कोरोना काल में हमारा साहित्यिक सफर….

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डॉ. किरण सिपानी *पूर्व ऐसोसिएट प्रोफेसर ए.जे.सी.बोस कॉलेज कोलकाता *कविता, संस्मरण, आलेख-लेखन में रुचि

कोरोना काल के सौ दिन। डर और फक्कड़पन का चोली-दामन का साथ रहा।मीडिया आँकड़े दिखा-दिखाकर अपने दड़बों में घुसे रहने की घूँटी दिन-रात पिलाता रहा ।डरे-डरे एक मन पर कबीर के शब्द तारी होते रहे-“फूलि-फूलि चुन लिये, काल्हि हमारी बार।” धरा कौ प्रमान यहि तुलसी, जो फरा सो झरा,जो बरा सो बुताना”-इस सच को जानते हुए भी मन प्रार्थना करता रहा-“हे भगवान!हमारी बारी न आये।”चारों तरफ हिदायतें ही हिदायतें…. यह मत करो,वह मत करो।करो तो यह….यह करो। हिदायतों का एक एनसाइक्लोपीडिया तैयार हो गया।  निराला के राम के दूसरे मन की तरह मेरा एक और मन जो दैन्य नहीं जानता–कोरोना की तपिश में फक्कड़ाना अंदाज में जीता रहा-“अरे जो होगा, देखा जायेगा।”प्रीति-प्रतीति-सुरीति से रामनाम-जप की तरह योग-प्राणायाम-प्रार्थना की संजीवनी से इकहत्तर वर्ष की उम्र में इस  युद्ध को जीतने की तैयारी में उत्साहपूर्वक लगी रही।घरेलू सहायिकाओं के अभाव में भी रोटी-कपड़ा-मकान की देखभाल के साथ-साथ अल्जाइमर-डिमेंशिया के रोगी अपने बहत्तर वर्षीय शिशु पति की पुकार और जरूरतों को जवानों की तरह दौड़-दौड़कर पूरा करती रही।और ऐसे में साहित्य-चर्चा!जी हाँ, बस…।

उफनती चाय के साथ कविता के शब्द भी उफनते रहे।थोड़ी-बहुत ही कविताएँ लिखी गयीं–विभिन्न मूडों की,छोटी-छोटी।हाँ,एक दिन तरन्नुम में आ गई और शताब्दी वर्ष में प्रखर युग चिंतक जैनाचार्य महाप्रज्ञ को संबोधित कर कुछ पंक्तियाँ रच डालीं।1992 में विश्व भारती, लाडनूँ के कक्ष में उनसे हुआ विचार-विमर्श मन को कहीं गहरे प्रभावित कर गया था।उन्होंने अपने युग के अध्यात्म को नयी ऊँचाइयाँ प्रदान कीं।

महीनों से रेंग-रेंगकर चल रही जापान-यात्रा-संस्मरण-पुस्तक के खाली पृष्ठ उचक-उचककर ताक-झाँक करते रहे कि उन्हें लेखन-कक्ष में प्रवेश मिल जाये।बीच-बीच में उन्हें प्रवेश तो मिला,पर हर बार यह अल्पकालीन ही रहा। इबारागिकेन-फीजी- क्योटो-नारा-डिज़्नी सी के पड़ावों को पार करती हुई यह लेखन-यात्रा टोक्यो तक पहुँचकर सुस्ता रही है। उम्मीद है कि धीरे-धीरे यह मछुआ चाल गंतव्य तक पहुँच ही जायेगी।

