जकरिया स्ट्रीट से मेफेयर रोड तक : रेणु गौरीसरिया के बहाने मित्र परिक्रमा

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डॉ. किरण सिपानी

सन् 2020 गतिविधियों पर पाबंदियों का वर्ष तो जरूर साबित हुआ, पर लेखन और कहूँ तो कुछ अंशों तक प्रकाशन भी कमोबेश चलता रहा, रुका नहीं। तीन पुस्तकें मेरी टेबल पर हैं – ‘कोलाज’, ‘जकरिया स्ट्रीट से मेफेयर रोड तक’ और ‘स्पन्दन’। तीनों ही रेणु दी से किसी न किसी रूप में जुड़ी हुई हैं। ‘कोलाज’ स्व. सुर्कीति गुप्ता की आत्मकथा है। जनवरी में 2020 में मेरे द्वारा प्रकाशित इसके लोकार्पण समारोह में एक वक्ता के रूप में मैंने रेणु दी को चुना था। कई मायनों में यह एक सार्थक सृजनात्मक उत्सव था। नवम्बर में प्रकाशित ‘जकरिया स्ट्रीट से मेफेयर रोड तक’, प्रथम पृष्ठ पर एक हस्तलिखित नोट के साथ पहुँची –

प्रिय किरण जी,
साहित्यिकी के साथ भी और उसके बाद भी, आपसे मेरा सम्पर्क कभी टूटा नहीं। आपने हमेशा संचालन, समीक्षा या कुछ भी लिखते रहने की प्रेरणा दी। उसी प्रेरणा का फल है यह आत्मकथ्य। अपने जीवन की सुख – दुख की इस यात्रा में आपको सम्मिलित करके बड़ी प्रसन्नता हो रही है।
सस्नेह, रेणु दीदी
1.11.2020

सीमित मुद्रित प्रतियों में से एक मेरी झोली में गिरी – आभार उनका। उम्र के इस पड़ाव पर इस सकारात्मक सक्रिय कदम के लिए वे स्पृहणीय हैं।
तीसरा प्रकाशन ‘स्पन्दन’ – मेरी बेटियों – दामादों द्वारा अपने जीवित माँ – पापा को अर्पित अनोखा उपहार है। बच्चों ने गुपचुप तरीके से हमें भनक लगाये बिना दोनों तरफ के परिवारों, हम दोनों की मित्र – मंडलियों एवं हर बच्चे से सबकी रंगीन तस्वीरों के साथ उनकी भावनाओं, आलेखों, कविताओं, शुभकामनाओं की अनमोल धरोहर बना दिया है इसे। पृष्ठ 51 पर अपने आलेख की अंतिम पंक्तियों में रेणु दी ने बहुत कुछ कह दिया है – ‘कवयित्री, गायिका, अध्यापिका, अन्य गुणों से बढ़कर है आपका मित्रता का गुण। मुझे गर्व है कि मैं आपकी मित्र हूँ। सदैव स्वस्थ और प्रसन्न रहते हुए कर्मरत रहें।’ सुखद है कि रेणु दी व मेरे बच्चों ने इन पुस्तकों का मुद्रित एवं ऑनलाइन प्रकाशन किया।
साहित्य़िकी से बीस वर्षों के जुड़ाव ने विभिन्न मनोभूमियों के मित्रों से सूत्र जोड़ दिये। साहित्यिकी परिवार के हर सदस्य का जन्मदिन मेरी स्मृति में अंकित रहा – ऐसा बहुत कम ही हुआ होगा कि मैंने समय पर अपनी शुभकामनाएं प्रेषित न की हों। मैं कभी साहित्यिकी पत्रिका की सम्पादक नहीं रही, पर सुर्कीति दी की आज्ञानुसार विशेष सहयोगी के रूप में हर तरह के कार्य मेरी संलग्नता रही। पत्रिका के लिए सबसे पहले रचना प्रेषित करने में विनोदिनी गोयनका, आशा जायसवाल, रेणु गौरीसरिया, अग्र पंक्ति में शामिल रहीं। विनोदिनी जी आज हमारे बीच नहीं हैं – उनका सहज स्नेह मुझे हमेशा भिगोता रहा। आशा दी की मित्रता तो 2012 में जायसवाल भाई