कश्मीरनामा : उम्मीद और अन्त में कुछ अनुत्तरित प्रश्न

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भारत में इतिहास लेखन की परम्परा नहीं है..और भ्रांतियों का बड़ा कारण है। सम्भवतः हमारे पूर्वज वर्तमान में रहना पसन्द करते हों और भविष्य की परिकल्पना उनके मष्तिष्क में रही ही न हो..या कभी उनको यह विचार भी न आया हो कि हजारों साल बाद उनसे उनकी प्रामाणिकता का प्रमाण माँगा जायेगा। अगर यह विचार आया होता तो सम्भवतः रामायण या महाभारत के पहले ही उसके लेखन की प्रक्रिया शुरू हो जाती मगर यह भी सही है कि हमें इतिहास के नाम पर जो प्राप्त होता है…वह स्थापत्य और साहित्य में ही प्राप्त होता है…इसके अतिरिक्त हमारे पास हमारे देश के प्राचीन इतिहास के नाम पर ठोस प्रमाण नहीं हैं और बस…इसी का लाभ उठाते हैं हमारे आधुनिक इतिहासकार। होना तो यह चाहिए कि हम किसी भी विचारधारा से हों मगर जब लेखन हो…तो वह निरपेक्ष हो..मतलब जो दायित्व आप पत्रकारों से निभाने की उम्मीद करते हैं, वह जिम्मेदारी बतौर लेखक आपमें होनी चाहिए। निष्पक्ष औऱ निरपेक्ष रहने की जद्दोजहद के बीच जो सॉफ्ट कॉर्नर है…वह बहुत लिखवा भी जाता है और छिपा भी जाता है।
मेरी समझ में लेखन वह है जहाँ लेखक का दृष्टिकोण हावी न हो…2018 में प्रकाशित पुस्तक ‘कश्मीरनामा’ पर एक परिचय़ात्मक टिप्पणी सलाम दुनिया में रहते हुए गूगल से उधार ली थी..मगर उसी समय से इच्छा थी कि एक बार यह किताब हाथ में आए..2020 में साल की पहली किताब यही बनी जो हाथ में आई..। अगर जानकारी के लिहाज से देखी जाए तो पुस्तक शानदार है…गहन शोध के बाद लिखी गयी है…हर एक चैप्टर के बाद सन्दर्भ ग्रन्थों की सूची है..समझौतों का उल्लेख है..बहुत सी बातें और बहुत लोग…ऐसे रहे जो मैंने इस पुस्तक के माध्यम से जाने…मैं उनको नहीं जानती थी..। कश्मीर समस्या को सिलसिलेवार तरीके से समझने में यह किताब बहुत मदद करती है मगर इसके खत्म होते – होते कुछ प्रश्न अनुत्तरित ही रह जाते हैं।
आमुख में जब डॉ. पुरुषोत्तम अग्रवाल लिखते हैं, ‘कश्मीर समस्या का एक कारण भूगोल है तो दूसरा इतिहास- मुस्लिम बहुल आबादी औॅर भारत पाकिस्तान से मिलती सीमाएँ।’ मगर असल बात वह आगे की पँक्तियों में कहते हैं, ‘आज असल समस्या है अजनबियत औऱ परायेपन का बोध’। लेखक मानते हैं कि यह एक कटु सत्य है कि कश्मीर औऱ उत्तर -पूर्व हमारे देश के ऐसे दो हिस्से हैं जिनके नक्शे में होने को लेकर हम जितने संवेदनशील हैं, वहाँ के हालात, मुश्किलात, आकाँक्षाओं और उम्मीदों के बारे में उतने ही असम्पृक्त। इस किताब में कश्मीर के शैव, बौद्ध परम्परा का स्पष्ट उल्लेख है..