खिचड़ी….देश को एक सूत्र में बाँधने वाला व्यंजन

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खिचड़ी के चार यार ,दही ,पापड़ ,घी और अचार’ और कही कही गुड़ भी। गुजरात की राम खिचड़ी बोलिए, महाराष्ट्र की वलाची खिचड़ी, आंध्रप्रदेश की कीमा खिचड़ी, कर्नाटक-तमिलनाडु की बेसीभिली भात या राजस्थान का खिचड़ा। सब कुछ मिलजुल कर खिचड़ी ही बनती है। राजस्थान में चावल कम और बाजरा ज्यादा का खिचड़ा तो सर्दियों का पकवान है।
खिचड़ी का इतिहास
माना जाता है कि खिचड़ी शब्द की उत्पत्ति संस्कृत के खिच्चा शब्द से हुई है. खिच्चा चावल और विभिन्न प्रकार की दाल से बनने वाला खाद्य पदार्थ होता है. खिचड़ी का इतिहास करीब ढाई हजार साल पुराना है. इंडिया करेंट्स नामक वेबसाइट के एक लेख के अनुसार ग्रीक राजदूत सेलुकस ने लिखा है कि इंडिया में चावल और दाल से बना खाद्य पदार्थ काफी लोकप्रिय है. पाकशास्त्री मानते हैं कि ये डिश खिचड़ी या उसका पूर्व रूप रही होगी. मोरक्को के सैलानी इब्न बतूता ने भी भारत में चावल और मूंग की दाल से बनने वाली खिचड़ी का उल्लेख किया है. इब्न बतूता सन् 1350 में भारत आया था. 15वीं सदी में भारत आने वाले रूसी यात्री अफानसी निकितीन ने भी भारतीय उपमहाद्वीप में लोकप्रिय खिचड़ी का जिक्र किया है
आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया के एक सर्वे में प्रमाण मिले हैं कि 1200 ईस्वी से पहले भारतीय लोग दाल-चावल को मिला कर खाया करते थे। इसके अलावा मगध के सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य के प्रधानमंत्री और कूटनीति के लिए विख्यात चाणक्य ने भी खिचड़ी को संतुलित आहार बताया है। चाणक्य के अनुसार एक भाग चावल, एक चौथाई भाग दाल, हल्का नमक और घी के साथ खिचड़ी खाना फायदेमंद होता है। खिचड़ी का सबसे पहला जिक्र आयुर्वेद में मिलता है। चरक संहिता में भी खिचड़ी का उल्लेख आता है। इसमें किशर शब्द से खिचड़ी निकला है। जिसको खाने के समय के बारे में कहा गया है कि, इसका उत्तम समय मकर संक्रांति के बाद शुरू होता है। इस समय देवयोग शुरू हो जाता है और खिचड़ी देवताओं को पसंद है। सूर्य का उत्तरायण होना उत्साह और ऊर्जा के संचारित होने का समय माना जाता है और खिचड़ी इंसानों के अंदर इसी उर्जा को प्रवाहित करती है। तमिलनाडु में इसे ‘पोंगल’ कहा जाता है। यहां ये चावल, मूंगदाल और दूध के साथ गुड़ डाल कर पकाया जाता है। तमिलनाडु में पोंगल सूर्य, इन्द्र देव, नई फ़सल और पशुओं को समर्पित एक त्योहार होता है।