साहब के परलोकगमन के बाद परवान चढ़ती गयी। साहित्य – अध्यापन – परिवार – दिनचर्या, कोई भी विषय हो, हम दो – चार दिनों पर खुलकर बातें करते रहते हैं। हाँ, शारीरिक रूप से न मिल पाने पर भी दूरियों का कोई अर्थ नहीं। मेरी भावनाओं का सम्मान करते हुए वे कभी आज्ञा देती रहीं, कभी सुझाव। उनके माध्यम से चिन्मय ट्रांसफॉर्मेशन सर्कल के कई अकादमिक कार्यक्रमों में मेरी सकारात्मक अग्रणी भूमिका रही। उनकी जीवटता बरकरार रहे – यही कामना है।
2020 का चौथा प्रकाशन, जो मुद्रित एवं ऑनलाइन – दोनों ही रूप में उपलब्ध हुआ मुझे – नुपुर जायसवाल की व्यंग्य़ रचनाओं का संकलन – ‘पचहत्तरवाली भिंडी’ – जो गुदगुदाता भी है, मर्म को भेदता भी है, आत्मलोचन के लिए प्रेरित भी करता है। उसकी कविताएं, समीक्षाएं, व्यंग्य, चित्र और उद्यमिता के लिए आयोजित कार्यशालाएं…सब मिलकर उसके व्यक्तित्व को विशिष्ट बना देते हैं। साथ काम करने एवं एक दूसरे के सहयोग -सुझावों ने रिश्तों को प्रगाढ़ किया है। गीता दूबे उम्र में बहुत छोटी है मुझसे, पर हमने बहुत कुछ साझा किया है। कई बिन्दुओं पर एक दूसरे को समझते हुए, सम्मान देते हुए एक दूसरे की कद्र की है। उसकी वाक स्पष्टवादिता, अध्ययनशीलता, समीक्षा -लेखन की मैं कायल रही हूँ। ‘स्पन्दन’ में व्यक्त अपनी भावनाओं में माँ का सा दर्जा देने वाली – इस बिटिया मित्र को ढेरों आशीर्वाद। जन्मदिन साझा करने वाली वसुंधरा मिश्र को डाँट – डपटकर घर से बाहर निकालकर अध्यापन की डोर पकड़वा पाने पर संतोष हुआ। उसकी श्रद्धा – स्नेह – सम्मान मेरा सम्बल बनते रहे हैं। सुधा भार्गव और राज जैन दूसरे शहरों में बस गई – फोन पर लम्बी वार्ताएँ हमारी अंतरंगता की साक्षी रही हैं। बयासी वर्षीय प्रतिभा खंडेलवाल की सक्रियता मुझे अंचभित करती हैं।
साहित्यिकी, हनुमान मंदिर अनुसंधान संस्थान, आचार्य जगदीश चंद्र बोस कॉलेज, स्टूडेंट्स डे होम फॉर गर्ल्स, जैन कॉलेज आदि विभिन्न संस्थानों एवं अपने स्कूल – कॉलेज – यूनिवर्सिटी के मित्रों की लम्बी परिक्रमा करूँ तो सीमाओं का लंघन होगा। कुछ मित्र पानी के बुलबुले की तरह जीवन में अल्पकाल के लिए आये। कुछ ने मौसमी फूलों की तरह अपनी खुशबू बिखेरी और चले गये पर कुछ पत्थर की लकीर की तरह टिके रह गये। कुछ की मित्रता के छद्म रूपों – सदमों ने मुझे व्यथित किया। वर्ष बीत गये, पर उस पीड़ा से स्वयं को मुक्त न कर पायी। खैर! साहित्यिकी की परिक्रमा तो पूरी हुई। स्कूल के मित्रों में बिमला अग्रवाल बिछुड़ कर फिर मिल गयी। अपनी सगाई के दिन उसी के कपड़े – गहने पहने- इतना अपनत्व था…सिर्फ कुछ घंटों के अंतराल पर तैयार होना था, नये कपड़े बनवाने – खरीदने का समय नहीं था। उषा मेहरा (सग्गी) भी वर्षों खोई रही। मिली तो ऐसी मिली कि जैसे खोयी ही नहीं थी। जड़ों में पानी पड़ा, फिर हरी हो गयीं डालियाँ। कॉलेज की एकमात्र सखी उषा लड्ढा (चांडक) के सारे भाई- बहनों का परिवार कब मेरा परिवार बन गया, पता ही नहीं चला। उसके जीजाजी बालकृष्ण गर्ग मेरे राखीबंद भाई बन गये और उनके बच्चों की मैं बुआ – मासी बनकर आज तक सम्मान पाती रही हूँ। बड़ी भाभी जी के गुजर जाने पर अकेली हो गई बबली – टिंकू को सिंधारा – दीपावली पर बुलाना मेरी सूची में शामिल रहता है। सूचना मिलने पर मेरे विवाह की सालगिरह में घर की बड़ी – बूढ़ियों की तरह बबली मिठाई भेजने में चूकती नहीं। उषा का बड़ा बेटा मुन्ना सपरिवार केदारनाथ की लहरों में कहीं खो गया। चमत्कार भी होते हैं न! उषा के सब्र और जज्बे को सलाम।
हनुमान मंदिर का प्रसाद है विजयलक्ष्मी मिश्र। हर आँधी – तूफान में साथ खड़ी रही। सहज – सरल – मिलनसार हनुमान की तरह हर संकट के समाधान को तत्पर – बिल्कुल निष्कपट। उम्र में एक ही वर्ष छोटी, मेरे प्रति अटूट विश्वास और श्रद्धा से भरपूर, जिससे आधी रात को उठाकर दिल की बात कही जा सके। उसका स्नेह मेरी धाती है। आचार्य जगदीश चंद्र बोस कॉलेज की अंग्रेजी प्रवक्ता संजुक्ता दासगुप्त और मैं विभिन्न विषयों और विभिन्न पृष्ठभूमियों से जुड़े थे – पर कुछ रुचियों ने हमें करीब ला दिया। मित्रता का आलम यह था कि जब वह 13 -14 वर्षों बाद कलकत्ता विश्वविद्यालय में हमेशा के लिए जा रही थी तो कॉलेज के प्रिंसिपस डॉ. देवतोष मजूमदार के मुँह से पहला वाक्य निकला था – ‘एखन मिसेज सिपानीर कि होबे?’ (‘अब मिसेज सिपानी का क्या होगा?’ ) वह अब कलकत्ता विश्वविद्यालय के ह्यूमैनिटीज के डीन पद से सेवानिवृत होकर साहित्य अकादमी से जुड़ गयी हैं।
कविता मेहरोत्रा भी हनुमान मंदिर के माध्यम से ही जुड़ी और औपचारिकता की सीमाएं पारिवारिक आत्मीयता में विलीन हो गई। नवरात्रि के समय मेरी बेटियाँ – भतीजी रामलाल जी मेहरोत्रा के घर पर पूजी जातीं। अन्नकूट के अवसर पर रामलाल जी भाई साहब हमें बुलाना नहीं भूलते। हम सब भाभी जी के द्वारा बनाये पकवानों से छक कर आते।
साहित्य अकादमी द्वारा पुरस्कृत राजस्थानी – हिन्दी पंजाबी के साहित्यकार डॉ. मंगत बादल से परिचय हुआ। उनके राजस्थानी काव्य ‘मीरा’ के संदर्भ में और हम अच्छे मित्र बन गये। हम कभी मिले नहीं। कुछ – कुछ अंतराल पर हम विभिन्न साहित्यिकी विषयों पर लम्बी चर्चायें करते हैं फोन पर ही। उनके काव्यों की मार्मिक शैली पाठक को बाँधे रखती है। व्यंग्य – लेखन में भी माहिर हैं वे। निबन्धों की छटा भी निराली है। लिखने के लिये निरन्तर मुझे प्रेरित करते हैं। मेरी रफ्तार तेज नहीं हो पाती और वे तो दिन के कई घंटे लेखन में डूबे रहते हैं। उन्हें मेरी पुस्तकों की प्रतीक्षा है। 2020 में ही कोरोना काल में उनके नये काव्य संग्रह ‘साक्षी रहे हो तुम’ का लोकार्पण हुआ, जिसे मैं पढ़ नहीं पाई।