यानी कश्मीर में हिन्दू ही पहले से थे…यह एक अकाट्य सत्य है। इस किताब में भ्रष्ट हिन्दू शासकों, मुस्लिम शासकों की क्रूरता..रानियों की व्याभिचारिता और उनके राजनीतिक षडयंत्रों…(देखें..पृष्ठ 29 – बप्पता देवी और मृगावती देवी के मंत्री सुगंधादित्य के साथ सम्बन्ध), रिंचन और कोटा रानी और शाहमीर का प्रसंग (पृष्ठ -41), इस्लाम में भी ऋषि परम्परा का होना (कश्मीर में इस्लाम को लाने वाले नुंग ऋषि), डोगरा, अफगान, मुगल शासकों के अत्याचारों का भी तफ्सील से वर्णन है…मगर बार – बार कश्मीर में मुसलमानों की बहुसंख्यक आबादी का हवाला देते हुए उनकी आजादी की माँग को परोक्ष रूप से जायज ठहराना सही नहीं लगता..। सवाल यह है कि अगर कश्मीर में बहुसंख्यक मुसलमानों की आबादी का हवाला देकर उनके पाकिस्तान में जाने की भावना के खिलाफ नाराजगी नहीं तो बहुसंख्यक हिन्दुओं से इसी आधार पर नाराजगी कैसे हो सकती है और क्यों होनी चाहिए? कश्मीरनामा शेख अब्दुल्ला को नायक की तरह पेश करती है और नेहरू के प्रति भी एक सॉफ्ट कॉर्नर है मगर आरएसएस और संघ परिवार के प्रति उनकी घृणा नहीं छिप पाती…और ऐसी ही जगहों पर सवाल खड़े होते हैं…जब प्रधानमंत्री का घेराव करने वाले जेएनयू के छात्र और विरोधी…लोकतांत्रिक माने जाते हैं तो नेहरू का घेराव करने वाले भाड़े के ट्टटू क्यों हैं लेखक की नजर में, यह स्पष्ट नहीं हो पाया। कश्मीर के लोगों को फिरन और कांगड़ थमाकर उनको लाचार बनाने का काम तो अकबर ने किया मगर क्या वजह है कि सदियाँ बीत जाने के बाद भी कश्मीर के लोग अपने आवरण से बाहर नहीं निकलना चाहते? आप क्यों उम्मीद करते हैं कि आप जिस देश के लोगों को अपना नहीं मान सकते…जो आपकी नजर में बाहरी हैं…वे अपना पेट काटकर आपके राज्य को बचाते रहें…किताब में जूनागढ़ का उल्लेख है मगर एक बात याद रखनी होगी कि आज वहाँ की जनता भी खुद को भारतीय समझती है…भारत से प्यार करती है..इसलिए उसे भी प्यार मिल रहा है।
रही बात मुस्लिम कॉन्फ्रेंस…की जो बाद में अपने हितों को साधने के लिए नेशनल कॉन्फ्रेंस बना तो इसका कारण भारत के प्रति प्रेम नहीं था बल्कि अपना राजनीतिक हित साधना था…जो राज्य अपने हितों…अपनी सुरक्षा के लिए पूरे देश पर निर्भर हो…और इस पर भी कश्मीरियत के नाम पर बिगड़ैल बच्चे की धौंस जमाता रहे…उसके लिए सहानुभूति क्यों होनी चाहिए…?
