जब बच्चों ने बनाया सिनेमा को अपनी बात कहने का माध्यम

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मालदा में आयोजित हुआ तीसरा बाल फिल्मोत्सव
मालदा : सिनेमा अपनी बात कहने का सशक्त माध्यम है और जब इसकी कमान बच्चों के हाथ में हो तो यह और भी खास हो जाता है। हाल ही में इसी वजह से तीसरी बार आयोजित होने वाला मालदा बाल फिल्मोत्सव ऐसा ही माध्यम बना। तलाश, यूनिसेफ और सिने सेन्ट्रल कलकत्ता द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित इस फिल्मोत्सव की खासियत ही यही थी कि यह बच्चों के लिए और बच्चों के द्वारा ही बनाया गया था। इस फिल्मोत्सव में बच्चों द्वारा निर्मित 7 फिल्में दिखायी गयीं जिसका फिल्मांकन उन्होंने अपने गाँवों में ही किया था। तलाश की एक्जिक्यूटिव डायरेक्टर आयशा सिन्हा सिनेमा को बच्चों के विकास और उनकी अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम बताते हुए कहती हैं कि अपनी फिल्म की पटकथा, विषय -वस्तु, कलाकारों के चयन से लेकर प्री – प्रोडक्शन, पोस्ट प्रोडक्शन, शूटिंग तक, इन सबकी जिम्मेदारी इन विभागों के अनुसार बनाये गये अलग – अलग समूहों में शामिल 25 बच्चों के समूह ने की। इसकी तैयारी पिछले डेढ़ साल से की जा रही थी। इस अभियान का उद्देश्य बच्चों को डिजिटल क्षेत्र में सशक्त और आत्मनिर्भर बनाना है। जाहिर है कि स्मार्ट फोन की चकाचौंध से दूर इन बच्चों के लिए यह एक चुनौती थी। कुछ बच्चे ऐसे भी थे जिन्होंने कैमरा कभी हाथ में नहीं लिया था। इन बच्चों के मेंटर थे फिल्मकार देवाशीष सेन शर्मा। उन्होंने बताया कि बच्चों ने न सिर्फ चुनौती पूरी की बल्कि अब वे सिनेमा को अपनी बात कहने के साथ बदलाव लाने का माध्यम भी बना चुके हैं।
तलाश में यूथ एडवोकेट असीम अकरम की फिल्म ‘एक अ पुरुषेर गल्प’ इस फिल्मोत्सव में दिखायी गयी और असीम इस अवसर को अपने लिए बेहद सिखाने वाला अनुभव मानता है। यहाँ खास बात यह है कि बच्चों ने खुद ही विषय – वस्तु का चुनाव किया है। वहीं एक अन्य यूथ एडवोकेट दीपा अग्रवाल ने कहा कि सिनेमा के जरिए खुद बच्चों के अनुभव दिखाये गये हैं जो वंचित बच्चों के साथ अभिभावक ने भी देखे। तलाश यूनिसेफ और जिला प्रशासन के सहयोग से वर्ष 2012 से ही काम कर रहा है। जिले में 5 तरह के संसाधन भी विकसित किये गये हैं, मसलन – व्यक्तिगत सुरक्षा और वेल बिंग ट्रेनर यानी भलाई, लीगल लिट्रेसी (कानूनी साक्षरता) लीडर्स, क्रिएटिव एंड कम्यूनिकेशन लीडर्स (रचनात्मक तथा सम्पर्क) जैसे समूह। समूचे मालदा में इस समय 865 कम्यूनिटी लीडर्स सक्रिय हैं। पिछले कई दशक से यूनिसेफ इस फिल्मोत्सव को सहयोग दे रहा है। यूनिसेफ की सम्पर्क विशेषज्ञ (पश्चिम बंगाल) मौमिता दस्तीदार ने बताया कि यह बाल फिल्मोत्सव पूरी तरह बच्चों द्वारा ही आयोजित किया जाता है। इस साल बच्चों ने अपनी बनायी इन लघु फिल्मों में उनके और उनके दोस्तों के साथ होने वाली हिंसा को भी मुद्दा बनाया है।
बाल फिल्मोत्सव में दिखायी जाने वाली बच्चों की लघु फिल्में
एक अपुरुषेर गल्प – एक किशोर की कहानी जो समाज की परम्परागत पुरुष छवि से अलग है और अन्त में वह अपने अस्तित्व की तलाश करता है।
को -लिंग – (लिंग समानता की बात करती फिल्म)
स्वप्न देखो बोले – एक किशोरी के सपने की कहानी
बाल्य विभाह – बाल विवाह की समस्या को दर्शाती फिल्म
बिपन्यो परिवेश – स्वस्थ वातावरण की आवश्यकता पर जोर देती फिल्म
सनाई – एक किशोर की कम उम्र में विवाह की समस्या पर बात करती फिल्म
सत्पात्रो – एक अच्छे लड़के को लेकर सामाजिक मापदंडों को फिल्म में दिखाया गया है और उसकी चुनौतियों पर बात भी की गयी है।

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