मेरी मित्र -परिक्रमा रेणु दी से शुरू हुई और अब उन पर ही समाप्त कर रही हूँ। साहित्यिकी की गोष्ठियों में परिचय हुआ। सफेद लिबास में लिपटी एक सौम्य मूर्ति – कोई बनाव – श्रृंगार, कोई दिखावा नहीं। साहित्यिकी की गोष्ठियों के संदर्भ में प्रायः हर सदस्या से मेरा संपर्क रहता। ज्यों- ज्यों रेणु दी से सम्पर्क सघन होता गया, मैं उनके साहित्यिक रुझान से परिचित होती गयी। उनके ना – नुकुर करने पर भी मैं उन्हें सक्रिय करने की ताक में रहती और किसी सृजनात्मक गतिविधि में जोड़ने का सफल प्रयास करती। मुझे उनके जीवन की कुछ घटनाएँ उन्हीं के द्वारा ज्ञात हुई थीं। उनकी दायित्वशीलता, अनुशासनप्रियता और साहित्यिक रुचि अनुकूल लगी थी साहित्यिकी के विकास के लिये। मैंने उनके सामने सह सचिव के पद का प्रस्ताव रखा था और बहुत विचार – विम्रर्श के बाद झिझक के साथ स्वीकृति दी थी उन्होंने। हमारा तालमेल अच्छा ही रहा। कोरोना काल में भी मेरे संस्मरणों को पढ़ती रही हैं वे।
मैंने बच्चन की बहुचर्चित आत्मकथा के सारे भाग पढ़े थे। आत्मकथा पढ़ने का पहला अनुभव था। एडवोकेट माँगीलाल भूतोड़िया की डायरीनुमा आत्मकथा – ‘ख्वाब से अधिक हसीन जिन्दगी’ को भी पढ़ने का अवसर मिला। यह आत्मकथा अपने खुले वर्णनों के कारण बहुत आलोचित हुई थी। यथार्थ के सारे रूप सहज स्वीकार्य नहीं होते। तीसरी अप्रकाशित आत्मकथा जो मैंने पढ़ी, वह थी सुकीर्ति गुप्ता की ‘कोलाज’, जिसका प्रकाशन उनकी मृत्यु के बाद बहुत मुश्किल से हुआ। वैसे तो इसके पूर्व छपा उनका चक्रव्यूह उपन्यास भी आत्मकथात्मक ही है, मेरी समीक्षा ‘स्त्री लेखन : स्त्री दृष्टि ‘ आलोचनात्मक ग्रन्थ में संकलित है। ‘जकरिया स्ट्रीट से मेफेयर रोड तक’ रेणु दी की आत्मकथा है। बड़ी बेबाकी से, बिना लाग – लपेट के अपने अंतर्मन की तहों को खोल दिया है उन्होंने। उत्तर आधुनिक युग में स्त्री का बोलना सहज सह्य नहीं है। उनकी चुप्पी शालीनता का लेबल है। आत्मकथा खुलेपन की माँग करती है। ईमानदार अभिव्यक्ति को पाठकों का विश्वास और स्नेह सहज ही प्राप्त हो जाता है। अपनी तथाकथित इमेज के टूटने के डर से लेखक खुलेपन से बचते हैं। रेणु गौरीसरिया ने इस डर को धता बता दी – बड़े साहस की बात है।
यह रेणु गौरीसरिया के लेखन का प्रथम प्रकाशन है। उन्होंने साबित कर दिया कि बूढ़ी उम्र का लेखन भी धारदार हो सकता है। किसी भी उम्र के लेखन का स्वागत किया जाना चाहिए। तन से बूढ़ा हो जाना ही ‘चुक जाना’ नहीं होता। आशा है कि इस प्रथम प्रकाशन की संतुष्टि उन्हें नयी उर्जा से भर देगी औऱ वे इस क्षेत्र में निरन्तर गतिमान रहेंगी।
