गणतंत्र दिवस विशेष – समारोह की कुछ स्मृतियाँ

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गणंतत्र दिवस के इतिहास में ऐसे कई रोचक तथ्य मौजूद हैं। पहली परेड जहां एकदम सादगी भरी और छोटी थी, वहीं बाद में देश के राजे−रजवाड़ों की शैली में हाथी−घोड़ों और गाजे−बाजे को इसमें शामिल किया गया। बाद के वर्षों में देश की सांस्कृतिक विविधता की झलक इसका एक प्रमुख आकर्षण बन गयी। राष्ट्रीय संग्रहालय के पूर्व संग्रहलयाध्यक्ष आईडी माथुर से जब हमने परेड के अतीत के बारे में जानने की कोशिश की, तो उन्होंने बताया, ”जब देश संप्रभु लोकतांत्रिक गणराज्य घोषित हुआ तो यहां भी दूसरे देशों की तरह परेड निकालने का सिलसिला शुरू करने की बात सोची गयी। दिलचस्प यह था कि पहली परेड में तत्कालीन नवनियुक्त प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद बग्घी में बैठकर आये और राजपथ से गुजरे।”

माथुर ने कहा, ”लेकिन पहली परेड से लोगों को कुछ निराशा हुई। हालांकि, देश के गणतंत्र बनने के जश्न में नागरिकों को शामिल करने के सरकार के इरादे में कुछ गलत नहीं था। असल में लोगों को यह उम्मीद थी कि आजादी के समय तक देश में मौजूद रही रियासतों की राजे−रजवाड़े वाली शान (ओ) शौकत और शाही लवाजमा परेड में नजर आयेगा। पहली परेड देखने इकट्ठा हुई जनता हाथी−घोड़े और सैन्य शक्ति के प्रदर्शन को देखना चाहती थी।”

उन्होंने कहा, ”लेकिन सरकार ने जनता का मिजाज़ भांप लिया। अगले वर्ष से परेड में हाथी, घोड़ों और शाही अंदाज वाली पलटनों को शामिल कर लिया गया। सरकार ने यह घोषित किया कि परेड राजपथ से निकल कर लाल किले तक जायेगी और इसमें दिल्ली के आसपास के स्कूली बच्चे भाग लेंगे। इस पर भी सरकार की कुछ आलोचना हुई क्योंकि स्कूली बच्चों के लिये सेना के जवानों की तरह इतनी लंबी दूरी तय करना आसान नहीं था।”

माथुर ने कहा, ”बाद में सरकार ने इसमें संशोधन किया और बच्चों की परेड इंडिया गेट तक खत्म कर दी। बाद के वर्षों में परेड में कई तरह के बदलाव हुए और झांकियां जोड़ी जाने लगीं। राष्ट्रीय पर्व को एक जलसे में तब्दील करना इसका मकसद बन गया।” गणतंत्र दिवस परेड के लिये लगातार 47 बार हिंदी कमेंट्री कर चुके जसदेव सिंह बताते हैं, ”पहले के दौर में जनता में जोश ज्यादा नजर आता था। लोग अलसुबह पांच बजे से ही कड़ाके की ठंड और घने कोहरे में इंडिया गेट के आसपास इकट्ठा होने लगते थे। परेड के शुरूआती वर्षों में सुरक्षा कड़ी नहीं हुआ करती थी, इसलिये लोग बड़ी तादाद में जुटते थे।”

सिंह ने बताया, ”चीन युद्ध के बाद राष्ट्र भावना प्रबल थी। 1963 की गणतंत्र दिवस की परेड में दिलचस्प यह हुआ कि सैन्य टुकड़ियों के मार्च के साथ तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित नेहरू भी सांसदों के एक दल की अगुवाई करते हुए राजपथ पर चलते नजर आये। इस दृश्य ने लोगों को जोश से भर दिया।” वह बताते हैं, ”लोगों में लाल बहादुर शास्त्री और इंदिरा गांधी जैसे तत्कालीन प्रधानमंत्रियों को परेड में एक नजर देखने का काफी उत्साह रहता था।

दूरदर्शन शुरू होने के बाद भी गणतंत्र दिवस की परेड देखने के प्रति लोगों के जोश में कमी नहीं आयी। सांस्कृतिक झलक पेश करती झांकियों और वायुसेना के मार्च ने परेड के प्रति खासकर बच्चों का उत्साह बढ़ा दिया।” बारह सैन्य पदक प्राप्त मेजर (सेवानिवृत्त) केएस सक्सेना बताते हैं, ”परेड के मामले में यह स्वीकार करना होगा कि शुरूआती वर्षों में इसका अंदाज कुछ ‘गरीबाना’ था। बहरहाल, यह भी काबिले गौर और काबिले तारीफ है कि बाद के सालों में इसमें काफी चमक आयी।”

वर्ष 1971 में पाकिस्तान के साथ हुए युद्ध के बाद के दौर को याद करते हुए उन्होंने कहा, ”इस युद्ध के बाद हुई परेड में हमने खास तौर पर आम लोगों में काफी उत्साह देखा था। सेना ने जब परेड में मार्च किया तो लोगों ने जवानों की काफी हौसला अफजाई की थी।” उन्होंने कहा कि यह देश के लगातार तीन युद्ध का सामना करने का ही नतीजा था कि सरकार ने 1971 के बाद गणतंत्र दिवस परेड में सैन्य शक्ति के प्रदर्शन को और तेज किया तथा एनसीसी कैडेट्स की भागीदारी को बढ़ा दिया।

(साभार – प्रभा साक्षी)

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