क्योंकि पुस्तकालय सिर्फ पुस्तकालय नहीं होते

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मुझे याद है कॉलेज के दिनों में पुस्तकालय एक सुकून भरी जगह होती थी, जहाँ से हटने का मन नहीं करता था । दिल उखड़ा हो या दिमाग..किताबों के पीछे सब कुछ भूल जाने की वजह होती थी । क्लास खत्म हो जाती, तब भी किसी न किसी बहाने से लाइब्रेरी कार्ड ठीक करने के लिए या किसी और काम से बहुत देर तक रुकी रहती थी । साल का दूसरा दिन किताबों के नाम रहता है और किताबें जहाँ संरक्षित की जाती हैं, वह जगह होती है पुस्तकालय…मगर क्या पुस्तकालय होते हैं…? हजारों पुस्तकों को सम्भालना, सहेजना और उसके पाठकों के जरिए समाज को समझना और जरूरत पड़ने पर सही भूमिका निभाना…आसान नहीं होता..मगर हम पुस्तकालयों को भी कमतर समझने की भूल करते हैं और पुस्तकाध्यक्ष यानी लाइब्रेरियन को भी..क्योंकि हमारे लिए वह ऐसी जगह है जो हमारी पहुँच में है और हम उसकी इज्जत करते हैं जो पहुँच के बाहर हो ।

इसी महीने वसंत पंचमी है और वसंत पंचमी के दिन ही शुभजिता (तब अपराजिता) की शुरुआत हुई थी…आज 7 साल हो गये हैं और 7 साल के बाद हम अपनी तरफ से छोटा सा योगदान देने का प्रयास करने को तत्पर हैं…उन लोगों को..जिनके योगदान का महत्व समझना बाकी है। इसी कड़ी में शुभ सृजन नेटवर्क की ओर से सृजन सारथी सम्मान प्रो. प्रेम शर्मा को प्रदान किया गया और युवाओं के अवदान को सामने रखने के उद्देश्य से आरम्भ किया जा रहा है..शुभजिता सृजन प्रहरी सम्मान ।