पौराणिक इतिहास की बात करें तो इसमें जिक्र आता है कि, सबसे पहले भगवान शिव ने खिचड़ी बनाई थी और भगवान विष्णु ने इसे खाया था और इस भोजन को स्वादिष्ट के साथ ही सुपाच्य बताया था। लेकिन अगर इतिहास की बात करें तो आयुर्वेद के बाद खिचड़ी का जिक्र अच्छे तौर पर यूनान के शासक सिकंदर के सेनापति सेल्यूकस ने भी किया है। वहीं इब्नबतूता ने भी अपने यात्रा संस्मरणों में खिचड़ी का जिक्र किया है जिसमें उसने उस समय भारत में खिचड़ी को एक लोकप्रिय खाना बताया है। बतूता को मूंग की दाल वाली खिचड़ी खाने को मिली थी, जिसे उन्होंने स्वादिष्ट बताया था। वहीं पंद्रहवीं शताब्दी में भारत आए रूसी यात्री अफानसीनि निकेतिन ने भी खिचड़ी का जिक्र किया है। वहीं ‘आइने—ए—अकबरी’ में भी अबुल फजल ने खिचड़ी का जिक्र किया है और उसने सात तरह से खिचड़ी बनाने के तरीके भी बताएं हैं।
कहा जाता है कि, अकबर के बेटे जहांगीर को खिचड़ी बहुत पसंद थी। उसी समय से शाहजहांनी खिचड़ी का भी चलन चलता आ रहा है। उसने इसे लाजवाब कहा था। उसके मुगल दस्तरख्वान में खिचड़ी को अहम स्थान हासिल था। हालांकि उसकी खिचड़ी में सूखे फल, सूखे मेवे, केसर, तेजपत्ता, जावित्री लौंग का भी इस्तेमाल होता था। इस दौर में यह व्यंजन मांसाहारी हो गया जिसे हलीम नाम दे दिया गया।
नाथ परंपरा से जुड़ा है खिचड़ी का इतिहास
खिचड़ी को लेकर मकरसक्रांति का पर्व भी मनाया जाता है। इस पर्व का सबसे ज्यादा महत्व नाथ संप्रदाय के बीच देखने को मिलता है। कहा जाता है कि खिचड़ी को सबसे ज्यादा लोकप्रिय नाथों ने ही बनाया है। लोकमान्यता के मुताबिक खिलजी ने जब भारत पर आक्रमण किया था उस समय नाथ योगियों ने उसका डटकर मुकाबला किया। इस दौरान उन्हें भोजन पकाने का समय नहीं मिलता था और भूखे रहना पड़ता था। नतीजतन, नाथ संप्रदाय के बाबा गोरखनाथ ने दाल, चावल और सब्जी को एक साथ पकाने का यह नुस्खा निकाला। इसीलिए इस संप्रदाय के मठों और मंदिरों पर खिचड़ी का पर्व बहुत उल्लास से मनाया जाता है।
खिचड़ी चावल और विभिन्न प्रकार की दाल से बनने वाला भोजन होता है। कई जगहों पर बाजरा और मूंगदाल के साथ भी इसे पकाया जाता है। खिचड़ी कई मायनों में खास है। यह वह डिश है जिसे हर बच्चे को आसानी से यानी बिना किसी दिक्कत के खिलाया जा सकता है और इसी वजह से इसे फर्स्ट सॉलिड बेबी फूड भी कहा जाता है। व्रत के दौरान साबूदाने से बनाई गयी खिचड़ी भी खाई जाती है।
फायदे
खिचड़ी एक आयुर्वेदिक आहार है। इसे नियमित खाने से वात्त, पित्त और कफ की समस्या नहीं होती। वहीं ये शरीर को डिटॉक्स करने के साथ-साथ एनर्जी लेवल बढ़ाने और इम्युनिटी को सुधारने में भी मदद करता है। ये जितनी स्वादिष्ट होती है उतनी ही पोषण से भरपूर भी। यह शरीर को पोषक उर्जा और पोषण देने का काम करती है। खिचड़ी में आमतौर पर ज्यादा मसालों का प्रयोग नहीं किया जाता, यही कारण है कि, खिचड़ी हमेशा से एक सेहत के लिए उत्तम आहार मानी जाती रही है। आयुर्वेद बताता है कि यह फूड हमारी आंत और पेट के लिए बहुत फायदेमंद चीज है। गर्भावस्था के दौरान अक्सर महिलाओं को कब्ज या अपच की दिक्कत होती है। वहीं बाहर का खाना ज्यादा खाने से भी लोगों के पेट में यह समस्या हो जाती है। लेकिन इस सब का इलाज खिचड़ी है। खिचड़ी मूड सही करने के लिए भी सबसे सही भोजन माना जाता है।
