छठ पूजा विशेष : करते हैं ठेकुआ की बात

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छठ मतलब एक ऐसा पर्व जिसमें सभी भेदभाव समाप्त हो जाते हैं, हर घर से भीनी खुशबू आनी शुरू हो जाती है। गांव से जुड़े इस महापर्व में भी अब आधुनिकता का रंग चढ़ने लगा है, विभिन्न तरीके के प्रसाद बनाए जाने लगे हैं लेकिन आज भी एक प्रसाद कॉमन है और वह है ठेकुआ। ठेकुआ एक ऐसा प्रसाद है जो हर अमीर से अमीर और गरीब से गरीब घरों में छठ में बनाकर सूर्यदेव और छठी मैया को चढ़ाया जाता है। सोमवार को ठेकुआ बनाने के लिए गेहूं सुखाने जब तमाम छतों पर महिलाएं जुटी तो लोकगीतों के लय ने अमीर-गरीब और ऊंच-नीच के तमाम भेदभाव मिट गए।

कृषि से जुड़ा है छठ पर्व का हर तार
चार दिवसीय छठ में वैसे तो कई प्रसाद चढ़ाए जाते हैं लेकिन ठेकुए का अलग महत्व है। ठेकुआ गुड़ व आटे से बनता है। यह समय गन्ने के काटने का होता है और गन्ने से गुड़ बनता है। बताया जाता है कि छठ के साथ ही सर्दी के मौसम की शुरुआत हो जाती है। ऐसे में ठंड से बचने और स्वस्थ रहने के लिए गुड़ फायदेमंद होता है। इस चलते ठेकुआ चढ़ाने की पंरपरा है। प्रसाद बनाने के लिए गेंहूं की सफाई की जाती है, इसलिए इस पर्व को श्रम से भी जोड़ा जाता है और आज हम जानेंगे ठेकुआ के बारे में, जिसे हम महाप्रसाद भी कहते हैं।

यहाँ हुई ठेकुआ की शुरूआत 

ठेकुआ बनाने की शुरूआत कहां से हुई और किसने की इसके बारे में ठीक से पता कर पाना थोड़ा कठिन है। लेकिन ऐसा माना जाता है कि यह बिहार के सालों पहले रहें ‘हथ्वा राजवंश’ की रसोई से निकला ये एक शाही पकवान है। जिसे प्राचीन काल में ‘हथ्वा राजवंश’ की रसोई में ही बनाया जाता था।

इसलिए पड़ा ऐसा नाम

ठेकुआ खानें में जितना स्वादिष्ट है अपने नाम को लेकर भी ये उतना ही अनोखा है। जानकार लोग बताते हैं कि इसका नाम ठेकुआ इसलिए रखा गया क्योंकि इसे बनाने से पहले सही एवं सुंदर रूप दिया जाता है। ऐसा करने के लिए इसे पत्थर या लकड़ी के बने एक सांचे में रखकर हाथों से ठोका जाता है। जिस कारण इसका नाम ‘ठेकुआ’ पड़ गया।

 ये ‘छठ’ का मुख्य प्रसाद है

ठेकुआ ‘छठ’ का मुख्य प्रसाद है। लेकिन ऐसा क्यों है? ये शायद हम नहीं जानते। यहाँ आपको ये बताना आवश्यक है कि ये ‘छठ’ का मुख्य प्रसाद इसलिए है क्योंकि भगवान सूर्य को चढ़ाए जाने वाली दान सामग्री में गेंहू और गुड़ दोनो का विशेष महत्व है। गेंहू और गुड़ को सामान्यता भी सूर्य के दान की वस्तुएं माना जाता है। इसलिए इससे बने खास पकवान ‘ठेकुआ’ को ‘छठ’ में प्रसाद स्वरूप भगवान भास्कर को अर्पित किया जाता है।
ठेकुआ आया कहां से?
इसे लेकर कई मान्यताएं हैं। कहा जाता है कि ठेकुआ नाम ‘ठुका’ से पड़ा, क्योंकि इसका आटा सख्त गूंथा जाता है और उसे शेप देने के लिए हथेली से खूब पीटा जाता है। ठेकुआ की उत्पत्ति आटे के तले हुए स्नैक्स बनाने की परंपरा से भी जुड़ी हुई बताई जाती है। जगन्नाथपुरी में मीठी मठरी से लेकर खाजा तक सूखे प्रसाद के रूप में बांटे जाते हैं। आटा, चीनी और घी से बने ये प्रसाद भी इसी परंपरा का हिस्सा हैं। हालांकि, अब भारत में मिलने वाले आटे के ज्यादातर फ्राइड स्नैक मैदा या रिफाइन आटे के होते हैं। लेकिन बिना रिफाइन किए गेहूं से बना ठेकुआ न सिर्फ काफी पुरानी रेसिपी है, बल्कि यह मैदा या सूजी से बने पकवानों से कहीं ज्यादा हेल्दी है।