प्रथम शुभजिता सृजन प्रहरी सम्मान 2023  हम जिस व्यक्तित्व को सम्मानित करने जा रहे हैं…उनको सम्मानित करना अपने आप में स्वयं को सम्मानित करना है । हम सभी सृजन कर्म में रत हैं, पुस्तकें हमारा पाथेय हैं..जीवन की आधारशिला हैं और इनको संरक्षित करना एक बहुत बड़ा दायित्व है । पुरानी पुस्तकों के पीले पड़े पन्ने इतिहास सुनाते हैं । कहने का मतलब यह है कि पुस्तकें इतिहास की यात्रा हैं और पुस्तकों को संरक्षित करना इतिहास को, संस्कृति को, भाषा को, साहित्य को और जीवन को संरक्षित करना है । निश्चित रूप से यह आसान तो बिल्कुल नहीं है । पुस्तकालय आपको देखने में बहुत साधारण सी जगह शायद लग सकती है मगर असाधाराण सृजनात्मक क्षण यहीं पर जन्म लेते हैं । पुस्तकालयों का महत्व हमेशा से रहा है और सामाजिक क्रांति की मौम अभिव्यक्ति यहीं पर स्थान पाती है ।
हरिवंश राय बच्चन लिखते हैं कि मेल कराती मधुशाला मगर विनम्रतापूर्वक उनके इस कथन से असहमति है । मनुष्य का मेल आवश्यकता करवाती है और बाजार अपने आर्थिक सहयोग से उस आवश्यकता की पूर्ति करता है । बगैर आर्थिक शक्ति के सदुपयोग के समाज में सृजनात्मकता का संरक्षण सम्भव नहीं है और सृजनात्मकता का संरक्षण तभी होगा जब संस्थाएं अपने अस्तित्व के लिए आत्मनिर्भर बनेंगी । स्वतंत्र अभिव्यक्ति का उद्घोष उधार की वाणी से नहीं हो सकता और आत्मनिर्भरता का स्वर रोजगार से मुखरित होता है, जिसके लिए कौशल की आवश्यकता पड़ती है और वह कौशल, प्रशिक्षण आपको या तो शिक्षण संस्थान से मिलता है अथवा पुस्तकालयों से मिल सकता है । विशेष रूप से पुस्तकालय इसलिए महत्व रखते हैं क्योंकि आर्थिक विषमता यहाँ बाधा नहीं बनती और पुस्तकालय चाहे तो कौशल और प्रशिक्षण को प्रोत्साहित करके न सिर्फ युवाओं को आत्मनिर्भर बना सकते हैं बल्कि स्वयं भी आत्मनिर्भर बन सकते हैं और देश के विकास में योगदान दे सकते हैं । अधिक से अधिक कार्यक्षेत्रों में विशेष रूप से पुस्तक लेखन को प्रोत्साहित करके पुस्तकालयों की संख्या बढ़ाकर प्रशिक्षणमूलक, व्यक्तित्व विकास मूलक गतिविधियाँ संचालित कर युवा वर्ग को पुस्तकालयों के प्रति आकर्षित किया जा सकता है ।
सेठ सूरजमल जालान पुस्तकालय सिर्फ पुस्तकालय ही नहीं है, यहाँ एक शिक्षण संस्थान भी संचालित किया जाता रहा है और यहाँ पर पीढ़ियाँ बनती हैं और पुस्तकालय में आने वाले युवाओं को न सिर्फ शैक्षणिक अपितु मानसिक रूप से सम्बल देना, प्रोत्साहित करना उनको जीवन के रणक्षेत्र में खड़ा करता है और यही सामाजिक प्रगति का मार्ग है । पिछले लगभग 25 वर्षों से श्री तिवारी यही कार्य करते आ रहे हैं और बगैर किसी अपेक्षा के करते आ रहे हैं, अपने शब्दों से न जाने कितनों को इन्होंने भटकने से बचाया, न जाने कितनों को रोजगार पाने में, सामाजिक और पारिवारिक उलझनों से टकराने में सहायता की है, कभी अनुवाद से, कभी प्रूफ देखकर, कभी सम्पादन सहयोग से तो कभी सही परामर्श से न जाने कितने लेखकों को, पुस्तकों को अप्रकाशित रह जाने से बचाया । उन युवाओं से पूछिए कि उस परामर्श का कितना महत्व होता है जब जीवन में कोई हाथ पकड़ने वाला नहीं होता, जब बार – बार लगता है कि नहीं हो पा रहा और इतने में कोई आकर समाधान दे और कहे कि आगे बढ़ो…सब हो जाएगा ।

संवाद की परम्परा को बचाना, सृजन के उत्साह को बचाना, पुस्तकों को बचाना…यह एक साधारण सी कुर्सी पर बैठा व्यक्ति ही करता है जो देखा जाए तो किसी पद पर नहीं है, उसके पास कोई सत्ता नहीं है, वह संस्था या संगठन का सर्वेसर्वा भी नहीं है मगर वह है…वह आधार है..नींव की वह ईंट है जो दिखती नहीं है मगर जिसके बगैर सृजन के क्षेत्र के महल खड़े हो ही नहीं सकते । …राष्ट्र निर्माण में यही उनका बड़ा योगदान है । पुस्तकालय सिर्फ पुस्तकालय नहीं होते…यहाँ सिर्फ पुस्तकें ही नहीं होतीं..यहाँ देश का वर्तमान और भविष्य पलता है । मेरा आग्रह है तमाम पुस्तकालयों से कि अपना महत्व समझिए….और पूरे आत्मविश्वास के साथ देश के निर्माण को गति दीजिए ।
तिवारी जी को इस सम्मान को स्वीकृत करने के लिए आभार…आप सचमुच सृजन के प्रहरी हैं…अशेष मंगलकामनाएं…नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं आप सभी को…। बने रहिए हमारे साथ ।

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