उत्तराखंड की पहाड़ी खिचड़ी ज्यादातर सादी होती है। यह खिचड़ी प्रसाद के रूप में जानी जाती है. यहां के ब्रदीनाथ मंदिर समेत कई जगह प्रसाद के रूप में खिचड़ी दी जाती है। इसे सीधे पानी में उबाल कर बनाया जाता है और प्रसाद के रूप में बांटा जाता है।
वही हिमाचल प्रदेश में दाल चावल के साथ कुछ राजमा और सफ़ेद छोले डालकर खिचड़ी बनायीं जाती है. इसका स्वाद राजमा और सफ़ेद छोले, के साथ कुछ स्थानीय मसाले के मिश्रण के साथ अलग ही लगता है।

उत्तर प्रदेश के व्यंजनों में आवला का प्रयोग किया जाता है तो यहाँ की खिचड़ी में काली दाल, चावल के साथ आवला का प्रयोग कर विशेष खिचड़ी बनायीं जाती है और ये मकर संक्रांति के त्यौहार पर दान में भी दी जाती है।
राजस्थान राज्य अपने शाही खाने के लिए काफी जाना जाता है, तो ऐसा कैसे हो सकता है की आपको राजस्थान में खिचड़ी का स्वाद न मिले. यही की खिचड़ी दाल, गेहू और बाजरा की बनती है और इसकी विशेषता ये है इससे बहुत अच्छे से पकाया जाता है और ये काफी गरम तासीर की होती है और ये सर्दियों में राजस्थानी सब घरो में मिलती है।
अब आते है गुजरात की खिचड़ी पर, इसमें खासतौर से हल्दी और हींग का प्रयोग किया जाता है। गुजरात की खिचड़ी आमतौर पर पतली बनायीं जाती है और ज्यादातर कढ़ी और सुराती उंधनिया आदि के साथ परोसी जाती है।
महाराष्ट्र में साबूदाने की खिचड़ी प्रसिद्ध हैं। मुंबई महानगरी में खिचड़ी बहुत ही मसालेदार बनती है और लोग उससे काफी उत्साह से कहते है और इससे भी लजीज खाने में गिनते है. यहां के लोग तीखी खिचड़ी खाते हैं। यही साबूदाने की खिचड़ी उत्तर भारत में ज्यादातर व्रत के दौरान भी बनाई और खायी जाती है।
तमिलनाडु में मीठी खिचड़ी बनाई जाती है और इससे पोंगल कहा जाता है। इस खिचड़ी का बहुत महत्व है, और इसकी खासियत है कि इसे नमकीन भी बनाया जा सकता है। मीठी खिचड़ी यहां के मंदिरों में प्रसाद के रूप में बांटी जाती है।
आंध्र प्रदेश में कीमा खिचड़ी खाई जाती हैं। जिसमें ग्राउंड बीफ, चावल, दाल, सॉस के साथ इमली और तिल का मिश्रण होता है। और कई जगह लोग इसमें दाल का प्रयोग नहीं करते हैं।
कर्ऩाटक में खिचड़ी सब्जियों से भरपूर होती है। यहां की खिचड़ी में इमली, गुड़, मौसमी सब्जियां, कढ़ी पत्ता, सूखे नारियल का बुरादा और सेमल की रुई का इस्तेमाल किया जाता है। और ये काफी मज़ेदार होती है।
बंगाल में खिचड़ी का विशेष स्थान रूप है. और ये दुर्गा पूजा में भोग के रूप में प्रसाद में दी जाती है, जो तैयार होती है दाल, चावल और विभिन्न सब्जियों से. यहां की खिचड़ी मीठी होती हैं। बिहार की खिचड़ी सब्जियों और मसालों से भरपूर होती है। आमतौर पर शनिवार को इसे बनाया जाता है।
(स्त्रोत साभार – आउटलुक हिन्दी, द इंडियननेस डॉट कॉम, रिलीजन वर्ल्ड डॉट इन, द्वारका एक्सप्रेस)

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