गीत – समय कविता संग्रह को पढ़ते हुए

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– डॉ. वसुंधरा मिश्र

प्रसिद्ध गीतकार और रचनाकार किशन दाधीच के सद्य प्रकाशित कविता संग्रह गीत समय को पढ़ते हुए भारत की काव्यात्मक यात्रा को समझने का मौका मिला। गत छह दशकों से लिख रहे किशन दाधीच ने वर्तमान समय की सामाजिक और राजनीतिक स्थितियों की संवेदनशीलता को गहराई से महसूस किया है। यही कारण है कि गीत – समय में कविताओं की श्रृंखला पूरे चित्रों को पाठक के मन मस्तिष्क में अंकित कर देती हैं।
लोककलाविद् साहित्यकार एवं उदयपुर लोककला मंडल के पूर्व निदेशक डॉ महेंद्र भानावत का कहना है कि किशन दाधीच ने अपना गेज नहीं बदला है। डॉ संगम मिश्र सेंट्रल अकादमी संस्थान उदयपुर में चेयरमैन हैं, उनका कहना है कि स्वान्तः सुखाय जीने वाले किशन दाधीच उनके प्रिय कवि हैं। उनको सुनना अच्छा लगता है।
महाकवि सूर्य मल्ल मिश्रण के प्रति उनकी कविता ‘तुम सती के आचमन’ की ये पंक्तियाँ – – –
आँधियों को स्वर दिया
अभियान गीतों का तुम्हीं ने
बिजलियों के पाँव बाँधे
सृजन के घुंघुरुँ तुम्हीं ने।
— – – – – –
तुम प्रणय के चिर क्षणों में
अर्चना की इक घड़ी हो (पृष्ठ 95-96)
कवि धरती पर निःसहाय लोगों के लिए गीत गाता है। उसका गीत जनयुद्ध है वह इसका स्वयं साक्षी है – – –
मनुष्य के संघर्ष को
काटने वाले सत्य का
साक्षी रहूँगा मैं
क्योंकि इस जनयुद्ध में
संजय की भूमिका
तुम्हारी नहीं मेरी है।( पृष्ठ 100)
कवि भारत की धरती पर होने वाले मनुष्य और मानवता के संबंधों और उनके संघर्षों के साक्षी हैं। इतने लंबे समय को कवि ने स्वयं से साझा किया है।
‘गीत – समय’ का प्रकाशन कोरोना काल में आने के पीछे भी कवि की सकारात्मक सोच और भाव हैं। यह सच है कि नवगीत जिस पीढ़ी के हाथों निर्मित होने के उपक्रम में था, वह थी आजादी के बाद की पहली नौजवान पीढ़ी जो गाँव के नैसर्गिक और अर्जित संस्कारों से हिम्मत और हौसला ही नहीं, मानवीयता की अटूट पहचान लेकर छोटे- बड़े शहरों में आई और आजाद देश की नयी संभावनाओं से अपनी परिवर्तनकारी महत्वाकांक्षाओं को जोड़कर संघर्ष की धूप- धूल से लड़ती हुई जीने लगी। स्वभावतः और रहन- सहन के बदलाव की अनवरत लड़ाई में, कभी उस पीढ़ी का सदस्य शहरी एकांत में ग्रामीण नागर मानस का साक्षात्कार करता रहा।
किशन दाधीच की काव्य यात्रा आत्मविश्वास से पूर्ण और अटूट हौसला देने वाली है। उनकी रचनाधर्मिता परंपरागत लीक से हटकर रचना कर्म करने की प्रक्रिया है। वीरेंद्र मिश्र, रामदरश मिश्र, रामनरेश पाठक, रवींद्र भ्रमर आदि गीतकार की लंबी श्रृंखला रही है। किशन दाधीच उसी श्रृंखला के फूल हैं जिनकी खुशबू समाज की दकियानूसी परंपराओं को नकारते हुए आती है।