मध्ययुग में मुस्लिम आक्रान्ता कश्मीर पर क़ाबिज़ हो गये। कुछ मुसलमान शाह और राज्यपाल (जैसे शाह ज़ैन-उल-अबिदीन) हिन्दुओं से अच्छा व्यवहार करते थे पर कई (जैसे सुल्तान सिकन्दर बुतशिकन) ने यहाँ के मूल कश्मीरी हिन्दुओं को मुसलमान बनने पर, या राज्य छोड़ने पर या मरने पर मजबूर कर दिया। कहने का मतलब यही है कि जो मुसलमान बने…वह तो हिन्दू ही थे…।
कश्मीरी पंडितों, हिन्दूओं, जगमोहन सबकी एक नकारात्मक छवि है…यह सत्य है कि हिन्दुओं में पाखंड रहे…अत्याचार, निरंकुशता रही…इनमें से किसी का भी समर्थन नहीं किया जा सकता मगर क्या अतीत के अत्याचारों का प्रतिशोध लेने के लिए वर्तमान नष्ट किया जा सकता है…आप बार – बार मुसलमानों के साथ हुए अन्याय का ब्योरा देते हैं और फिर उनके अपराधों को जस्टिफाई करते हैं.. आपको पैलेट गन दिखते हैं मगर भटके हुए युवाओं के हाथों के पत्थर नहीं देखना चाहते। यह नहीं भूलना चाहिए कि कश्मीर में जब भी कोई आपदा आई..तो भारतीय सेना ही नहीं बल्कि पूरा भारत कश्मीर के साथ खड़ा हुआ मगर बदले में कश्मीर के लोगों से परायेपन के अलावा पूरे देश को क्या मिला? मदन मोहन मालवीय जैसे शख्सियत को आप ‘आग में घी डालने वाला’ बता रहे हैं? यह भी पूछा जाना चाहिए कश्मीरियत की बात करने वाले नेशनल कॉन्फ्रेंस में हिन्दुओं की स्थिति क्या थी? इस बात पर कौन विश्वास करेगा कि सरदार पटेल कश्मीर पाकिस्तान को देने के हिमायती रहे होंगे? हर युग में हर देश के नियम अलग होते हैं और वर्तमान को ध्यान में रखकर बनते हैं इसलिए सिर्फ डोगरा शासन के समय से चले आ रहा था इसलिए 35 ए को जारी रहना चाहिए. इसका कोई अर्थ नहीं है।
19 जनवरी 1990 की घटना कश्मीर की इतिहास का सबसे दुखद अध्याय है। 19 जनवरी 1990 को नामुराद कट्टरपंथियों ने ऐलान कर दिया कि कश्मीरी पंडित काफिर है। इस ऐलान के साथ कट्टरपंथी कश्मीरी पंडितों को कश्मीर छोड़ने और इस्लाम कबूल करने के लिए जोर-ज़बरजस्ती करने लगे। कट्टरपंथियों का आतंक कश्मीर मे़ बढता जा रहा था। नतीजतन मार्च 1990 तक लगभग 1 लाख 6 सहस्त्र कश्मीरी पंडितो को अपना घरबार छोड़कर कश्मीर से भागना पड़ा। मार्च 1990 तक कश्मीर में हिंदू समुदाय के हर वर्ग की बड़े पैमाने पर हत्याए हुई। जिसमें हिंदू अधिकारी बुद्धिजीवी से लेकर कारोबारी एवं अन्य लोग भी शामिल थे। कश्मीरी पंडित इस दुनिया की सबसे सहनशील समुदाय है इतने बड़े विस्थापन और अत्याचार के बाद एक भी कश्मीरी पंडित ने ना तो हथियार उठाये और ना ही किसी हिंसक आंदोलन किया। ऐसा उदाहरण विश्व इतिहास में दूसरा नही है।
कश्मीरी पंडितों के मुताबिक, 300 से ज्यादा लोगों को 1989-1990 में मारा गया। इसके बाद भी पंडितों का नरसंहार जारी रहा। 26 जनवरी 1998 में वंदहामा में 24, 2003 में नदिमर्ग गांव में 23 कश्मीरी पंडितों का कत्ल किया गया। तीस साल बीत जाने के बाद भी कश्मीरी पंडितों के खिलाफ हुए किसी भी केस में आज तक कोई कार्रवाई नहीं की गयी। हैरानी की बात यह कि सैकड़ों मामलों में तो पुलिस ने एफआईआर तक दर्ज नहीं की। पलायन के बाद, कश्मीरी पंडितों के घरों की लूटपाट की गई, कई मकान जलाए गए। कितने ही पंडितों के मकानों, बाग-बगीचों पर कब्जे किए गए। कई मंदिरों को तोड़ा गया और जमीन भी हड़पी गई। इन सब घटनाओं का आज तक पुलिस में केस दर्ज नहीं हुआ।
