गाँव का मजदूर

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  • बब्बन

बचपन की किलकारी,
माता पिता के गोद में गुजारी।
पढ़ने-खेलने की उम्र मे,
उसपर आ गई भूख की जिम्मेदारी।

गाँव की पगडंडियों पर जवानी पाकर,
बूढ़े होते माँ बाप के हालात पर तरस खाकर,
चूल्हा बुझने से बचाने के लिए,
दो जून की रोटी कमाने के लिए,
एक नौजवान सारे सपने तोड़कर,
जन्म स्थान की गलियों से मुंह मोड़कर,
पढ़कर बड़ा बनने के ख्वाब को देकर कुर्बानी,
लेकर ताकतवर शरीर व चढ़ती जवानी।
जा पहुँचता है चकाचौंध शहर में,
अमृत लेबल लगी बोतल के जहर में।

वह नंगा रहकर फुटपाथ पर सोता है,
प्रतिपल अपने हसरतों का जनाजा ढ़ोता है।
हाड़तोड़ मिहनत से ऊँची बिल्डिंग बनाता है।
चौबीस ईंटें सर पर रखकर, आठवीं मंजिल पर चढ़ाता हैं।
आधी खुराक खाकर, आधी परिवार के लिए बचाता है।
वह आँसू पीता है, गम खाता है।
अपने बच्चों को सपने में बुलाता है,
उनकी किलकारी सुनता है, लोरी गाता है।

मालिक इसकी पूरी मजदूरी नहीं चुकाता है।
काम पूरा होने पर, हिसाब करना बताता है।
लेकिन जब काम पूरा हो जाता है,
तो माफिया ठेकेदार शेष मजदूरी हड़पकर,
धमकी देकर फरार हो जाता है।

फिर अपनी किस्मत को कोसकर,
सिसकारी भरकर, मन मसोसकर,
अपनी क्षुधा मिटाने को,
ढ़ूढ़ता है फिर नये ठिकाने को।

वहाँ भी ऐसे ही चलता है,
मुकद्दर का कालचक्र,
मजदूर की जवानी ढ़ल जाती है,
पेट धँस जाता है, पीठ हो जाती है वक्र।
वह फिर असाध्य रोगों का,
असमय शिकार हो जाता है।
खाली हाथ अपने गाँव लौट कर,
अपनी मिट्टी में निसार हो जाता है।

फिर अगली पीढ़ी के लिए यही
व्यवस्था जारी है।
जवानी पूँजीपतियों की गुलामी के लिए,
करती अनवरत तैयारी है।

यह उत्तर भारत के
हर गांव की कहानी है।
मायूस बचपन, असहाय बुढ़ापा,
और शोषित जवानी है।

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