कुछ मित्रों का दीर्घकालीन आग्रह था कि देवनागरी लिपि पर एक आलेख लिखूँ,वही तैयार कर डाला-“देवनागरी लिपि की लोकप्रियता और वैज्ञानिकता।”हमारे संघ की राजभाषा हिन्दी और लिपि देवनागरी है। सारा संस्कृत वांगमय चाहे उत्तर भारत का हो या दक्षिण भारत का,देवनागरी में मिलता है।बहुत सा पंजाबी, गुजराती और राजस्थानी साहित्य वर्तमान युग में इस लिपि में लिखा जा रहा है। भावात्मक एकता की दृष्टि से सारी भारतीय भाषाओं के लिए एक ही लिपि के प्रयोग की वकालत बहुत बार की गई है पर अंग्रेजी शासन के दौरान हमारे प्राचीन ग्रंथों के रोमन लिपि में लिखे जाने के कारण कुछ भारतीय मनीषी रोमन लिपि के पक्षधर हो गये,जबकि जस्टिस शारदाचरण मित्र जैसे विद्वान ने लिपि विस्तार परिषद(संस्था)के माध्यम से ‘देवनागर’ पत्र निकालकर समस्त भारतीय भाषाओं को नागरी लिपि में लिखने का प्रयत्न किया था, खैर। समय-समय पर इस लिपि में सुधारों और मानकीकरण के लिए उचित प्रयास किये गये। आज यह लिपि नये यंत्र कम्प्यूटर के लिए अनुकूल प्रमाणित हुई है।अब इस विषय को यहीं विराम दिया जाये।

लॉकडाउन ने छोटे बच्चों के लिए घरों को कारागाहों में बदल दिया है। उछल-कूद के लिए न स्कूल की सीढ़ियाँ हैं, न मैदान, न पार्क, न नानी का घर। लॉकडाउन के पहले हफ्ते-दो हफ्ते में नानी से ढेरों कहानियाँ सुने बिना नानी को न छोड़नेवाले बच्चों का तेज-तर्रार दिमाग नयी  योजना में व्यस्त हो गया। उनके नवोन्मेषी दिमागों ने एक रास्ता निकाल ही लिया। नानी की  कहानियों को नानी की ही आवाज में कैद करवाकर ऑडियो बनवा डाले और यही नहीं इन ऑडियो को अपनी-अपनी स्कूल के ग्रुप में पोस्ट भी करवा दिया। मैं अपनी बनायी नयी-नयी कहानियाँ उन्हें  सुनाती जरूर रही हूँ, पर बाल-साहित्य-लेखन पर कभी गंभीरता से विचार नहीं किया। इस बार लगा कि इस बारे में भी सोचा जा सकता है ।

इस दौरान थोड़ा-बहुत पढ़ा-सुना भी। टेक्नोलॉजी के युग में ऑनलाइन कार्यक्रमों, वेबिनारों,कवि सम्मेलनों ने अंधेरे में दीये को जलाये रखा। सृजनात्मकता का ध्वज लहराता रहा।पर कभी-कभी ऐसा भी लगा कि बाढ़ आ गई। हर दिन मोबाइल पर एक लम्बी सूची… जिसे देखो,वही अपनी कविताओं-कहानियों का ऑडियो-वीडियो बनाकर परोस रहा है। प्रसिद्ध होने की सनक पागलपन में तब्दील होती सी लगी-“लपक लो मौका, दुबारा नहीं मिलेगा, न जाने कब जिन्दगी खत्म हो जाये।”बहरहाल कुछ अच्छी रचनाओं ने संपोषित भी किया।नूपुर अशोक की व्यंग्य रचनाओं के पॉडकास्ट स्तरीय लगे।

