गृहिणी

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  • दीपा गुप्ता

बिना रुके बिना थके
हर दिन करती वो काम
एक ही समय पर रुप अगल
मां बहू बीवी के उसके
फर्ज निभाती सब वो अपने
जिम्मेदारियों से कभी न भागे
मुंह मोड़कर वो अपने
हजारों कामों के बीच भी
सबकी छोटी बड़ी जरुरतों का
रहता उसे अच्छे से ख्याल
फिर भी उसकी जरा सी गलती पर
चीखने चिल्लाने लगते हम

सबके ख्वाहिशों को पूरा करने में
रहे जाते उसके ही अरमान अधूरे
अपनों के ही फिक्र में
निकल जाती उसकी आधी जिंदगी
सबके रंग में रंगतें रंगतें
भूल जाती वो अपने रंग को ही
पूछ ले कोई उससे उसकी पहचान
पल भर के लिए कहीं वो खो जाती
उसके बाद भी
बिना किसी शिकायत के
चेहरे पर मुस्कान के साथ
दिनभर करती वो काम
फिर भी हम सुनाते उसे
घर पर रहकर करती क्या हो तुम?

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