जानिए अखण्ड भारत का अतीत और वर्तंमान

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अखण्ड भारत एक स्वप्न है जो सत्य की धरातल पर खड़ा है। सम्भव है कि वर्तमान परिप्रेक्ष्य में यह परिकल्पना थोड़ी कठिन लग रही हो मगर भारत विश्व गुरु रहा है। स्वतंत्रता के अमृत महोत्सव में यह जानना आवश्यक है कि हमारी सीमाएं कहाँ तक रहीं, यह भारत का गौरव है। आज की वर्तमान परिस्थितियों में हम इन देशों की सम्प्रभुता का सम्मान करते हुए अपने अतीत पर दृष्टि डालें, यह महत्वपूर्ण हैं। इतिहास हमारी जमीन है, वह हमें आधार देता है, आत्मविश्वास और आत्मव्यक्तित्व देता है। इतिहास इसलिए भी आवश्यक है कि हम अतीत के सद्गुण ग्रहण करें और अपनी गलतियों से सीखते हुए वर्तमान में प्रयास करें जिससे हमारे प्रिय भारतवर्ष का भविष्य सुदृढ़, सशक्त, समृद्ध और गौरवशाली बने।
इसी परिप्रेक्ष्य में वेब दुनिया पर प्रकाशित यह आलेख अनिरुद्ध जोशी की कलम से है जिसे हम साभार आप तक लाए हैं।
आप सभी को स्वाधीनता के गौरवशाली अमृत महोत्सव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं ।
जय भारत, वन्दे मातरम्, जयतू मातृभूमि
1. जम्बूद्वीप का एक खंड है भारतवर्ष : अखंड भारत शब्द तब प्रचलन में आया जबकि भारत खंड खंड हो गया। पुराणों के अनुसार धरती 7 द्वीपों की है- जम्बू, प्लक्ष, शाल्म, कुश, क्रौंच, शाक और पुष्कर। इसमें बीचोंबीच जम्बूद्वीप है जिसके नौ खंड है- नाभि, किम्पुरुष, हरिवर्ष, इलावृत, रम्य, हिरण्यमय, कुरु, भद्राश्व और केतुमाल। इन 9 खंडों में नाभिखंड को अजनाभखंडऔर बाद में भारतवर्ष बोला जाने लगा।
2. ऋषभ पुत्र चक्रवर्ती भरत के नाम पर भारतवर्ष : भारतवर्ष को जम्बूद्वीप का एक हिस्सा माना गया है। भारतवर्ष के अंतर्गत आर्यावर्त नामक एक स्थान है। राजा अग्नीध्र जम्बूद्वीप के राजा था। अग्नीध्र के पुत्र महाराज नाभि एवं महाराज नाभि के पुत्र ऋषभदेव थे जिनके पुत्र चक्रवर्ती सम्राट भरत के नाम पर इस देश का नाम भारत पड़ा।
3. प्राचीन भारत की सीमा : चक्रवर्ती सम्राट भरत के भारतवर्ष की सीमा प्राचीन काल में भारत की सीमा ईरान, अफगानिस्तान के हिन्दूकुश से लेकर अरुणाचल तक और कश्मीर से लेकर श्रीलंका तक। कुछ विद्वान दूसरी ओर अरुणाचल से लेकर इंडोनेशिया, मलेशिया तक सीमा होने का दावा भी करते हैं। इस संपूर्ण क्षेत्र में 18 महाजनपदों के सम्राटों का राज था जिसके अंतर्गत सैंकड़ों जनपद और उपजनपद थे। मार्केन्डय पुराण के अनुसार संपूर्ण भारतवर्ष के पूर्व, पश्चिम और दक्षिण की ओर समुद्र है जो कि उत्तर में हिमालय के साथ धनुष ‘ज्या’ (प्रत्यंचा) की आकृति को धारण करता है।
4. चाणक्य के काल में भारत : युधिष्ठिर के शासन के बाद आचार्य चाणक्य के मार्गदर्शन में 321-22 ईसा पूर्व बिघरे हुए भारत को मिलाकर एक ‘अखंड भारत’ का निर्माण सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य ने किया था। इसके बाद उत्तर में सम्राट हर्षवर्धन और दक्षिण में पुलकेशिन द्वीतीय के शासन में भारत की सीमा संपूर्ण अखंड भारत का हिस्सा थी।
