जानिए होली से जुड़ी अलग – अलग कथाएं और इतिहास

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पंचांग के अनुसार वर्ष के अंतिम माह फाल्गुन की पूर्णिमा को होली हिन्दू का त्योहार मनाया जाता है। कहते हैं कि यह सबसे प्राचीन उत्सव में से एक है। हर काल में इस उत्सव की परंपरा और रंग बदलते रहे हैं। आओ जानते हैं इसका इतिहास।
1. प्रहलाद कथा : होली के पर्व से अनेक कहानियां जुड़ी हुई हैं। इनमें से सबसे प्रसिद्ध कहानी है प्रह्‍लाद की। प्रहलाद के पिता हिरण्यकश्यप में अपनी बहन होलिका की गोद में प्रहलाद को बैठाकर उसे अग्नि में जलाकर मारने का प्रयास किया था। होलिका को ब्रह्मा द्वार यह वरदान था कि वह अग्नि से नहीं जलेगी परंतु वह जल गई और प्रहलाद श्रीहरि विष्णु की कृपा से बच गया। इसी घटना की याद में होलिका दहन किया जाता है। कहते हैं कि भक्त प्रहलाद सतयुग में हुए थे।
2. कामदेव कथा : सतयुग में ही इसी दिन शिव ने कामदेव को भस्म करने के बाद रति तो श्रीकृष्ण के यहां कामदेव के जन्म होने का वरदान दिया था। इसीलिए होली को ‘वसंत महोत्सव’ या ‘काम महोत्सव’ भी कहते हैं।
3. राजा पृथु कथा : यह भी कहते हैं कि इसी दिन राजा पृथु ने राज्य के बच्चों को बचाने के लिए राक्षसी ढुंढी को लकड़ी जलाकर आग से मार दिया था।
4. श्रीकृष्‍ण के प्रारंभ किया फाग उत्सव : त्रैतायुग के प्रारंभ में विष्णु ने धूलि वंदन किया था। इसकी याद में धुलेंडी मनाई जाती है। होलिका दहन के बाद ‘रंग उत्सव’ मनाने की परंपरा भगवान श्रीकृष्ण के काल से प्रारंभ हुई। तभी से इसका नाम फगवाह हो गया, क्योंकि यह फागुन माह में आती है। कृष्ण ने राधा पर रंग डाला था। इसी की याद में रंग पंचमी मनाई जाती है। श्रीकृष्ण ने ही होली के त्योहार में रंग को जोड़ा था।
5. आर्यों का होलाका : प्राचीनकाल में होली को होलाका के नाम से जाना जाता था और इस दिन आर्य नवात्रैष्टि यज्ञ करते थे। इस पर्व में होलका नामक अन्य से हवन करने के बाद उसका प्रसाद लेने की परंपरा रही है। होलका अर्थात खेत में पड़ा हुआ वह अन्य जो आधा कच्चा और आधा पका हुआ होता है। संभवत: इसलिए इसका नाम होलिका उत्सव रखा गया होगा। प्राचीन काल से ही नई फसल का कुछ भाग पहले देवताओं को अर्पित किया जाता रहा है। इस तथ्य से यह पता चलता है कि यह त्योहार वैदिक काल से ही मनाया जाता रहा है।
फागुन शुक्ल पूर्णिमा को आर्य लोग जौ की बालियों की आहुति यज्ञ में देकर अग्निहोत्र का आरंभ करते हैं, कर्मकांड में इसे ‘यवग्रयण’यज्ञ का नाम दिया गया है। बसंत में सूर्य दक्षिणायन से उत्तरायण में आ जाता है इसलिए होली के पर्व को ‘गवंतरांभ’भी कहा गया है। होली का आगमन इस बात का सूचक है कि अब चारों तरफ वसंत ऋतु की सुवास फैलने वाली है।
जैमिनी के पूर्व मीमांसा-सूत्र (लगभग 400-200 ईसा पूर्व) के अनुसार होली का प्रारंभिक शब्द रूप ‘होलाका’ था। जैमिनी का कथन है कि इसे सभी आर्यों द्वारा संपादित किया जाना चाहिए। ज्ञात रूप से यह त्योहार 600 ईसा पूर्व से मनाया जाता रहा है।
5. रामगढ़ के अभिलेख : विंध्य क्षेत्र के रामगढ़ स्थान पर स्थित ईसा से 300 वर्ष पुराने एक अभिलेख में भी इसका उल्लेख किया गया है। इससे यह सिद्ध होता हैं कि यह त्योहार ईसा से 300 वर्ष पूर्व भी मनाया जाता था।
6. अन्य ग्रंथों में उल्लेख : काठक गृह्य सूत्र और कथा गार्ह्य-सूत्र में भी होली का वर्णन मिलता है। नारद पुराण और भविष्य पुराण जैसे पुराणों की प्राचीन हस्तलिपियों और ग्रंथों में भी इस पर्व का उल्लेख मिलता है।
काठक गृह्य सूत्र के एक सूत्र की टीकाकार देवपाल ने इस प्रकार व्याख्या की है-
होला कर्मविशेष: सौभाग्याय स्त्रीणां प्रातरनुष्ठीयते। तत्र होलाके राका देवता।
अर्थात होला एक कर्म विशेष है, जो स्त्रियों के सौभाग्य के लिए संपादित होता है। इसमें राका (पूर्णचंद्र) देवता हैं।
7. 20 क्रीड़ाओं में एक होलका : होलाका संपूर्ण भारत में प्रचलित 20 क्रीड़ाओं में एक है। वात्स्यायन के अनुसार लोग श्रृंग (गाय की सिंग) से एक-दूसरे पर रंग डालते हैं और सुगंधित चूर्ण (अबीर-गुलाल) डालते हैं। लिंगपुराण में उल्लेख है कि फाल्गुन-पूर्णिमा को फाल्गुनिका कहा जाता है, यह बाल क्रीड़ाओं से पूर्ण है और लोगों को विभूति (ऐश्वर्य) देने वाली है। वराह पुराण में इसे पटवास-विलासिनी (चूर्ण से युक्त क्रीड़ाओं वाली) कहा है।

8. मंदिरों में अंकित होली : प्राचीन भारतीय मंदिरों की दीवारों पर होली उत्सव से संबंधित विभिन्न मूर्ति या चित्र अंकित पाए जाते हैं। ऐसा ही 16वीं सदी का एक मंदिर विजयनगर की राजधानी हंपी में है। 16वीं शताब्दी के अहमदनगर के चित्रों और मेवाड़ के चित्रों में भी होली उत्सव का चित्रण मिलता है। सिंधु घाटी की सभ्यता के अवशेषों में भी होली और दिवाली मनाए जाने के सबूत मिलते हैं।
(साभार – वेबदुनिया)

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