अधिकांश साहित्यकारों को यह शिकायत रहती है कि लोग उनकी रचनाएँ नहीं पढ़ते। वे चाहे किसी को न पढ़ते हों,पर उनका प्रयत्न रहता है कि लोग उनको अधिक से अधिक पढ़ें। पर जनाब! लिखने-पढ़ने की दुनिया में एक वर्ग हम जैसे अदना लेखकों का भी है जो पूरी निष्ठा के साथ दूसरों को पढ़ता ही नहीं, गंभीरता से उन पर विचार भी करता है। अब हर वक्त तो शिकायतों के तुरंत उत्तर नहीं दिये जा सकते। खैर! पढ़े जाने  की प्रतीक्षा में कतारबद्ध कुछ रचनाओं को मनोयोग से पढ़ा।प्रमोद शाह नफीस के कुछ आलेखों, साप्ताहिक स्तंभों एवं परिशिष्टों का संकलन-“कुछ सोच रहा हूँ”-को पढ़ा।प्रखर स्वतंत्र चिंतन के माध्यम से लेखक ने विभिन्न क्षेत्रों के ज्वलंत मुद्दों पर बेबाक टिप्पणियाँ की हैं। समस्याओं के कारणों पर विचार किया है, सकारात्मक सुझाव प्रस्तुत किये हैं। साप्ताहिक स्तंभ–‘खरी-खरी’में सचमुच ही खरी बात की है, मसलन-“भारत अपने घर में ही हार गया है-15जून 2008″,”कोई मदर टेरेसा पादरी नहीं बन सकती-22जून 2008” आदि -आदि।

ढेरों सम्मान -पुरस्कार प्राप्त अनेक विधाओं में लेखन करनेवाले साहित्यकार डॉ.मंगत बादल ने हिन्दी-राजस्थानी-पंजाबी भाषाओं में अनेक स्मरणीय कृतियों का सृजन किया है। साहित्य अकादमी द्वारा पुरस्कृत  उनके राजस्थानी प्रबंध काव्य ‘मीरां’के रसास्वादन का अवसर मिला था। कोरोना काल में इसके हिन्दी अनुवाद को भी दो-चार बैठकों में ही पढ़ डाला।प्रथम पुरुष  में लिखा गया यह प्रबंध काव्य स्त्री-पक्षधरता की अद्भुत कृति है। मध्यकालीन सामंती युग में कन्या-जन्म उत्सव का रूप नहीं लेता, मुर्दानगी का कहर बरपाता है–यह वर्णन-चित्रण बहुत प्रभावी बन पड़ा है। ताजगी भरे बिंबों-उपमाओं के माध्यम से कवि ने अभिव्यक्ति के नये परचम लहराये हैं। अनुवाद के माध्यम से हिन्दी पाठकों तक इस कृति को पहुँचाने के लिए अनुवादक प्रशंसा के पात्र हैं। कुछ समय पूर्व इन्हीं कवि के छोटे से खण्ड काव्य  ‘सीता’  की प्रश्नाकुलता के सौंदर्य ने मुझे अभिभूत किया था। इनका एक और प्रशंसित काव्य ‘कैकेयी’ पढ़े जाने की प्रतीक्षा में है। लेखक के एक व्यंग्य संग्रह- ‘छवि सुधारो कार्यक्रम ‘की  हास्य-व्यंग्य रचनाओं ने कोरोना काल में हँसाया-गुदगुदाया भी। ‘उधार लेकर घी पीने का सुख’ , ‘पोपटलाल जी का पर्यावरण प्रेम, ‘परीक्षा में नकल के नायाब तरीके’, ‘छवि सुधारो कार्यक्रम ‘, ‘पगड़ी उछालो कार्यक्रम’ आदि ने समाज के यथार्थ का बघिया उधेड़कर रख दिया।