1. ईरान और अफगानिस्तान : कहते हैं कि ईरान पहले पारस्य देश था जो कि आर्यों की एक शाखा ने ही स्थापित किया था। प्राचीन गांधार और कंबोज के हिस्सों को ही आज अफगानिस्तान कहा जाता है। उक्त संपूर्ण क्षेत्र में हिन्दू साम्राज्य और पारसी राजवंश का ही शासन था। फिर 7वीं सदी के बाद यहां पर अरब और तुर्क के मुसलमानों ने आक्रमण करना शुरू किए और 870 ई. में अरब सेनापति याकूब एलेस ने अफगानिस्तान को अपने अधिकार में कर लिया था। ब्रिटिश काल में 1834 में अफगानिस्तान को एक बफर स्टेट बनाया और 18 अगस्त 1919 को इससे भारत से अलग कर दिया गया।
2. पाकिस्तान और बांग्लादेश: सिंध पर ईस्वी सन् 638 से 711 ई. तक के 74 वर्षों के काल में 9 खलीफाओं ने 15 बार आक्रमण किया और अंतत: हिन्दू राजा राजा दाहिर (679 ईस्वी) के कत्ल के बाद इसे इस्लामिक क्षेत्र बना दिया। इसी तरह बलूचिस्तान, मुल्तान, पंजाब और कश्मीर पर आक्रमण करके इसका भी इस्लामिकरण कर दिया गया। अतत: सन् 14 और 15 अगस्त 1947 को उक्त सभी हिस्सों को मिलाकर पाकिस्तान का गठन हुआ और एक नया देश अस्तित्व में आया। उस वक्त बंगाल के आधे हिस्से को भी पाकिस्तान में मिलाकर उसे पूर्वी पाकिस्तान कहा जाने लगा। 26 मार्च 1971 में पूर्वी पाकिस्तान को पश्‍चिमी पाकिस्तान से आजादी मिली और एक नया देश अस्तित्व में आया जिसका नाम बांग्लादेश रखा गया। इस तरह 1947 में अखंड भारत से अफगानिस्तान के बाद एक बहुत बड़ा भू-भाग अलग होकर पाकिस्तान और बांग्लादेश में बदल गया।
3. नेपाल : पौराणिक मान्यता के अनुसार नेपाल को कभी देवघर कहा जाता था। भगवान श्रीराम की पत्नी सीता का जन्म स्थल मिथिला नेपाल में है। यहां पर 1500 ईसा पूर्व से ही हिन्दू आर्य लोगों का शासन रहा है। 250 ईसा पूर्व यह मौर्यों के साम्राज्य का एक हिस्सा था। फिर चौथी शताब्दी में गुप्त वंश का एक जनपद रहा। 7वीं शताब्दी में इस पर तिब्बत का आधिपत्य हो गया था। 11वीं शताब्दी में नेपाल में ठाकुरी वंश के राजा राज्य करते थे। इसके बाद और भी कई राजवंश हुए। अंत में जा पृथ्वी नारायण शाह ने 1765 में नेपाल की एकता की मुहिम शुरू की और मध्य हिमालय के 46 से अधिक छोटे-बड़े राज्यों को संगठित कर 1768 तक इसमें सफल हो गए। यहीं से आधुनिक नेपाल का जन्म होता है। 1904 में नेपाल को एक आजाद देश का दर्जा मिला।
4. भूटान : भूटान भी कभी भारतीय महाजनपदों के अंतर्गत एक जनपद था। संभवत: यह विदेही जनपद का हिस्सा था। भूटान संस्कृत के भू-उत्थान से बना शब्द है। ब्रिटिश प्रभाव के तहत 1907 में वहां राजशाही की स्थापना हुई। 1947 में भारत आजाद हुआ और 1949 में भारत-भूटान समझौते के तहत भारत ने भूटान की वो सारी जमीन उसे लौटा दी, जो अंग्रेजों के अधीन थी।
5. म्यांमार : म्यांमार कभी ब्रह्मदेश हुआ करता था। इसे बर्मा भी कहते हैं, जो कि ब्रह्मा का अपभ्रंश है। शोक के काल में म्यांमार बौद्ध धर्म और संस्कृति का पूर्वी केंद्र बन गया था। 1886 ई. में पूरा देश ब्रिटिश भारतीय साम्राज्य के अंतर्गत आ गया किंतु ब्रिटिशों ने 1935 ई. के भारतीय शासन विधान के अंतर्गत म्यांमार को भारत से अलग कर दिया।
