कोरोना के भय के बीच बेहतर कल की उम्मीद से गुलजार हैं बाजार

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धनतेरस और दिवाली का बाजार गुलजार है। मंदी की शिकायत करते हुए व्यवसायियों से भी जब आप पिछले साल की बात करते हैं तो वे भी कह उठते हैं कि ‘बाजार तो पहले से ठीक है, देखिए उम्मीद है कि बिक्री बढ़ेगा।’ इसी उम्मीद के सहारे कोरोना की त्रासदी झेल ली गयी मगर यह भी याद रखना है कि महामारी को रोकने के लिए सावधानी जरूरी है। लोकल ट्रेन जब चली तो नियमों की धज्जियाँ उड़ते हम सब देख रहे हैं मगर भय तो है, और लोग सजग हो भी रहे हैं। यही कारण है कि हर दूरी दुकान के सामने ‘नो मास्क, नो इंट्री’ यानी मास्क के बगैर प्रवेश नहीं का बोर्ड आपको दिख ही जाता है लेकिन इस सावधानी के बीच कुछ लापरवाह लोग भी आपको दिख जाते हैं। बहरहाल धनतेरस और दिवाली के बाजार की पड़ताल करने जब हम निकले, तो बाजारों की गहमागहमी और भीड़…देखकर तो यही लग रहा था कि पुराना समय लौट आया…अजीब सी मनस्थिति थी…एक तरफ तो सामान्य सी परिस्थितियों को देखकर अन्दर से प्रसन्नता थी तो दूसरी तरफ खीज भी कि इतना सब कुछ होने के बाद भी लोगों को अपनी और दूसरों की चिन्ता नहीं है, कि वे मास्क के बगैर ही घूम रहे हैं।
सबसे पहले हम निकले टी बोर्ड के पास ब्रेबर्न रोड…के फुटपाथ पर जहाँ मोहम्मद अशफाक से हमारी मुलाकात हुई। इनकी दुकान पर मुख्य रूप से अल्यूमिनियम, स्टेनलेस स्टील के हर तरह के बर्तन हमें दिखे। इनमें बाजार के बेहतर होने की उम्मीद और बारिश का डर दोनों दिखा। थोड़ी दूर आगे जाने पर हमें मिले राजेश शाह। राजेश एक विद्यार्थी हैं जो अपना पारिवारिक व्यवसाय भी सम्भाल रहे हैं। युवाओं को देखना एक सन्तोष का भाव भर गया क्योंकि एक तरफ जहाँ डिग्री की होड़ में पारिवारिक काम से युवाओं के नाता तोड़ने का चलन आम बन गया है, वहीं उमेश चन्द्र कॉलेज के विद्यार्थी राजेश कॉलेज भी जाते हैं और काम भी सम्भाल रहे हैं। उनकी दुकान पर स्टेनलेस स्टील और लकड़ी के बर्तन दिखे।

इसके बाद राम मंदिर बाजार के दिवाली बाजार की तरफ जब निकलना हुआ तो गुप्ता स्टोर के शानदार दिवाली कलेक्शन पर हमारी नजर पड़ी जहाँ एक ही छत के नीचे सब कुछ दिखा। आलमारी सजाने के कागज से लेकर दीया, बन्दनवार, सब कुछ…और अलग -अलग डिजाइनों की बहुत अच्छी वैरायटी के साथ…25 रुपये से दीयों के गिफ्ट पैक की कीमत शुरू…यानी आप वाजिब कीमतों पर एक बढ़िया उपहार खरीद सकते हैं। बाजार में डिजाइनर दीयों की माँग बढ़ती ही जा रही है। एक दीया ऐसा था जिसकी परिकल्पना भा गयी। इस दीये में एक परिवार था और बीच में दीया था। इस बाजार में हर एक बजट के लिए कुछ न कुछ है और अगर आप भूखे हैं तो भी खाने के लिए बहुत कुछ है…चाट…फुचका….खैर …इस विषय पर फिर कभी विस्तार से बात करेंगे। यह दुकान 40 साल पुरानी है तो राम मंदिर की पुरानी दुकानों में एक नाम आता है गोपाल स्टोर का…। यह दुकान विद्यार्थियों और कला एवं हस्तशिल्प में रुचि रखने वालों की जरूरत हैं क्योंकि इसके लिए हर तरह की जरूरी चीजें मिलती हैं यानी जरी से लेकर मोती तक…हर तरह के रंगों से लेकर खूबसूरती बढ़ाने वाले प्रसाधनों तक। गोपाल स्टोर के संचालक प्रकाश गिनौड़िया ने पोस्टर रंगों से लेकर 10 रुपये के रंगीला कलर्स दिखाए…कोरोना से नुकसान हुआ है मगर उम्मीद सबकी कायम है।

