कूड़ेदान

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-विक्रम साव

कूड़ेदान
पौ फटने से पहले ही,
गमछी डाले कंधे पर निकले घर से ,
कटे फीते की चप्पल पहनी ,
और पैंट को नीचे से घुटने तक मोड़ लिया,
पहुँचे ऑफिस और लेकर गाड़ी निकल गए काम पर,
घड़घड़ाती हुए गाड़ी के स्वर में
सीटी की भी वर्णमाला जुड़ी रहती है,
मुहल्ला बंधा है केशव का,
उसी तरफ़ गाड़ी लिए चल देता हर रोज़,
वही बूढ़े बरगद के बगल वाली छपरइया गल्ली में,
पर आज सूरज की तपिश थी जानलेवा
गया एक कूड़ेदान के पास
तो वो उलटा पड़ा था,
कूड़ेदान में था
सड़ा-गला-मरा कुत्ते का बच्चा,
उठाते ही गिरा उसका आधा धड़ नीचे
उसने पूँछ की तरफ़ से हाथ से उठाया,
सड़ी पूंछ उसके हाथ में आ गयी,
पास ही पड़ा था एक प्लास्टिक पैकेट
उसे उठाया तो , उसमें भरा था मल,
गाड़ी में फेंकते ही छींटे पड़े उसके चेहरे पर,
वो स्वर्ग की कल्पना भी कभी नहीं करता,
उसे पता है वह जहाँ भी जाय
नरक ही मिलेगा
मेहतर हूँ तो नर्क ही न उठाऊँगा।

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