इस समय फणीश्वरनाथ रेणु की जन्मशती पर होनेवाले कार्यक्रमों की आभा मंद हो गई। कुछ आलेख पढ़ने को मिले।उनकी कहानियों को पढ़ने की ललक जागी।अपनी तथाकथित छोटी सी घरेलू लाइब्रेरी के कथा-संग्रहों को खंगाला।सिर्फ एक कहानी ‘तीसरी कसम’ ही उपलब्ध थी।उसे ही दुबारा पढ़कर झेंप मिटाई। बहुत पहले उनकी कुछ कहानियाँ पढ़ी थीं, फिर एक बार उनसे गुजरने का मन हुआ। पुस्तकाकार रूप में ही पढ़ना चाहती थी।पुस्तक को हाथ में लेने और पढ़ने का अपना आनंद होता है।जो देख-सुन-समझ रही हूँ… इस अभ्यास को बदलना ही होगा। ‘तीसरी कसम’ फिल्म की याद जेहन में ताजा थी। कहानी को फिर पढ़ना रोमांचित कर गया। लोकरंग के सघन जीवंत रंगों की एकतरफा अनिवेदित प्रेमकथा पाठक को संवेदनाओं के जादुई स्पर्श का अनुभव कराती है। नायक हिरामन को अपनी गाड़ी में बैठी जनानी सवारी(हीराबाई) के प्रति कभी संदेह होता है कि “कहीं डाकिनी-पिशाचिनी तो नहीं” ,कभी यह विस्मय कि “औरत है कि चम्पा का फूल” , या यह अचरज  “अरे बाप ई तो परी है”….कभी उसको लगता है कि उसकी गाड़ी पर “देवकुल की औरत सवार है”….सबकुछ रहस्यमय अजगुत-अजगुत लगता है। हिरामन की इन अनुभूतियों द्वारा कहानीकार लोक -मन और ग्रामीण-संस्कृति के रेशे-रेशे को उकेरने में सफल होते हैं। हिरामन की निश्छलता, उसकी पीड़ा- “अजी हाँ, मारे गये गुलफाम”- पाठक के मन में बस जाती है। कहानी पढ़ते हुए लगा कि रेणु की कथाभाषा में एक अनोखा कौशल है जो लोकभाषा और नागर भाषा के बीच एक संतुलन कायम करते हुए पाठक को गद्य-संगीत का आनंद देता है।

स्वाधीनता के  पश्चात् 1950-65 का डेढ़ दशक नयी कहानी की विविधता और बहुलता  का समय है। तमाम वक्तव्यों-विवादों  से परे रहकर रेणु अपनी कहानियों के परिवेश को ग्राम जीवन से लेकर शहरी जीवन तक विस्तार देते हैं। वे नयी कहानी के संधिकाल के कहानीकार हैं। उनकी पहली कहानी ‘बटबाबा’ 1944 में और उपन्यास ‘मैला आँचल’ 1954 में प्रकाशित हुआ। मैला आँचल ने हिन्दी उपन्यासों को एक नयी दिशा की ओर मोड़ा। मैला आँचल और परती परिकथा को प्रसिद्धि मिलने से बहुत  पहले उनकी कहानियों की मानवीय संवेदना, बदलते जीवन मूल्य और राजनैतिक मूल्यों की गहरी पकड़ से पाठक परिचित हो चुके थे। उपन्यासों को प्रसिद्धि मिलने के कारण आधुनिकता-प्राचीनता-ताजगी से समन्वित कहानियाँ उपेक्षित रह गयीं। डॉ.रामवचन राय के अनुसार “…अपनी आलोचनाओं का उत्तर भी उन्होंने कहानी लिखकर ही दिया “-(प्रभात खबर,26 जून 2020)।  उनकी क्रांतिकारिता, उनके जन-संघर्षों, उनकी सृजनात्मकता को नमन!

एक मई के दिन स्मरणीय सीताराम जी सेक्सरिया की स्मृति ताजा हो जाती है। इसी दिन उनके जन्मदिवस पर स्थापित भारतीय भाषा परिषद द्वारा प्रतिवर्ष आयोजित कार्यक्रम में उपस्थित होकर स्वयं को उपकृत महसूस करती हूँ। इस कोरोना काल में किसी भी सामूहिक कार्यक्रम की गुंजाइश ही कहाँ? मुझ जैसी अनेक बालिकाओं को उनकी वात्सल्य-गंगा में स्नान करने का अवसर मिला था। मेरे बाल-मन पर अंकित वह छवि आज भी सुरक्षित है, जब वे मारवाड़ी बालिका विद्यालय में 15अगस्त और 26जनवरी जैसे राष्ट्रीय उत्सवों पर सारी बालिकाओं के सिर पर हाथ फेरते हुए उनसे मिलते थे। किसी नाटक में अच्छा अभिनय देखते तो आगे बढ़कर व्यक्तिगत रूप से हौसला अफजाई करते थे।