कश्मीरी पंडितों के पलायन की जिम्मेदारी भी जगमोहन पर डालने का प्रयास है..मगर कार्रवाई न होती..तब क्या होता..सबसे बड़ी बात क्या कश्मीर का मतलब सिर्फ मुसलमान है…आजादी है…और अगर ऐसा ही है तो जम्मू और लद्दाख के हितों का क्या…? यह सही है कि कश्मीर का शोषण किया गया…सभी ने किया मगर खुद को कश्मीरियों का रहनुमा मानने वालों ने कश्मीर का कब भला किया…धारा 370 तो 70 साल तक रही तो क्यों नहीं कश्मीर खुशहाल हुआ…क्या यह सच नहीं है कि शेख अब्दुल्ला से लेकर फारुक औऱ अब उमर अब्दुल्ला से लेकर मुफ्ती मोहम्मद सईद और अब महबूबा मुफ्ती के लिए कश्मीर उनकी तिजोरियाँ गर्म करने वाला और बादशाहत बरकरार रखने वाले इक्के के अतिरिक्त कुछ नहीं और कश्मीर का सबसे अधिक शोषण तो इन कश्मीरी नेताओं ने ही किया है। कश्मीर में आर्थिक भ्रष्टाचार की कहानियाँ भी कम नहीं…70 साल तक कश्मीर का मतलब कश्मीर घाटी ही रहा है….जम्मू और लद्दाख तो आपकी नजर में होकर भी नहीं थे..उनका प्रतिनिधित्व नहीं रहा…पूछा जाना चाहिए कश्मीर में नेता जब उसके थे…तो वहाँ के लोग इतने पिछड़े कैसे रह गये…क्यों शिक्षा या स्वास्थ्य पर सही तरीके से काम नहीं हुआ।
दफ्तरों में ऑफिस पॉलिटिक्स का एक तरीका यह भी है कि जिसे बर्बाद करना हो…उसे दूसरों से अलग कर दो और सारी दुनिया से काट दो…इतनी तारीफ करो कि वह खुद में ही रहे. फिर वह पूरी तरह निर्भर हो जाएगा…तुम्हारा गुलाम बन जाएगा…अपना विवेक ताक पर रखकर अपना अस्तित्व भूलकर तुम्हारे लिए खुद को लुटा देगा…बस उसे एक झुनझुना पकड़ाने की जरूरत है और एक ऐसी असुरक्षा की भावना पैदा करने की जरूरत है कि वह हर जगह खुद को इतना असुरक्षित समझे कि सही और गलत का फर्क करना भूल जाए…वही सुने जो उसे अच्छा लगे और वही करे जो आप चाहते हो…. या खुद वह चाहता हो.. कश्मीरनामा पढ़ते हुए मुझे कश्मीर और कश्मीर के लोगों पर यह थ्योरी सटीक लगी…।
तथ्य़ों और इतिहास की जानकारियों से भरी पुस्तक हाथ में लेते ही उम्मीद जगती है…काफी कुछ आप जानते हैं मगर अन्त तक आते – आते आप सवालों में उलझ जाते हैं। न चाहते हुए भी सवाल उठते हैं…क्या पुस्तक का उद्देश्य संघ की भर्त्सना, हिन्दू राष्ट्रवाद की आलोचना, शेख अब्दुल्ला को नायक बनाना या नेहरू की गलतियों पर परदा डालना है…। क्या कश्मीरी पंडितों के अन्याय की कहानी का मकसद उनके पलायन औऱ नरसंहार को भुलाना है और अलगाववादी ताकतों और आजादी के नारों का समर्थन है…मुझे उत्तर नहीं मिले। आप बहुसंख्यक का हवाला देकर अगर परोक्ष रूप से कश्मीर की आजादी का समर्थन करते हैं तो आपको हिन्दू राष्ट्रवादियों से भी आपत्ति नहीं होनी चाहिए क्योंकि उनकी माँग का आधार भी वही है जो आपका है।
जरूरी है कि हम जब इतिहास की बात करें…कहें और लिखें तो अपने विचारों को भरसक दूर रखें…और यही नहीं हो पाता और सवाल अनुत्तरित ही रह जाते हैं।

कश्मीरनामा

लेखक – अशोक कुमार पांडेय

प्रकाशक – राजपाल एंड संस

प्रकाशन वर्ष – 2018

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