जब बात पीतल के बर्तनों की हो रवीन्द्र सरणी स्थिल नूतन बाजार का इलाका हो आइए…कतार से पीतल के बर्तन दिखेंगे…पीतल की प्रतिमाएं भी। 25 हजार का दीया भी दिखा हमें और 1 हजार रुपये किलो की प्रतिमा की। महालक्ष्मी मंदिर के पास हमें दिखी,,,छुरी, चाकू की दुकान…जहाँ पर हँसुआ से लेकर त्रिशूल तक सब था। दुकान के संचालक से पता चला कि यह दुकान तब बनी थी जब कोलकाता में घोड़ा गाड़ी वाली ट्राम चलती थी। सारा सामान हाथ से बनाया जाता है। बहरहाल दुकान 90 साल पुरानी है और अपना कारखाना होने के कारण आपूर्ति को लेकर समस्या नहीं होती। 40 रुपये की छुरी से लेकर 300 रुपये का हँसुआ और हजारों तक कीमत जाती दिखी।

बिक्री कम हो रही थी…इसे लेकर छोटे व्यवसायियों में मायूसी तो है और अनमने भाव से ही वे काम कर भी रहे थे तो कुछ दुकानदार सपरिवार बैठे थे। राह चलते हुए बर्तनों का ढेर लगाए व्यवसायी दिखे तो बाजार खराब होने की शिकायत भी दिखी। 35 रुपये के चम्मच से लेकर 160 रुपये की थाली और 50 रुपये से शुरू होने वाले पीतल के बर्तन जो आप पूजा में इस्तेमाल कर सकते हैं। पीतल से बनी माँ काली और माँ लक्ष्मी की प्रतिमाओं की भारी माँग है। रवीन्द्र सरणी पर एक 200 साल पुरानी दुकान पर मुलाकात हुई सम्राट दास से…जो जादवपुर विश्वविद्यालय से पत्रकारिता और जनसंचार यानी जर्नलिज्म और मास कम्यूनिकेशन की पढ़ाई कर रहे हैं। नौकरी की सलाह मिलती है पर सम्राट अपने पारिवारिक पुश्तैनी व्यवसाय को आगे ले जाने की इच्छा रखते हैं। मेसर्स बीरेश्वर दास नामक इस दुकान पर बर्तन और देवी – देवताओं की प्रतिमाएँ दिखीं। सम्राट छठीं पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करते हैं।

वह बताते हैं कि एक ही साज – सज्जा की प्रतिमा अगर एक महीने के बाद खोजी जाये तो वह उपलब्ध नहीं होगी यानी प्रतिमाओं में नवीनता के लिए प्रयोग निरन्तर होते रहते हैं।
ठीक इसी तरह कुम्हारटोली में भी दीयों का बाजार बहुत पहले से सज उठा है और यहाँ के दीये कोलकाता के बाहर भी जाते हैं और स्थानीय स्तर पर बड़ाबाजार की दुकानों में भी आपको यह दीये मिलेंगे। बहरहाल बाजार इतिहास भी हैं और हम इन दोनों को आपके सामने लाते रहेंगे।

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