त्री हैं ?” तब शेख ने जवाब दिया, “जी हां, जहांपनाह, जहान की माँ मैं ही हूँ ।” जहान उनके बेटे का नाम था जिसका अर्थ है, संसार अथवा विश्व, अर्थात वह आलम की पत्नी मात्र नहीं जहान अर्थात विश्व की माँ भी थीं। कहा जाता है कि यह जवाब सुनकर वह बहुत शर्मिन्दा हुआ और फिर कभी उसने इस तरह की गुस्ताखी नहीं की। यह भी माना जाता है कि शेख की बुद्धिमत्ता और हाजिरजवाबी का उस पर इतना प्रभाव पड़ा कि उसी के विशेष अनुरोध पर शेख के पति आलम को औरंगजेब का दरबारी कवि बनाया गया था।

आज की कहानी यहीं खत्म करती हूँ, सखियों। अगले हफ्ते फिर मुलाकात होगी, एक नई कहानी के साथ।   

 

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