6. श्रीलंका : रावण का राज्य श्रीलंका भारतीय जनपद का एक हिस्सा था। एक मान्यता के अनुसार ईसा पूर्व 5076 साल पहले भगवान राम ने रावण का संहार कर श्रीलंका को भारतवर्ष का एक जनपद बना दिया था। इसके बाद अशोक के काल में श्रीलंका सनातन धर्म से बौद्धधर्मी बना। यहां कभी भारत के चोल और पांडय जनपद के अंतर्गत आता था। अंग्रेजों ने 1818 में इसे अपने पूर्ण अधिकार में ले लिया और द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद 4 फरवरी 1948 को श्रीलंका को भारत से अलग करके एक आजाद देश बना दिया गया।
7. मलेशिया : वर्तमान के मुख्‍य 4 देश मलेशिया, इंडोनेशिया, थाईलैंड, वियतनाम और कंबोडिया प्राचीन भारत के मलय प्रायद्वीप के जनपद हुआ करते थे। भारत आजाद हुआ तब अंग्रेजों में मलेशिया के हिस्सों को भारत का हिस्सा नहीं मानते हुए इसे अपने ही पास रखा और बाद में मलेशिया को अंग्रेजों ने 1957 में एक आजाद देश बना दिया।
8. सिंगापुर : सिंगापुर मलय महाद्वीप के दक्षिण सिरे के पास छोटा-सा द्वीप है। हालांकि यह मलेशिया का ही हिस्सा था। विवाद और संघर्ष के बाद 9 अगस्त 1965 को सिंगापुर एक स्वतंत्र गणतंत्र बन गया।
9. थाईलैंड: थाईलैंड का प्राचीन भारतीय नाम श्‍यामदेश है। सन् 1238 में सुखोथाई राज्य की स्थापना हुई जिसे पहला बौद्ध थाई राज्य माना जाता है। सन् 1782 में बैंकॉक में चक्री राजवंश की स्थापना हुई जिसे आधुनिक थाईलैँड का आरंभ माना जाता है। यूरोपीय शक्तियों के साथ हुई लड़ाई में स्याम को कुछ प्रदेश लौटाने पड़े, जो आज बर्मा और मलेशिया के अंश हैं। 1992 में हुए सत्तापलट में थाईलैंड एक नया संवैधानिक राजतंत्र घोषित कर दिया गया।
10. इंडोनेशिया : इंडोनेशिया में मुसलमानों की सबसे ज्यादा जनसंख्या बसती है। इंडोनेशिया का एक द्वीप है बाली, जहां के लोग अभी भी हिन्दू धर्म का पालन करते हैं। इंडोनेशिया में श्रीविजय राजवंश, शैलेन्द्र राजवंश, संजय राजवंश, माताराम राजवंश, केदिरि राजवंश, सिंहश्री, मजापहित साम्राज्य का शासन रहा। 7वीं, 8वीं सदी तक इंडोनेशिया में पूर्णतया हिन्दू वैदिक संस्कृति ही विद्यमान थी। इसके बाद यहां बौद्ध धर्म प्रचलन में रहा, जो कि 13वीं सदी तक विद्यमान था। फिर यहां अरब व्यापारियों के माध्यम से इस्लाम का विस्तार हुआ। 350 साल के डच उपनिवेशवाद के बाद 17 अगस्त 1945 को इंडोनेशिया को नीदरलैंड्स से आजादी मिली।
11. कंबोडिया : पौराणिक काल का कंबोज देश कल का कंपूचिया और आज का कंबोडिया। पहले भारत का ही एक उपनिवेश था। माना जाता है कि प्रथम शताब्दी में कौंडिन्य नामक एक ब्राह्मण ने हिन्द-चीन में हिन्दू राज्य की स्थापना की थी। इन्हीं के नाम पर कंबोडिया देश हुआ। हालांकि कंबोडिया की प्राचीन दंतकथाओं के अनुसार इस उपनिवेश की नींव ‘आर्यदेश’ के शिवभक्त राजा कम्बु स्वायम्भुव ने डाली थी। कंबोडिया पर ईशानवर्मन, भववर्मन द्वितीय, जयवर्मन प्रथम, जयवर्मन द्वितीय, सूर्यवर्मन प्रथम, जयवर्मन सप्तम आदि ने राज किया। राजवंशों के अंत के बाद इसके बाद राजा अंकडुओंग के शासनकाल में कंबोडिया पर फ्रांसीसियों का शासन हो गया। कंबोडिया को 1953 में फ्रांस से आजादी मिली।