कई पीढ़ियों के परिवारों का आपस में जुड़े रहना – जीवन को अनोखा संबल प्रदान करता है – यह कथ्य इस आत्मकथा में उभर – उभर कर आता रहा है जिसके तार बचपन के सूत्रों में गुँथे रहते हैं। भव्य बचपन के चित्र कई पुराने भारतीय परिवारों की याद दिलाते गये मुझे। छोटी उम्र में विवाह की मासूमियत के रंग कुछ अलग ही होते हैं – यह सच्चाई बहुत ही सहजता के साथ अभिव्यक्त हुई बै। पहले विवाह का लाड़ – प्यार बहुत ही निर्मम तरीके से दूसरे विवाह के अपमान – तिरस्कार – उपेक्षा में कैसे बदल जाता है….शायद इसे ही नियति कहेंगे। नाजों – हथेलियों में पली विवाहित बेटियों का दुःख पिता को किस कदर तोड़ देता है, ससुराली अत्याचारों एवं निकम्मे पतियों से मुक्ति दिलाने के लिए मायके वाले कितना तड़पते हैं, कई स्थितियों में स्त्री कितनी लाचार – विवश हो जाती है, ममता खून के आँसू रोती है….वर्णन – दर – वर्णन पाठक की संवेदना झंकृत होती रहती है।
कलाकारों – साहित्यकारों के संसर्ग में संस्कारवान होती, अपनी रुचियों को विकसित करती कथा- नायिका मारवाड़ी समाज के जागरण – बदलाव को अपने चरित्र में रुपांतरित करती है। कई पड़ावों को पार करते, रुक – रुक कर चलते – चलते आखिरकार शिक्षा के आलोक से जीवन को आलोकित करती हुई अपनी प्रगतिशील सोच का प्रमाण देती है। स्कूल में अध्यापन से जुड़कर आत्मनिर्भरता का बिगुल बजाती है। कई संस्थाओं से जुड़कर बौद्धिक तृप्ति की राह तलाशती है। अवसर मिलने पर अपनी यायावरी के शौक को पूरा करने का लोभ नहीं छोड़ पाती और सिलसिलेवार यात्रा – स्मृतियों के लेखन से नहीं चूकती।
इस आत्मकथा में मार्गदर्शन करने वालों के प्रति आभार प्रकट करती हुई वे एक स्थान पर प्रोफेसर प्रबोध नारायण सिंह का स्मरण करती हैं। बिना किसी प्रचार के स्त्री को बदलने की ‘सर’ की सकारात्मक तत्परता के ढेरों उदाहरण मेरी आँखों के सामने हैं। सबसे बड़ा प्रमाण है – डॉ. विजयलक्ष्मी मिश्र, जिसे उन्होंने नवजीवन प्रदान किया। वे मेरे मानस – पिता थे जिनके वात्सल्य- आशीर्वाद से मैं आप्लावित होती रही।
अंत में इस आत्मकथा की तटस्थता का उल्लेख न करूँ तो बात अधूरी रह जायेगी। संबंधों के विश्लेषण में तटस्थ दृष्टि हमेशा सक्रिय रही हैं, विशेषकर अपने बच्चों – पम्मी और अर्जुन के नाम लिखे गय़े पत्रों में। दूरियों – नजदीकियों के धागों में पिरोये ये पत्र किसी माँ की चिंताओं – पीड़ाओं को बड़ी निस्संगता से अभिव्यक्त करते हैं। संबंधों की गर्मजोशी एवं कड़वाहटों के रेखाचित्र आँकती यह आत्मकथा पग – पग पर अपने आस – पास से रूबरू होकर समस्याओं के समाधान की प्रेरणा देती है।
मैं यह मानकर चलती हूँ कि मेरे इस मित्र – संस्मरण में बहुत गहरे मित्र छूटे हैं, जैसे कि रेणु दी की आत्मकथा में मैं। सबसे क्षमा याचना।

1 COMMENT

  1. किरण, ‘ स्पंदन’ जैसे अनमोल उपहार के लिए बहुत बहुत बधाई। आपकी बेटियाँ बहुत प्यारी और समझदार हैं। हम सच में खुशनसीब हैं कि समय में आए बदलाव के न केवल साक्षी हैं, वरन् उस परिवर्तन का हिस्सा भी हैं। बेटियाँ आज हमारी हिम्मत, सहारा और गर्व हैं।
    निश्चय ही साहित्यिक संस्कार उदात्त और विशाल बनाते हैं और हमारे सोच को विकसित करते हैं।

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