अनेक साहित्यकारों को उनका आतिथेय उपलब्ध था,विशेषकर महादेवी वर्मा को।सीताराम जी उन्हें ससम्मान धर्म-बहन का दर्जा देते थे। उनका कलकत्ता-आगमन हमलोगों के लिए उत्सव सरीखा था। हम बड़े उत्साह से स्कूल बस में लदकर बड़ाबाजार से लॉर्ड सिन्हा रोड की यात्रा करते। उनके दर्शन, चरण-स्पर्श और दो-चार बातें कर गद्गद् हो जाते। सेक्सरिया जी के कारण ही हमारे मनों में यह संस्कार गहरे पैठ गया था कि किसी साहित्यकार का दर्शन तीर्थ-दर्शन से कम नहीं होता। उन जैसे महिलाओं की शिक्षा के हिमायती, दृढ़व्रती, निर्माण-उन्मद,संत पुरुषों के कारण ही समाज की हम जैसी महिलाएँ आज शिक्षित-आत्मनिर्भर जीवन जी रही हैं। एक मई को अपनी लाइब्रेरी में संजोये उनकी डायरी के पृष्ठों को पढ़ा। एक अनिर्वचनीय ऊर्जा संचरित हुई।ऐसे समर्पित, निस्वार्थ व्यक्ति ही मारवाड़ी बालिका विद्यालय, शिक्षा यतन जैसे शिक्षा-संस्थान और भारतीय भाषा जैसी संस्थाओं का निर्माण कर इतिहास रचते हैं। ये संस्थान हमारे शैक्षणिक-साहित्यिक-सांस्कृतिक स्वास्थ्य का पैमाना हैं।

कोरोना काल में कई साहित्यकारों-कलाकारों ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया। इन खबरों ने मन को विचलित किया।रंगकर्मी उषा गांगुली खामोशी से चल दीं। उनके अमर नाटकों -कोर्टमार्शल, रुदाली, मैयत आदि ने शहर को समृद्ध -संस्कारित किया था। हमारी  पीढ़ी तो अनामिका, अदाकार और फिर रंगकर्मी के नाटकों को देखते-देखते युवा से प्रौढ़ हुई थी। संस्थाओं को पोषित करनेवाले स्मरणीय कवि नवल भी एक झटके में ही बिछुड़ गये। साहित्यकारों से संबंधित उनके व्यक्तिगत रविवारीय संस्मरणों ने,उनके एकल काव्य-पाठों ने शहर की साहित्यिक क्षुधा को शांत किया था। इन दोनों का जाना कोलकाता शहर को सूना कर गया और जब सुशांत सिंह राजपूत जैसे युवा कलाकार आत्महत्या करते हैं तो हम जैसे बुजुर्गों को पीड़ा होती है।अगर नेपोटिज्म की बात की जाये तो कौन सा साहित्य का क्षेत्र इस विषाणु से मुक्त है?कहाँ नहीं है?खैर, जो है सो है!

इस दुर्दिन में अम्फान तूफान ने हमारे बंगाल को रुला-रुलाकर छोड़ दिया-“एक करेला दूजा नीम चढ़ा।”इस भयावहता का ग्राफ चीन के घातक रवैये से और ऊपर चढ़ता चला जा रहा है। पर इन सबके साथ ही जीना है, जीने की अपनी-अपनी शैली तय करनी है।वक्त-बेवक्त मोबाइल का झुनझुना बजता रहता है, मैं भी बजाती रहती हूँ। इस दरमियान रिश्तेदारों-मित्रों, यहाँ तक कि पाताल में भी छुपे शुभचिंतकों ने हमारी खैर-खबर ली।पर मन है कि इन सबके बावजूद कभी-कभी कारण-अकारण उदास हो जाता है।ऐसे समय कबीर-तुलसी-रहीम के कुछ दोहे गुनगुना लेती हूँ ,बड़ा सुकून मिलता है।

 

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