12. वियतनाम : वियतनाम का पुराना नाम चम्पा था। चम्पा के लोग चाम कहलाते थे। वर्तमान समय में चाम लोग वियतनाम और कंबोडिया के सबसे बड़े अल्पसंख्यक हैं। आरंभ में चम्पा के लोग और राजा शैव थे लेकिन कुछ सौ साल पहले इस्लाम यहां फैलना शुरू हुआ। अब अधिक चाम लोग मुसलमान हैं, पर हिन्दू और बौद्ध चाम भी हैं। श्री भद्रवर्मन जिसका नाम चीनी इतिहास में फन-हु-ता (380-413 ई.) से मिलता है, चम्पा के प्रसिद्ध सम्राटों में से एक थे। 1825 में चम्पा के महान हिन्दू राज्य का अंत हुआ। 19वीं सदी के मध्य में फ्रांस द्वारा इसे अपना उपनिवेश बना लिया गया। 20वीं सदी के मध्य में फ्रांस के नेतृत्व का विरोध करने के चलते वियतानाम दो हिस्सों में बंट गया। एक फ्रांस के साथ था तो दूसरा कम्युनिस्ट विचारधारा से प्रेरित था। 1955 से 1975 तक लगभग 20 सालों तक चले युद्ध में अमेरिका को पराजित हो पीछे हटना पड़ा।
13. तिब्बत : तिब्बत को प्राचीनकाल में त्रिविष्टप कहा जाता था जहां रिशिका और पूर्व तुशारा  नामक राज्य थे। यह देवलोक का एक हिस्सा था जहां पर जल प्रलय के दौरान राजा वैवस्वत और उनके कुल के लोग रहते थे। मान्यता है कि आर्य यहीं के मूल निवासी थे। तिब्बत में पहले हिन्दू फिर बाद में बौद्ध धर्म प्रचारित हुआ और यह बौद्धों का प्रमुख केंद्र बन गया। शाक्यवंशियों का शासनकाल 1207 ईस्वी में प्रांरभ हुआ। बाद में चीन के राजा का शासन रहा। फिर 19वीं शताब्दी तक तिब्बत ने अपनी स्वतंत्र सत्ता बनाए रखी। फिर चीन और ब्रिटिश इंडिया के बीच 1907 के लगभग बैठक हुई और इसे दो भागों में विभाजित कर दिया। पूर्वी भाग चीन के पास और दक्षिणी भाग लामा के पास रहा। 1951 की संधि के अनुसार यह साम्यवादी चीन के प्रशासन में एक स्वतंत्र राज्य घोषित कर दिया गया।
कई जानकारों का मानना है कि भारतवर्ष को खंड-खंड होने में सैंकड़ों साल लगे। उसी तरह इसके अंखड बनने में कई तरह की बाधाएं सामने हैं। पहली तो यह कि प्राचीन भारत जिसे अखंड भारत कहा जाता है वह अब एक बहुधर्मी और बहुसंकृति वाला देश बन चुका है, जिसमें करीब 12 से 13 देश अस्तित्व में हैं। इनमें से कुछ देश मुस्लिम तो कुछ बौद्ध हैं। मतभेद के चलते अखंड भारत का निर्माण एक सपना ही कहा जा रहा है। दूसरा यह कि नेपाल, श्रीलंका, भूटान, बर्मा, इंडोनेशिया, मलेशिया, वियतनाम और कंबोडिया जैसे देश भारत से अपने धार्मिक और सांस्कृति जुड़वा को तो स्वीकार करते हैं लेकिन वह यह नहीं स्वीकार करते हैं कि वे कभी प्राचीनकाल में भारत का हिस्सा थे। उनके देश का इतिहास उन्हें कुछ और ही बताता है। अखंड भारत को एक करने के पूर्व इस संपूर्ण क्षेत्र में रहने वालों लोगों को यह समझना होगा कि उनके पूर्वज कौन थे और वे आज क्यों और क्या है। भारत को अखंड करने में भारत के प्राचीन गौरव को समझना जरूरी होगा। हम परम सौभाग्यशाली हैं जो यह स्वर्णिम दिन देख रहे हैं। राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त के शब्दों में –

यह आर्यभूमि सचेत हो, फिर कार्यभूमि बने अहा! वह प्रीति, नीति बढ़े परस्पर भीति भाव भगाइए

किसके शरण होकर रहें, अब तुम बिना गति कौन है, हे, देव, वह अपनी दया फिर एक बार दिखाइए।।

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