जनसंघर्ष की अनिवार्य परिस्थितियों और राजनीति की रणनीतियों के साक्षी रहे किशन जी ने अपने विचारों को कविता और गीतों के माध्यम से समाज के प्रति अपने दायित्व को सक्रिय रुप से शब्दों में पिरोया है। नवगीत का स्वभाव जनबोध से ही जुड़ा हुआ है।उनका मानना है कि गीत ही वह विधा है जो कवि और जन मानस के भाव, लय के आधार पर खड़ी होती है, विचारधाराओं के उत्साह मात्र के आधार पर नहीं। आम आदमी की मानसिकता को आंदोलन या नारे से भरे गीत नहीं बल्कि व्यक्तिगत, पारिवारिक और सामूहिक व्यवहार के गीत ही बदल सकते हैं। कवि ने कविता मजदूरों के गीत कविता में
, दर्द फिर जुलूस हो गया कविता में कवि का कहना है कि
– – लोग फिर मारे गए हैं प्रार्थना करते हुए
जो खबर के न हुए
बहरे वातायन। प्रश्न वाचक हो गए
चर्खियों की चाल पर आदि आदि कविताएँ आम आदमी के संत्रास की कथा ही कहती हैं। गा सकूँ मैं जिन्दगी को, मैंने बुना गीत का बाना, भोर की तलाश में आदि कविताएँ आशावादी हैं।
बाहर भीतर का आदमी, सूर्य नगर का मौन, अध कतरा दिन आदि कविताओं में द्वंद्वात्मक चित्रों को उकेरनी वाली हैं। दबे पाँव चलता है सूरज, सूर्य मुखी का भोर पत्र कविता में आशा की किरणें हैं।
डॉ लोहिया के प्रति कवि ने लिखा है – – –
आहत है, कोई नायक जो
समाज के उत्थान के लिए
निरंतर कार्य करता रहा
जो अधूरा रहा।
अज्ञेय ने मानवीय व्यक्तित्व की व्याख्या में भाषा को अनिवार्य तत्व माना है। वे भाषा को माध्यम नहीं, अनुभूति मानते हैं। अच्छी भाषा वे उसे ही मानते हैं जो भाषा और अनुभूति के अद्वैत को स्थापित करे। कवि किशन की भाषा में अनुभूति का जबर्दस्त बंधन है जो आम आदमी से जुड़ा हुआ है।
कवि उस दौर से भी गुजरे हैं जब नयी कविता और वामपंथी धारा की कविताएँ भी परिवर्तन की प्रक्रिया में थीं और जनवादी कविताओं में जनजीवन की विभिन्न परिस्थितियों और विषयों को शब्दबद्ध किया जा रहा था। वर्ग संघर्ष, वर्ग हितों की पड़ताल, चरित्रालोचन, व्यवस्था का पर्दाफाश और व्यापक तौर पर समाजवादी यथार्थवादी दृष्टि से जनसंघर्ष की वास्तविक अवस्थाओं और प्रक्रियाओं से जुड़ी संरचनाएँ आ रही थीं। कवि मानते हैं कि गीत मनुष्य की संवेदना से जुड़ा उसके नैसर्गिक स्वभाव का एक महत्वपूर्ण अंग है जो हर युग में मनुष्य को सींचता रहता है। कवि किशन के गीत की भाषा नव आधुनिक और स्वयं विकसित शैली शिल्प की विविध लहरें हैं जिसमें उतार- चढा़व और सभ्यता, संस्कृति, परंपराओं के सुदृढ़ तट भी हैं। वे स्वयं ‘आत्मकथ्य ‘में लिखते हैं – – गीत भारतीय काव्य की प्रमुख पहचान है। कवि की नैतिक जिम्मेदारी है कि वह समाज में संस्कारों की प्रतिष्ठा करे और निर्माण की प्रक्रिया को तेज करे। पृष्ठ 18
कविता उसके लिए ‘महज एक शौक नहीं, अस्मिता की रक्षा करने के लिए वह वचनबद्ध है। इक्कीसवीं सदी में यंत्रवत होती जा रही जिन्दगी में रस को बचाए रखने की शक्ति केवल गीत में है। (पृष्ठ 20) ।
रचना के प्रति प्रतिबद्ध कवि अपनी चालीस कविताओं के संग्रह’ गीत- समय’ में सभी युवागीतकारों और कवियों को संदेश भी देते हैं क्योंकि उनका मानना है कि आज भी हमारी लडा़ई जारी है।
