कवि ऋतुराज की कविता ‘कन्यादान’

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शिक्षिका – नीलम सिंह, वाराणसी

कन्यादान कविता में मां द्वारा बेटी को दी जा रही सीख का उल्लेख है। उसकी यह सीख परंपरागत सीख से हटकर है ।मां बेटी को जीवन पथ पर चलने के लिए प्रेरित करती है। बेटी की विदाई के समय मां का दुखी होना स्वभाविक ही है । वह ऐसा महसूस कर रही थी जैसे अपने जीवन की सारी जमा पूंजी दान में दे रही हो। सयानी ना होने के कारण उसकी बेटी अत्यंत भोली है । वह जीवन के सुख को मन में संजोए हुए है, पर दुख की अभिव्यक्ति करने उसे नहीं आता। वह छल कपट के जीवन से पूर्णतया अनजान है। बेटी को भावी जीवन के लिए तैयार करते हुए मां उसको सीख देती है पानी में झांक कर अपने रूप सौंदर्य पर सम्मोहित न होना।वह आगे बताती है कि ससुराल में वह आग का प्रयोग रोटियां सेंकने के लिए करें, दुखों से घबराकर अपनी जान देने के लिए नहीं।इसके अतिरिक्त वह बेटी को समझाती है कि वस्त्र एवं आभूषण शाब्दिक भ्रमजाल हैं, इसमें उलझकर अपने अस्तित्व को न भूलें।अंत में वह अपनी बेटी से कहती है कि लड़की के सारे उचित गुण बनाए रखना,पर अपनी कमज़ोरी मत प्रकट करना,कहने का तात्पर्य है कि जीवन में आने वाली परिस्थितियों से न घबराते हुए उसका सामना करने के लिए तैयार रहना।

(वीडियो सौजन्य – हिन्दी का आँगन)

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