इन नामों से भी जाना जाता है ठेकुआ
खजुरिया या ठिकारी के नाम से भी जाना जाने वाला ठेकुआ जिसे छठ के दूसरे दिन यानी खरना के दिन आधी रात में या सुबह में बनाया जाता है। यह बिहार के साथ-साथ यूपी, मध्य प्रदेश, झारखंड इत्यादि राज्यों में भी प्रसिद्ध है। खजूरिया और ठेकुआ में बस थोड़ा सा का अंतर होता है। ठेकुआ खाने में नरम होता है जो गुड़ में बनाया जाता है और खजुरिया थोड़ा-सा ठोस होता है जो चीनी में बनाया जाता है। इसे बनाने के काफ़ी दिनों बाद तक भी आप खाने में इस्तेमाल कर सकते हैं। इसे गेहूँ के आटे से आम के लकड़ी के द्वारा चूल्हे पर बनाया जाता है।
ऐसा माना जाता है कि ठेकुआ को लोग अपने स्थानीय उपलब्ध चीज़ों के इस्तेमाल से बनाया करते थे। जिसमें गेहूँ के आटे के साथ-साथ गुड़, घी, नारियल, सौंफ का इस्तेमाल होता है और यह भी कहा जाता है कि ठेकुआ भगवान सूर्य को बहुत पसंद है। यही कारण है कि सूर्य को अर्घ्य देते समय इसे शामिल किया जाता है।
लोक आस्था के महापर्व छठ में ठेकुआ का अलग महत्व है और इस पर्व का सबसे महत्वपूर्ण प्रसाद ठेकुआ ही माना जाता है। बिहार में स्वादिष्ट व्यंजन निर्माण की परंपरा पुरानी समय से समृद्ध रही है और छठ के ठेकुआ का तो कहना ही क्या। लोकगीत के मधुर धुनों पर झूमती महिलाएं जब ठेकुआ बनाती हैं तो इसमें ना सिर्फ चीनी और गुड़, बल्कि महिलाओं के सुमधुर गीत की मिठास भी घुल जाती है। कहा जाता है कि सूर्य देव और छठी मैया को भी ठेकुआ काफी पसंद है, जिसके कारण इसका स्वाद और दोगुना हो जाता है।

अर्घ्य समाप्त होते ही रिश्तेदारों को दिया जाता है प्रसाद
आज भी प्रातः कालीन अर्घ्य समाप्त होते ही प्रसाद रिश्तेदारों के यहां पहुंचाने का प्रचलन है लेकिन प्रसाद में खासकर ठेकुआ का आदान-प्रदान जरूर किया जाता है। बेटियां अपने मायके से आने वाले प्रसाद में ठेकुआ का इंतजार करते रहती है। यूं तो ठेकुआ सालों भर बनाए जाते हैं, पहले के जमाने में जब लोग कहीं बाहर जाने लगते थे तो ठेकुआ बनाकर दे दिया जाता था।

 सामग्री : गेहूँ का आटा, घी (मोयन के लिए), सूखा नारियल, गुड़, इलायची पाउडर, सौंफ, मेवे, तलने के लिए घी
विधि : पहले पानी उबालकर उसमें पिघलने के लिए गुड़ डाल दें और उसे चलाते रहें। पिघलने के बाद जब गुड़ वाला पानी ठंडा हो जाए, तो थाली में आटा निकाल कर उसमें सूखा नारियल, पिसी इलायची, सौंफ, मेवे की बारीक क’तर’न और मोयन के लिए घी डालकर मिक्स कर लें। इस के बाद इस आटे को गुड़ वाले पानी से गूंथ लें, आटा तैयार होने पर इसकी लोइयाँ बनाले। अब इस लाइए को सांचे की मदद से आकार देकर घी में तल लें। इस तरह आपके ठेकुए तैयार हैं।

(साभार – रेलयात्री डॉट इन ब्लॉग और नवभारत टाइम्स)

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