गीत – समय में तीन लंबी गीतात्मक स्वभाव की लंबी कविताएँ हैं जिसमें लड़ते हुए आदमी की छवि है जो लगातार लड़कर बुराई और अन्याय, अत्याचार का प्रतिकार करता आया है। यहीं से पाठक अंधकार और उजाले के साथ परिचय करता है और वर्तमान समय की सच्चाई को उजागर करता है।
गीत- समय का कवि मूलतः प्रगतिशील विचारों से अनुप्रेरित रहा है। समाज के वर्ग, जाति और धर्मगत भेदों से ऊपर उठकर समानता का दम भरते रहे हैं। उनके गीत सामाजिक त्रास और विषमताओं के विरुध्द चेतावनी के गीत हैं, उन सारी शक्तियों के विरुध्द है जो लोकतंत्र का मुखौटा पहनकर ‘फासीवाद ‘का प्रचार करती हैं। (पृष्ठ 9) पहली कविता का शीर्षक ‘प्रश्न – मयी दोपहरी’ जीवन की इस लंबी यात्रा पर ही प्रश्न उठाती है –
टंके हुए कितने भ्रम
जिन्दगी मिली हमको
यातना शिविर जैसी
गूंगों का मुक्ति बोध शाही ख्ययाम नहीं। (पृष्ठ 26)
कवि स्वयं नीलकंठ है, वह चुनौतियों का सामना करता है –
हम नीलकंठ हैं
गरल हमी से हारा है
हमने छूकर पाषाणों को स्वप्न दिए हैं
हम सागर की गहराई का राज लिए हैं
फिर क्यों गुदले पानी में नावें छोड़ रहे हैं
नई राह पर
स्वर्ण पुरातन
गवां दिया हमने।।( पृष्ठ 73)
कवि के विषय में वरिष्ठ साहित्यकार जीवन सिंह ने स्पष्ट लिखा है कि किशन दाधीच अपनी प्रतिबद्धता को नहीं छिपाते। उनका एक गीत ‘गीत की गाँव तक पद यात्रा’ यह पद यात्रा ही उनके साहित्यकार की प्रतिबद्धता है। – – जिस बूंदी से किशन दाधीच का रिश्ता पिछली सदी के आठवें दशक तक रहा जो उनकी पैतृक नगरी है और बूंदी एक कस्बा जैसा ही था। बूंदी साहित्यक ऊर्जा की धरती रही है जहांँ साहित्यकारों, कवियों, पत्रकारों का तीर्थ स्थल है। पत्रकार लज्जा राम मेहता,ऋषि दत्त मेहता, भाषाविद् डॉ भोलाशंकर व्यास,शहीद रामकल्याण आदि की कीर्ति गाथा अंकित है। उनकी संवेदनशीलता से भरे गीत बूंदी से होकर ही आते हैं ।कवि किशन दाधीच शहरी सदी को आंकड़े की सदी कहते हैं। – – – गीत के माध्यम से इस समाज के उबड़ खाबड़ यथार्थ को व्यक्त करना बहुत कठिन है लेकिन कवि ने गीत के माध्यम से यह काम बहुत सलीके से किया है।( पृष्ठ 15) मानवता के विकास और उन्नति के लिए कवि के लिए जो गीत रचनाएँ की हैं उसे मनुष्य का मन मस्तिष्क सहज ही अपना लेता है।
गीत – समय काव्य संग्रह कवि का पहला काव्य संग्रह है। नई दिल्ली और हैदराबाद के प्रसिद्ध प्रकाशन नीलकमल पब्लिकेशन के सुरेशचंद्र शर्मा द्वारा प्रकाशित किया गया है । कीमत 300 रुपये हैं। प्रथम संस्करण है जो 2021 में आया है। पुस्तक का आवरण डॉ श्रीनिवास अय्यर द्वारा अंकित किया गया है जो कलम की कहानी में निहित रस- रंग और संगीत की स्वर लहरी का आह्वान करते हैं।
अभी भी हम भरोसा कर सकते हैं कविताओं पर, साहित्य पर जो समाज में सकारात्मक ऊर्जा और आशा की किरणें जगाती हैं।

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